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शनिवार, जनवरी 29, 2011

डरपोक थे पंडित नेहरू : डॉ. टेंग

डॉ. मोहन कृष्ण टेंग कश्मीर विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे दिसम्बर 1991 में विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने जम्मू-कश्मीर समस्या का गहनतम अध्ययन किया है। उनकी कश्मीर मामले पर कई पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं; जिनमें- कश्मीर अनुच्छेद-370, मिथ ऑफ ऑटोनामी, कश्मीर स्पेशल स्टेटस, कश्मीर : कांस्टीट्यूशनल हिस्ट्री एंड डाक्यूमेंट्स, नार्थ-इस्ट फ्रंटियर ऑफ इंडिया प्रमुख हैं। उनका मानना है कि कश्मीर की वर्तमान समस्या के पीछे पंडित नेहरू और भारत का राजनैतिक प्रतिष्ठान प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है। श्रीनगर के लालचौक पर तिरंगा न फहराने देने के प्रति उमर सरकार की प्रतिबद्धता और केंद्र सरकार की अपील को भी वे उचित नहीं मानते। उनका कहना है कि दोनों सरकारों का यह रवैया भारतीय संविधान की मूल भावनाओं के खिलाफ है। डॉ. टेंग पिछले सप्ताह जम्मू के अम्बफला स्थित कारगिल भवन में आयोजित जम्मू-कश्मीर : तथ्य, समस्याएं और समाधान विषयक दो दिवसीय सेमीनार में हिस्सा लेने आए थे। इसका आयोजन जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र ने किया था। इस दौरान पवन कुमार अरविंद ने उनसे विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत है अंश-

Que. जम्मू-कश्मीर राज्य के भारत में विलय के संबंध में उमर अब्दुल्ला के बयान पर आपका क्या कहना है?
Ans. हां, मैंने भी सुना था। राज्य विधानसभा में सशर्त विलय की बात उमर ने कही थी। लेकिन ऐसा कोई समझौता तो नहीं हुआ था। विलय का अधिकार राज्यों के राजाओं को था। महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जो एकदम पूर्ण था। यह विलय अन्य राज्यों से किसी भी प्रकार से भिन्न नहीं था। गवर्नर जनरल ने उसको स्वीकार भी कर लिया था। विलय के हस्ताक्षर होने में नेशनल कांफ्रेंस के नेताओं की कोई भूमिका नहीं थी। साथ ही उस समय के प्रजा मंडल के सदस्यों की भी कोई भूमिका नहीं थी। हालांकि 3 अक्टूबर को श्रीनगर में हुई नेशनल कान्फ्रेंस की बैठक में शेख ने विलय का समर्थन करने का फैसला लिया था। यह जनता की राय थी लेकिन इस बात को उन्होंने उजागर नहीं किया।

विलय पत्र का जो मसौदा तैयार किया गया था उसमें किसी अंग्रेज की भूमिका नहीं थी; बल्कि गृह मंत्रालय ने तैयार किया था। इस मंत्रालय के प्रमुख सरदार पटेल थे। अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पटेल को राज्यों के विलय का विशेष जिम्मा सौंपा था। विलय का यही मसौदा वी.के. कृष्ण मेनन और माउंटबेटन को सौंपा गया था। नेशनल कांफ्रेस के किसी भी नेता को विलय की ठीक से जानकारी नहीं थी। भारत सरकार ने शेख अब्दुल्ला के दिल्ली पहुंचने से पहले ही उस फाइल को बंद कर दिया। शेख पंडित नेहरू से मिले, उनके जान के लाले पड़े हुए थे। शेख ने कहा कि किसी भी तरह से आप जम्मू-कश्मीर में सेना भेज दीजिए, विलय जैसे भी करना है आप कर लें, लेकिन जल्दी सेना भेजें, नहीं तो बहुत लोग मारे जाएंगे। जबकि विलय की प्रक्रिया पूर्ण कर फाइल बंद कर दी गई थी। इसके बावजूद आज नेशनल कांफ्रेंस इस बात को बार-बार दुहरा रही है कि सशर्त विलय हुआ था। उनका यह दावा सरासर झूठ है। उस वक्त इसकी तो बात ही नहीं हुई थी।


Que. क्या संविधान में अनुच्छेद-370 शामिल करने के पीछे विलय की भी कोई भूमिका है?

Ans. अरे भई, 26 अक्टूबर 1947 को ही विलय का कार्य पूर्ण हो चुका था। विलय से अनुच्छेद-370 का कोई संबंध नहीं है। झगड़ा तो विलय के दो वर्ष बाद यानी 1949 में शुरू हुआ। वर्ष 1949 के मध्य तक संविधान सभा ने अपना कार्य लगभग पूर्ण कर लिया था। लेकिन यह समस्या उठ खड़ी हुई कि राज्यों का क्या किया जाए। अन्य राज्यों के विलय का मसला अभी पूर्ण नहीं हुआ था। इसको सुलझाने के लिए जम्मू-कश्मीर सहित सभी राज्यों की दिल्ली में एक बैठक हुई थी। इन राज्यों का कहना था कि यदि यही कहा जाता रहा कि विलय की प्रक्रिया पूरी हो, उसके बाद संविधान सभा बने, तो इस प्रक्रिया में 10 साल लग जाएंगे। विदित हो कि गृह मंत्रालय ने इन राज्यों के लिए अलग संविधान सभा की वकालत की थी। इस बैठक में इन राज्यों ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए भारत सरकार को संविधान बनाने के लिए अधिकृत कर दिया। इस दौरान यह तय हुआ कि उन राज्यों के शासक घोषणा-पत्र के जरिए इस निर्णय पर अपनी मुहर लगाएं। भारत के हर राज्य के शासकों ने यह निर्णय स्वीकार किया कि भारत की संविधान सभा जो संविधान बनाएगी, उन्हें मंजूर होगा। उन शासकों में महाराजा हरिसिंह भी थे जिन्होंने ऐसी घोषणा की कि भारतीय संविधान सभा के द्वारा बनाया गया संविधान उन्हें मंजूर होगा। ये सारी बातें भारतीय अभिलेखागार में मौजूद हैं। नेशनल कान्फ्रेंस के लोगों ने यहां पर रोड़ा अटकाया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय हमें मंजूर नहीं हैं। हम अपनी संविधान सभा में अपना संविधान बनाएंगे। हम भारतीय संविधान की कोई बात स्वीकार नहीं करेंगे। जबकि इन्सट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन में राज्यों के विलय कर लेने के बाद भारतीय संविधान की मूलभूत बातें स्वीकार करना प्रमुख रूप से शामिल था। गृह मंत्रालय ने 14 मई 1949 को नेशनल कान्फ्रेंस के नेताओं को दिल्ली बुलाया। मंत्रालय ने कहा कि विलय के मुताबिक आपको भारतीय संविधान की मूलभूत बातें स्वीकार करनी होंगी। नेशनल कान्फ्रेंस ने कहा कि हमें भारतीय संविधान की एक बातें भी स्वीकार नहीं होंगी। असल में झगड़ा यहीं से शुरू हुआ।


Que. यदि भारत सरकार नेशनल कान्फ्रेंस की बातें नहीं मानती तो क्या होता?

Ans. कुछ नहीं होता। विलय की प्रक्रिया नेशनल कान्फ्रेंस के रोड़ा अटकाने से दो वर्ष पहले ही पूरी हो चुकी थी। विलय को नेशनल कान्फ्रेंस को मानना ही पड़ता। लेकिन सरकार ने उसको झूठ में महत्व दिया। अगर सरकार ने ये बातें नहीं मानी होतीं तो देश के ऊपर कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ता। इसको लेकर नेहरू क्यों घबरा गए थे, यह समझ से परे है।

Que. पंडित नेहरू कश्मीर की वर्तमान स्थिति के लिए कहां तक जिम्मेदार हैं?
Ans. 21 अक्टूबर 1947 को छद्म पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सीमा में प्रवेश किया। 22 तारीख को सुबह पांच बजे पाकिस्तानी सेना पूरे मुजफ्फराबाद में फैल चुकी थी। इस संदर्भ में भारत सरकार का कहना था कि इसकी सूचना उसे 26 तारीख को मिली। जबकि 22 तारीख को 10.30 बजे प्रधानमंत्री के टेबल पर पाकिस्तानी सेना के दाखिले की सूचना लिखित रूप से पहुंच चुकी थी। इसके बावजूद अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की हिम्मत नहीं थी कि वे गवर्नर जनरल से बातचीत करते। इसकी चर्चा दूसरे दिन लंच मीटिंग के दौरान हुई।

Que. तो आपका कहना है कि पाकिस्तानी आक्रमण के खिलाफ नेहरू ने फैसला लेने में पांच दिन लगा दिए?
Ans. हां, यदि उन्होंने सूचना मिलने के तुरंत बाद इसके खिलाफ कार्रवाई की होती; तो न पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की समस्या उत्पन्न होती और न ही इस आक्रमण में इतने लोग मारे गए होते। इन पांच दिनों में 38 हजार लोग मारे गए। इसमें हिंदू, सिख और अंग्रेज शामिल थे। आप कल्पना कर लीजिए, यह कोई छोटी बात नहीं है। यही नहीं नेहरू ने दूसरी बड़ी गलती यह की कि एक ओर जब भारतीय सेना पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को खदेड़ रही थी तो बीच में ही जीती हुई लड़ाई को वे संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गए। उनमें लड़ने की हिम्मत नहीं थी, वह डरपोंक थे।


Que. क्या अनुच्छेद-370 भारत की सम्प्रभुता के खिलाफ है?

Ans. इससे भारत का कोई हित नहीं जुड़ा है। यह देश की सम्प्रभुता के खिलाफ है ही; लोकतंत्र और सेकुलरिज्म की मूल भावना के भी खिलाफ है। सबसे प्रमुख बात यह है इसके कारण नागरिकों के मूलाधिकार, नागरिकता का अधिकार, सुप्रीम कोर्ट का अधिकार-क्षेत्र स्वीकार नहीं है।

Que. अनुच्छेद-370 हटाने से कश्मीर समस्या समाप्त हो जाएगी, आपका क्या कहना है?

Ans. जम्मू-कश्मीर की समस्याएं हिंदुस्तान की सारी समस्याओं का एक प्रमुख हिस्सा है। दूसरी बात यह है कि कम से कम एक जो अनिश्चितता है वो तो खत्म हो जाएगी। भारतीय संविधान की दृष्टि से समानता के साथ ही जम्मू-कश्मीर और देश के अन्य राज्यों के नागरिकों के बीच भी समानता आ जाएगी। जम्मू-कश्मीर के नागरिकों की नागरिकता दोहरी नहीं रह जाएगी। दो विधान और दो निशान खत्म हो जाएंगे।

Que. क्या भारतीय संसद अनुच्छेद-370 को समाप्त कर सकती है?
Ans. हां, वह ऐसा कर सकती है। यह अनुच्छेद-370 भारतीय संविधान में अस्थाई संक्रमणकालीन विशेष उपबंध के रूप में शामिल किया गया था; फिर हटाने में कोई समस्या नहीं है। संसद के पास संशोधन और अभिनिषेध; दोनों करने का अधिकार है। लेकिन इसके लिए हमारे नेताओं के पास दृढ़-इच्छाशक्ति का अभाव है, नहीं तो यह समस्या कभी की समाप्त हो जाती। संसद केवल संविधान की मूल भावना के खिलाफ नहीं जा सकती।

Que. कश्मीर की वर्तमान समस्या के पीछे क्या आप अमेरिका की भी कोई भूमिका देखते हैं?

Ans. नहीं, अमेरिका की कोई भूमिका नहीं है। मेरा मानना है कि पहले भी कोई भूमिका नहीं रही है। पाकिस्तान को छोड़कर किसी अन्य देश की ऐसी कोई भूमिका नहीं है। इस समस्या के पीछे भारत का राजनैतिक प्रतिष्ठान ही मूल रूप से जिम्मेदार है।

Que. लाल चौक पर तिरंगा न फहराने देने की उमर सरकार की प्रतिबद्धता कहां तक उचित है?
Ans. यह सरासर अनुचित और संविधान के विरूद्ध है। यही बात तो अलगाववादी भी कर रहे हैं। फिर सरकार और अलगाववादियों में क्या अंतर बचता है।

Que. लेकिन राज्य और केंद्र की सरकार एक स्वर में बोल रही थी कि तिरंगा फहराने से राज्य में काफी समय बाद स्थापित अमन-चैन बिगड़ने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा?
Ans. जहां तक तिरंगा फहराने की बात है तो केवल इतना ही होता न कि दो चार आतंकवादी आ जाते और गोली चलाकर कुछ लोगों को मार डालते, इससे ज्यादा तो कुछ नहीं होता। इसके बावजूद भाजपा कार्यकर्ताओं को तिरंगा फहराने नहीं दिया गया। वे तो प्राणों की आहुति देने को भी तैयार थे। उन्हें पठानकोट और माधवपुर में रोक दिया गया। क्या आप अमन-चैन के बहाने राष्ट्र-ध्वज को फहराने से किसी को रोक सकते हैं? दरअसल भारत सरकार के पास कोई साहस ही नहीं है; नहीं तो कोई कड़ा कदम उठाती।

Que. केंद्र द्वारा नियुक्त वार्ताकारों का दल कश्मीर समस्या को सुलझाने की दिशा में क्या कुछ आवश्यक पहल कर पाएगा, आपको क्या लगता है?
Ans. सबसे मुख्य बात है कि वार्ताकारों में किसी को भी जम्मू-कश्मीर की स्थानीय भाषा की जानकारी नहीं है। फिर ये त्रि-सदस्यीय वार्ताकार स्थानीय लोगों की भाषा कैसे समझते होंगे। मुझे तो इसी बात पर हैरानी हो रही है। राज्य के संदर्भ में आवश्यक पहल तो दूर की कौड़ी है।

Que. जम्मू-कश्मीर से संबंधित आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट (एएफएसपीए) को हटाने या इसके नियमों में ढील देने की मांग उठती रहती है, कहां तक उचित है?
Ans. कुछ नहीं, यह केंद्र और राज्य सरकार कर रही है। ये बेकार का प्रोपेगंडा है। यदि इसमें संशोधन होगा तो सेना के पास कार्य करने का कोई रास्ता नहीं बचेगा, उसके हाथ बंध जाएंगे।

गुरुवार, जनवरी 06, 2011

सूरीनाम में सूर्य कुंभ आयोजन समिति के अध्यक्ष श्री रामधनी से बातचीत-

दक्षिण अमेरिकी देश सूरीनाम में 14 जनवरी से सूर्य कुंभ पर्व का आयोजन किया जा रहा है। इसका उद्घाटन वहां के राष्ट्रपति श्री देसी बोतरस करेंगे। देश की राजधानी पारामारीबो में सूरीनाम नदी के तट पर आयोजित होने वाले इस कुंभ मेले का समापन 18 फरवरी को होगा। देश के इतिहास में इस प्रकार के मेले का आयोजन पहली बार हो रहा है। इसको लेकर सूरीनाम के अलावा त्रिनिडाड, अमेरिका, नार्वे, फ्लोरिडा, नीदरलैंड; आदि देशों के हिंदुओं में काफी उत्साह है। इस पर्व में भारत और सूरीनाम सहित दुनिया के सैंकड़ो विद्वान हिस्सा लेंगे। इस संदर्भ में पवन कुमार अरविंद ने नई दिल्ली से सूरीनाम में दूरभाष पर “सूर्य कुंभ पर्व आयोजन समिति” के अध्यक्ष श्री महेंद्र प्रसाद रूदी रामधनी से बातचीत की है। प्रस्तुत है अंश-

Que. कुम्भ पर्व के आयोजन की प्रेरणा आपको कहां से मिली?

Ans. इसकी प्रेरणा मुझे आचार्य शंकर से मिली। आचार्य जी सूरीनाम के कारीगांव के निवासी हैं। वह हालैंड व सूरीनाम में सनातन धर्मसभा के अध्यक्ष हैं। उन्होंने ही मुझे इस कार्य के लिए प्रेरित किया। समय-समय पर उनसे आवश्यक सुझाव भी मुझे मिलता रहता है।

Que. इसके आयोजन का स्वरूप क्या है?

Ans. इस आयोजन में सभी लोगों का हार्दिक स्वागत है। हमें उम्मीद है कि इसमें सूरीनाम के बाहर के लोग भी भारी संख्या में हिस्सा लेंगे। सूरीनाम व भारत के अलावा त्रिनिडाड, अमेरिका, नार्वे, गुयाना, फ्लोरिडा, नीदरलैंड समेत दुनिया के कई देशों के विद्वानों को भी आमंत्रित किया गया है, जो विश्व में सुख-शांति की स्थापना और सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार सहित कई गंभीर विषयों पर चिंतन-मंथन करेंगे।
पर्व के दौरान सूरीनाम के सभी मंदिरों से कलश पूजन करके कुंभ परिसर में लाया जाएगा। कलश पूजन में हिस्सा लेने वाले लोग कुंभ के दौरान भजन-कीर्तन भी करेंगे, ऐसी योजना बनाई गई है। इस दौरान श्रद्धालु वैरागी अखाड़ा के भारतीय संत स्वामी ब्रह्मस्वरूपानंद जी महाराज के प्रवचन का आनंद भी उठा सकते हैं। वे पिछले कई वर्षों से विदेशों में रामकथा व भागवतकथा के माध्यम से भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रचार-प्रसार के कार्य में सक्रिय हैं।

Que. कुंभ मेला भारत में लगता है, फिर सूरीनाम में आप क्यों आयोजित कर रहे हैं?

Ans. हम लोग भारतीय मूल के हैं। हमारे पूर्वज आज से करीब 170 वर्ष पूर्व गिरमिटिया मजदूर के रूप में सूरीनाम और त्रिनिडाड; आदि देशों में आए थे। भारतीय मूल का होने के कारण वहां की संस्कृति और सभ्यता से गहरा जुड़ाव है। सूरीनाम की जनसंख्या करीब पांच लाख है, जिसमें करीब 38 प्रतिशत हिंदू हैं। भारत में जो कुंभ लगता है उसका बहुत बड़ा महत्व है। उसके आयोजन का महात्म्य समुद्र मंथन से जुड़ा है। भारत में हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन में हर बारहवें एवं छठवें वर्ष क्रमशः कुंभ व अर्द्धकुंभ मेले का आयोजन होता है। इन आयोजनों में विश्व भर के लाखों लोग हिस्सा लेते हैं। इसके अलावा ऐसे भी लोग हैं जिनको आर्थिक कारणों से भारत पंहुचना संभव नहीं हो पाता। उनके लिए इसके विकल्प के तौर पर सूरीनाम में कुम्भ मेले का आयोजन किया जा रहा है। मुझे विश्वास है कि यह आयोजन उन सभी प्रवासी भारतीयों के लिए एक वरदान साबित होगा, जो भारत पंहुच कर माघ स्नान का पुण्य नहीं प्राप्त कर सकते।

Que. इसके आयोजन का क्या उद्देश्य है?

Ans. सूरीनाम में सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार ही इस आयोजन का उद्देश्य है। इसके अलावा सनातन धर्म को मानने वाले दुनिया के सभी साधु-संत और विद्वान एक जगह एकत्रित होकर विश्व के लिए सुख शांति का मार्ग खोज सकें, भी उद्देश्य है। इसके आयोजन के लिए ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती समेत कई संतों ने शुभकामनाएं दी हैं।

Que. विश्व शांति में भारतीय संस्कृति और सभ्यता का क्या योगदान है?

Ans. मेरे विचार से भारतीय संस्कृति और सभ्यता को ही सनातन धर्म कहा जाता है। दुनिया में इसके प्रचार का उद्देश्य सभी मत, पंथ और सम्प्रदाय के लोगों में एकता स्थापित करना है। मुझे यह विश्वास है कि सनातन धर्म सत्य पर आधारित है और सत्य की स्थापना से ही विश्व में शांति की स्थापना हो सकेगी।

Que. अपने बारे में कुछ बताइए?

Ans. मेरी पैदाइश और शिक्षा-दीक्षा सूरीनाम में हुई। शिक्षा के बाद मैंने व्यापार शुरू किया। ईश्वर की कृपा से मेरा व्यवसाय ठीक चल रहा है। समाजिक कार्यों को करने से मानसिक शांति की अनुभूति होती है। इसलिए जब तक शरीर में सांस है, करते रहने का प्रयास करता रहूंगा।

बुधवार, दिसंबर 15, 2010

श्रीरामचरितमानस का डच भाषा में अनुवाद करने वाले श्री रामदेव कृष्ण से पवन कुमार अरविंद की बातचीत-

भारतीय मूल के हालैंड निवासी अध्यापक व प्रसिद्ध नाट्यकर्मी श्री रामदेव कृष्ण ने तुलसीदास की श्रीरामचरितमानस का डच भाषा में अनुवाद किया है। यह गद्य रुप में है। इसका लोकार्पण 14 जनवरी 2011 को सूरीनाम में पहली बार आयोजित होने वाले कुंभ मेले के दौरान वहां के राष्ट्रपति श्री देसी बोतरस द्वारा किया जाएगा। श्री रामदेव इस सप्ताह अपने त्रि-दिवसीय दौरे पर भारत आए थे। इस दौरान उन्होंने दिल्ली के संकटमोचन आश्रम में सोमवार (13 दिसम्बर) को आयोजित एक सादे समारोह में डच भाषा में अनूदित ग्रंथ की पाण्डुलिपि की सीडी विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अशोक सिंहल को सौंपी। इस कार्यक्रम के तत्काल बाद पवन कुमार अरविंद ने श्री रामदेव से विस्तृत बातचीत की है। प्रस्तुत है बातचीत के अंश-

Que. तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस का डच भाषा में अनुवाद करने की प्रेरणा आपको कहां से मिली ?

Ans. श्रीरामचरितमानस के अनुवाद की प्रेरणा मुझे वैरागी अखाड़ा के संत स्वामी ब्रह्मस्वरूपानंद उपाख्य स्वामी ब्रह्मदेव से मिली। उन्होंने ही मुझे इस कार्य के लिए प्रेरित किया और समय-समय पर आवश्यक सुझाव दिए, जिसके कारण आज ये संभव हो पाया है। स्वामी जी भारतीय संत हैं। उनका मुख्य आश्रम त्रिनिडाड में है। इसके अतिरिक्त अमेरिका, नार्वे, सूरीनाम, फ्लोरिडा; आदि देशों में भी आश्रम है। वे पिछले कई वर्षों से विदेशों में रामकथा व भागवतकथा के माध्यम से भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रचार-प्रसार के कार्य में सक्रिय हैं।

Que. अनुवाद के दौरान आपको भाषा की क्या-क्या दिक्कतें आईं ?

Ans. मैं अपने जीवन के 18-19 वर्षों तक हिंदी और डच भाषा नहीं जानता था। हिंदी में केवल हाँ और ना की ही जानकारी थी। डच भाषा को मैं राक्षसी भाषा मानता था। लेकिन यह जानकारी जब स्वामी ब्रह्मस्वरूपानंद जी को हुई; तो उन्होंने मुझे कहा कि शर्म करो, तुम भारतीय मूल के हो; फिर भी हिंदी नहीं जानते। स्वामी जी के इस कथन के बाद मैंने हिंदी के साथ डच भाषा भी सीखी। इसके बाद मैंने डच और हिंदी भाषा की एक किताब लिखी, ताकि डच लोग भी हिंदी सीख सकें।

Que. डच भाषा की लिपि क्या है ?

Ans. रोमन।

Que. श्रीरामचरितमानस की विषय-वस्तु को जानने-समझने में यदि किसी और माध्यम या व्यक्ति ने आपकी मदद की हो, उसके बारे में बताइए ?

Ans. श्रीरामचरितमानस और उसके प्रमुख पात्र मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के व्यक्तित्व को जानने-समझने में डीडी-1 चैनल पर प्रसारित होने वाले रामानंद सागर की प्रसिद्ध हिंदी धारावाहिक रामायण ने मुख्य भूमिका अदा की। रामानंद सागर के धारावाहिक को मैंने अपना गुरू माना। इसके पहले मैंने कभी रामायण नहीं पढ़ी थी। लेकिन धारावाहिक देखने के बाद मैं रामायण पढ़ने के लिए उत्सुक हुआ। जितनी बार पढ़ता, उतनी बार कुछ न कुछ नयी जानकारियां मिलीं। जिससे अनुवाद में काफी सहूलियत हुई।

Que. अनुवाद का कार्य आपने कितने दिनों में पूरा किया ?

Ans. अनुवाद करने में कुल 20 महीने का समय लगा। मैं प्रतिदिन 18 घंटे कार्य करता था और शेष 6 घंटे सोने और नियमित दिनचर्या में लगाता था। इस दौरान मेरी पत्नी श्रीमती नसीम कृष्ण का विशेष सहयोग मिला। बिना उनके सहयोग के यह कार्य संभव नहीं था। वे कॉफी बना-बनाकर मुझे देती रहती थीं और मैं केंद्रित होकर अनुवाद के कार्य में लगा रहता था। अनुवाद के साथ ही पुस्तक के लिए लेआउट, तुलसीदास जी की पेंटिग्स, बजरंगबली की पेंटिग्स भी बनाया।

Que. क्या आप श्रीरामचरितमानस के बाद भी किसी अन्य ग्रंथ या साहित्य का डच भाषा में अनुवाद करने की सोच रहे हैं ?

Ans. इसके बाद मैं तुलसीदास रचित एक अन्य साहित्य “वैराग्य संदीपनी” का डच भाषा में अनुवाद करुंगा। मेरा प्रयास होगा कि यह कार्य भी शीघ्र सम्पन्न हो जाए।

Que. इसके अतिरिक्त आपकी और क्या योजनाएं हैं ?


Ans. मेरी योजना भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़ी “फ्राम हे राम टू श्रीराम” नामक एक नाटक पर कार्य करने की है। यह तीन भागों में होगा। जिसमें इतिहास, रामचिरतमानस और महात्मा गांधी से जुड़ी विषय-वस्तु का समावेश होगा।

Que. यह नाटक लिखने का आपका क्या उद्देश्य है ?

Ans. इस नाटक के माध्यम से मैं यह बताना चाहता हूं कि जब 150 से 170 वर्षों पूर्व हमारे पूर्वज गिरमिटिया मजदूर के रूप में सूरीनाम, हॉलैंड, त्रिनिडाड आदि देशों में आए तो क्या कारण था कि श्रीरामचरितमानस को भी साथ लाये। महात्मा गांधी ने क्यों मरते वक्त हे राम का उच्चारण किया था, आदि। इन सब बातों से जुड़े प्रश्नों का विस्तृत ढंग से वर्णन करूंगा। ताकि लोग राम के महत्व को आसानी से समझ सकें।

Que. इसके अलावा आपकी कोई और उपलब्धि हो, तो बताइए ?


Ans. श्रीरामचरितमानस का अनुवाद कार्य शुरू करने से पूर्व मैंने रामलीला का आयोजन किया था, जिसमें सभी पात्र हिंदी में बोलते थे। मैं समझता हूं कि पात्रों का हिंदी में वाद-संवाद करना मेरी बड़ी उपलब्धि है। इसके अतिरिक्त हनुमान चालीसा का डच में अनुवाद करूंगा।

Que. अपने बारे में कुछ बताइए ?


Ans. मेरी पैदाइश सूरीनाम में हुई। शिक्षा-दीक्षा सूरीनाम और हॉलैंड में हुई। मैं हॉलैंड के माडर्न स्कूल में अध्यापक हूं। मेरे पूर्वज भारतीय राज्य राजस्थान की राजधानी जयपुर के रहने वाले और मेरी पत्नी के पूर्वज कलकत्ता के निवासी हैं। वे लोग गिरमिटिया मजदूर के रूप में करीब 150 से 170 वर्षों पूर्व सूरीनाम और त्रिनिडाड गए थे और वहीं के होकर रह गए।

बुधवार, अप्रैल 08, 2009

स्वघोषित तंत्र ही प्रचंड का लोकतंत्र

नेपाली जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामचन्द्र राय से पवन कुमार अरविन्द की बातचीत
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नेपाल की राजनीति में मधेशी नेता के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले रामचन्द्र राय, 1981, 86 और 94 में नेपाल की संसद में सरलाही संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। 1991 में आरपीपी केन्द्रीय समिति के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रह चुके श्री राय 2004 में गिरिजा प्रसाद कोईराला के नेतृत्व वाली संयुक्त सरकार में भूमि सुधार एवं प्रबन्धन राय मन्त्री रहे हैं। सम्प्रति, नवम्बर, 2007 से नेपाली जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। पिछले सप्ताह द्वि-दिवसीय दौरे पर भारत आये श्री राय से दिल्ली में पवन कुमार अरविन्द ने बातचीत की। प्रस्तुत है इसके प्रमुख अंश :


OUE. प्रचण्ड के नेतृत्व वाली सरकार नेपाली जनता की अपेक्षाओं पर कहां तक खरा उतर पा रही है ?

ANS. सत्ता में आने के बाद प्रचण्ड सरकार ने नेपाली जनता की सारी अपेक्षाओं पर पानी फेर दिया है। यह सरकार जनता की आकांक्षाओं पर खरी नहीं उतर पा रही है। अभी हाल में माओवादियों ने काठमाण्डू शहर में दिनदहाड़े लूट-पाट करके तीन से अधिक लोगों को गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया। इस सरकार में जनता को शांति और सुरक्षा की कोई अनुभूति नही है। माओवादियों के आतंक की दहशत आज भी नेपाली जनता में बरकरार है।


QUE. माओवादी आन्दोलन का लक्ष्य राजतन्त्र को हटाकर लोकतन्त्र की स्थापना करना था। सत्ता में आने के बाद प्रचण्ड क्या लोकतान्त्रिक रास्ते पर चल रहे हैं?

ANS. आन्दोलन के दौरान प्रचण्ड के भाषणों से ऐसा लग रहा था कि नेपाल अब पूर्ण लोकतान्त्रिक राय बन जायेगा, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं हुआ। राजतन्त्र से भी बदतर स्थिति नेपाल और नेपाली जनता की हो गयी है। प्रचण्ड के राय संचालन का जो तरीका है, वह देश के हित में नहीं है। प्रचण्ड, लोकतान्त्रिक रास्ते पर न चलकर, दबाव की राजनीति कर रहे हैं। सत्ता पर कब्जा करने के उद्देश्य से माओवादी, राजनीतिक नेताओं और जनसामान्य को डरा-धमका रहे हैं। प्रचण्ड के नेतृत्व में माओवादी देश पर एकाधिकार कर लेना चाहते हैं। लोकतन्त्र से उनका कोई सरोकार नहीं है। प्रचण्ड का स्वनिर्मित तन्त्र ही उनका अपना लोकतन्त्र है।


QUE. राजतन्त्र से लेकर लोकतन्त्र तक की यात्रा में, भारत-नेपाल सम्बन्धों पर क्या असर पडा है?

ANS. असर पडा है। नेपाल में भारत विरोधी गतिविधियों में वृध्दि हुई है। पहले सरकार भारत की ओर देखती थी, अब चीन की ओर देख रही है। सरकार की चीन से नजदीकी बढी है।


QUE. मठ-मन्दिरों की क्या स्थिति है?

ANS. धार्मिक कार्यों के प्रति सरकार का रवैया सहयोगात्मक नहीं है। मन्त्रिमण्डल द्वारा धार्मिक कार्यों के लिए दी जाने वाली आर्थिक सहायता बन्द कर दिया गया है। मठ-मन्दिरों की सम्पत्ति को हड़पने के उद्देश्य से माओवादी कार्यकर्ताओं द्वारा पुजारियों को अपमानित किया जा रहा है, जिससे कि वह राजीनामा के लिए बाध्य हो जायें। पशुपतिनाथ मन्दिर पुजारी विवाद भी इसी की एक कड़ी है।


QUE. पशुपतिनाथ मन्दिर पुजारी विवाद मामले में आपका क्या कहना है?

ANS. पशुपतिनाथ मन्दिर के परम्परागत दक्षिण भारतीय पुजारी सनातन परम्परा के प्रतीक हैं। जगद्गुरू शंकराचार्य के द्वारा सनातन धर्म के प्रसार व उत्थान के लिए किये गये प्रयासों के क्रम में, शिवक्षेत्र नेपाल में पशुपतिनाथ की स्थापना की गयी थी। शिव पुराण के अनुसार, केदारनाथ से लेकर वर्तमान काठमाण्डू तक भगवान का एक ही विग्रह है, जिसका सिर काठमाण्डू में और पैर केदारनाथ में है। इसलिए द्वादश योतिर्लिगों के दर्शन के साथ पशुपतिनाथ का दर्शन, दर्शन की पूर्णता के लिए अनिवार्य किया गया। कुल मिलाकर शंकराचार्य का प्रयास भारत और नेपाल की सांस्कृतिक एकता के लिए था। शंकराचार्य के समय से ही भारतीय पुजारियों का चयन होता रहा है। सत्ता में आने के बाद माओवादियों नें खासकर उन विषयों पर विवादों को जन्म दिया है, जो भारत और नेपाल के बीच सांस्कृतिक सम्बन्धों के प्रतीक हैं। माओवादियों की इच्छा नेपाल की संस्कृति को पूरी तरह भ्रष्ट-नष्ट करने की है। सबसे खास बात यह है कि माआवादियों का ईसाईयों और मुसलमानों के साथ व्यवहार खराब नहीं है। मुसलमानों को हज करने के लिए 50% अनुदान अर्थात 1 लाख, 25 हजार रूपये प्रतिव्यक्ति देने की घोषणा सरकार कर चुकी है। नेपाल में 3.75% ईसाई और 2.5% मुसलमान हैं। सरकार ने मदरसा की शिक्षा को राष्ट्रीय शिक्षा में सम्मिलित करके मदरसा बोर्ड का गठन किया है। माओवादियों की प्रबल इच्छा अपने कार्यकर्ताओं को पुजारी के रूप में स्थापित करके हिन्दुत्व को समाप्त करना है।


QUE. मन्दिर मुद्दे पर प्रचण्ड सरकार का, क्या भारत विरोधी रूख उजागर नहीं होता?

ANS. उजागर होना स्वाभाविक ही है।


QUE. नेपाल के विकास के लिए सरकार का रवैया कैसा है?

ANS. विकास के लिए कोई सोच नहीं है। व्यापारियों को विस्थापित होने पर मजबूर किया जा रहा है। कल-कारखाने बन्द पडे हैं। व्यापार विनिमय घाटे में जा चुका है। देश में गरीबी बढ़ने के आसार बढ़ गये हैं। और जहां तक शिक्षा का प्रश्‍न है तो नेपाल में सांस्कृतिक शिक्षा का अभाव है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था नेपाल के हित में नहीं है।


QUE. गरीबी बढ़ने के आसार क्यों बढ़ रहे हैं ?

ANS.नेपाल में गरीबी बढ़ने के कई कारण हैं। इनमें से एक कारण है, गरीबी उन्मूलन के लिए सरकार के पास ठोस नीति का अभाव है। दूसरा, आय-स्रोत का अधिकतम हिस्सा सेना पर खर्च हो रहा है। बहुत बड़ी सेना की आवश्यकता नहीं है। पहले 25 हजार सेना से ही काम चल जाता था, लेकिन अब 15 हजार प्रचण्ड की सेना भी जुड़ गयी है।

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