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शुक्रवार, अप्रैल 08, 2011

अन्ना की मुहिम को आरएसएस का समर्थन

नई दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रख्यात समाजसेवी किशन बापट बाबूराव हजारे उपाख्य अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार के खिलाफ भूख हड़ताल का शुक्रवार को चौथा दिन था। इस दिन अपराह्न 3.30 बजे राष्ट्रीय स्वयंसेवस संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य श्री राम माधव, श्री मधुभाई कुलकर्णी और डॉ. बजरंग लाल गुप्ता भी मंच पर पहुंचे। संघ के इन वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का योग गुरु स्वामी रामदेव ने स्वागत किया। इस दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अन्ना हजारे की मुहिम को समर्थन का पत्र भी सौंपा गया। श्री राम माधव सहित संघ के सभी पदाधिकारी मंच पर करीब 15-20 मिनट रहे। नीचे प्रस्तुत चित्रों को "वी.एच.वॉयस" न्यूज वेब-पोर्टल की टीम ने अपने कैमरे में कैद किया है। हालांकि अन्ना ने अपना अनशन शनिवार को पूर्वाह्न 10.30 बजे तोड़ दिया।










राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा सौंपे गए समर्थन का पत्र-

गुरुवार, मार्च 03, 2011

कश्मीर मसले पर पूरा देश एकजुट

डॉ. मोहनराव मधुकर भागवत

कश्मीर की समस्या सारे भारत की समस्या है। इसका समाधान जिसको करना चाहिए वे किसी भी कारण इस कार्य में यदि यशस्वी नहीं हो रहे, तो ऐसा प्रतीत होता है कि इसके पीछे या तो उनके इरादे ही गलत हैं या फिर व इस समस्या को हल करना ही नहीं चाहते। बात स्पष्ट है कि इसके समाधान के लिए प्रजातंत्र की वास्तविक सत्ता यानी जनता को जागृत करना पड़ेगा। सारा भारत आंदोलन के रूप में कब और कैसे खड़ा होगा, यह तय करने व सोचने की बात है। लेकिन अन्ततः यही करना पड़ेगा।

संघ के स्वयंसेवक देश भर में कश्मीर विषय को लेकर प्रत्येक घरों में सम्पर्क कर रहे हैं। इस सम्पर्क में कश्मीर के संदर्भ में वर्तमान की स्थिति क्या है, क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए, आदि बिंदुओं को लेकर सम्पर्क किया जा रहा है। क्योंकि सबसे पहली बात यह है कि कश्मीर के खिलाफ जो षड्यंत्र चल रहे हैं, उन षड्यंत्रों से आमजन को विदित कराना आवश्यक है। भारत के आम आदमी को कश्मीर की वास्तविक स्थिति को समझना पड़ेगा। संघ ने इसके लिए सतत कार्य किया है और आगे भी करता रहेगा। इसके समाधान का रास्ता किन जंजालों से हमें निकालना पड़ेगा, इसके बारे में विचार करने की आवश्यकता है।

अब भारत का कोई भी व्यक्ति कश्मीर का देश से कटना बर्दाश्त नहीं करेगा। परिस्थितियां बहुत कठिन हैं। षड्यंत्र चारों ओर से चल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय शक्तियां के साथ ही ‘राष्ट्रीय’ व राष्ट्रविरोधी शक्तियां भी इस कार्य़ में लगी हुई हैं। दुर्भाग्य यह कहा जाए कि अपनी सत्ता भी इसी षड्यंत्र में लगी है कि जैसे-तैसे शांति हो जाए, शांति यानी देश की शांति नहीं बल्कि हमारे दिमाग को शांति मिल जाए। अगले चुनाव के लिए वोट का इंतजाम हो जाए। समझौते के कारण ही समस्या बिगड़ी है। हम सबको इसके खिलाफ लड़ना है। गलती में एक विभाजन हो गया, तो इसका एकमेव कारण है यही है कि उस समय हम लोग ताकतवर नहीं थे। जिनके पास ताकत थी उन्होंने जनता को इसके लिए कहा नहीं कि इन षड्यंत्रों का विरोध करो। जो भी उसके गुण-दोष हैं, समीक्षा है, उसको करने वाले करें, जैसा सोचना है हम सोचें, लेकिन हमको फिर से भारत को टूटते नहीं देखना है, यह बात पक्की है। इसी बात को लेकर हम आगे बढ़ेंगे।

एक बात है कि संघ सेकुलर न बने। ये तो हो ही नहीं सकता। अगर मैं भी संघ को सेकुलर बनाना चाहूं, तो नहीं सकता। जो संघ के स्वयंसेवक हैं वो इस बात को अच्छी तरह जानते हैं। जो संघ में गए नहीं उनको शायद ये बात न समझ में आए। डॉ. हेडगेवार ने जो बताया वैसे ही संघ चलेगा, इस संदर्भ में वे इतनी पक्की दिशा देकर चले गए हैं। इसलिए संघ का रुख मोड़ना संघ के सरसंघचालक या किसी भी अखिल भारतीय अधिकारी के बस की बात नहीं है। संघ जिस ध्येय को लेकर चला है वही करने वाला है।

राष्ट्रवादी मुस्लिम वगैरह का जो काम चलता है, वह मुसलमानों के द्वारा मुसलमानों के लिए चलाया गया कार्य़ है। लेकिन वे लोग जैसा कहते हैं, वैसा हुआ तो सबका लाभ होगा। इस बात को ध्यान में रखते हुए दो-तीन कार्यकर्ताओं को इसके लिए कहा है कि उनकी चिंता करें। राष्ट्रवादी मुस्लिम मंच से संघ का संबंध नहीं है। संघ का सिस्टर आर्गनाइजेशन भी कोई नहीं है। संघ की केवल शाखा है। संघ के केवल स्वयंसेवक हैं। संघ के स्वयंसेवक राजनीतिक दल सहित अनेक संगठन चलाते हैं। लेकिन वहां केवल स्वयंसेवक ही नहीं हैं और भी लोग कार्य करते हैं। उनको स्वयं को चलाने की जिम्मेदारी खुद वहन करनी होती है। हां, यदि उनको अच्छा चलने में सहायता चाहिए, तो हम देते हैं। जो बातें वास्तविक हैं वहीं मैं बता रहा हूं। यह कोई डिप्लोमेटिक उत्तर नहीं है।

कश्मीर को लेकर जिन लोगों ने गलतियां की, उसको हम सुधार लेंगे। लेकिन यह बात पक्की है कि इसके समाधान के लिए हमें जो करना है, बिना गलती से करना है। और बिना गलती के करने के लिए कुछ बातें ध्यान में रखनी है। ये बातें ध्यान में न रखने के कारण ही ये प्रसंग आया है।

स्वतंत्रता के इतने वर्षों पश्चात भी हमको यहां बैठकर कश्मीर का विचार करना पड़ता है। पहली बात है कि भारत एकात्म अखंड है, हिंदू राष्ट्र है, इसमें कोई समझौता नहीं, क्योंकि यह सत्य है। इससे समझौता करने वाले आगे ठोकरें खाएंगे और सबके लिए संकट आएगा। अन्यान्य शब्दों में दुनिया के सभी लोग ऐसा मानते हैं, कुछ लोग अपनी इच्छा से मानते हैं और कुछ लोग गफलत में कभी-कभी मान लेते हैं। यह सत्य है, तो सत्य से विमुख होना किसी के लिए फायदे की बात नहीं है।

आज अपना जितना बस चलता है उतना बोलना चाहिए। स्वतंत्रता के बाद जो भारत बना, कश्मीर का जो एक्सेशन और मर्जर हुआ, वह एक तथ्य है। पूरे कश्मीर को भारत में लाने के लिए के संदर्भ में संसद ने जो प्रस्ताव पारित किया है वह ठीक है। वहां बसने वाले सात लाख तथाकथित पाकिस्तान से आए हिंदू इस नए भारत के नागरिक बनकर पूर्ण सत्ता के साथ मिलकर कैसे रहें और जो चार लाख कश्मीरी विस्थापित हिंदू जो अपने जन्मभूमि से बिछड़े हैं, वो फिर से वहां अपनी सुरक्षा और आत्मसम्मान के साथ कैसे रह सकें, इसी दिशा में सारी बातें करनी चाहिए।

कश्मीर के संबंध में जो कुछ भी बोलना या करना हो उसका लक्ष्य वही होना चाहिए। यदि रणनीति के नाम पर कुछ करना भी है तो यह भी तय करना चाहिए कि इधर-उधर जाकर वापस हम उसी रास्ते पर आएंगे। ऐसी कोई भी रणनीति जो हमें अलग मुकाम पर पहुंचाती है, हमें पसंद नहीं है। कश्मीर की ऑटोनामी आजादी के बाद भी हमको सिरे से खारिज करना है। वहां जो भारत भक्त हैं उनकी शक्ति बढ़े, इसके लिए हमें प्रयास करना चाहिए। अलगाववादी कितना भी दावा करें लेकिन इस पर ध्यान न देते हुए हमको बात करनी है जम्मू और लद्दाख की, कश्मीरी विस्थापितों की, सात लाख पाकिस्तान से आए हिंदुओं की, कश्मीर घाटी में 33 हजार सिख भी हैं; उनकी। वहां और भी लोग हैं जो भारत परस्त हैं। यह सरकार इनके हित में कदम नहीं उठा रही है, सोच समझ कर उल्टा कर रही है।

आप और हम जो बातें जानते हैं वो सर्व-समर्थ सत्ता के लोग नहीं जानते यह तो हो ही नहीं सकता। इन सभी समस्याओं का एक ही हल है कि भारत की जनता का पूर्ण दबाव इस मुद्दे पर खड़ा हो, तो ये बातें बदलेंगी।

दूसरी बात है कि कश्मीर समस्या का हल भारत के हित में करना है। अब तो अंतरराष्ट्रीय शक्तियां भी खुल कर आ गई हैं। पहले भी थे, लेकिन अब खुलकर सामने आ गए हैं। अन्य जगहों से उनके पैर उखड़ गए, हो सकता है कि इनमें से किसी के साथ अपने संबंध दोस्ती के हों, कोई पड़ोसी मुंह से दोस्ती करता है चीन जैसा और अंदर ही अंदर पीठ में छूरा भोंकता है। अमेरिका जैसे भी दोस्त हैं, लेकिन इन दोस्तों के लिए हमको ठीक नहीं करना है, इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए।

जैसे अमेरिका या चीन अपने मामलों में किसी अन्य देश को सहन नहीं करते, वैसा ही हमको भी करना चाहिए। अब हमारी ताकत भी कम नहीं है। जितनी हमको इन लोगों की जरूरत है उससे ज्यादा इन लोगों को हमारी जरूरत है। आज वार्ताकार जो कर रहे हैं, सत्ताधारी पार्टियों के लोग समझते नहीं हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता।

एक बात हम लोगों को करनी चाहिए, दिल्ली में हम लोग रहते हैं योजना बनाकर अच्छी तरह से कर सकते हैं। जितने सांसद हैं उन सबके सामने यहां की जानकारी के आधार पर कश्मीर की वास्तविक स्थिति को रखा जाए, पार्टी की न सोचें, हमारे विरोध में चलने वाली पार्टी भी हो सकती है, लेकिन व्यक्ति को सोचें। विरोधी पार्टियों के सांसदों से भी हम मिलें। कम से कम इतना तो होगा कि देश विरोधी काम करने में उनकी जो ताकत लगती है वो कम हो जाएगी।

तीसरी बात यह है कि जनजागरण के ज्यादा और अच्छे कार्यक्रम हों। इसके लिए हम सबको प्रयास करना पड़ेगा। अभी जनसम्पर्क अभियान में हमने संघ के खिलाफ कथित दुष्प्रचार मामले के साथ ही राममंदिर निर्माण और कश्मीर के मुद्दे को भी शामिल किया था। यदि ऐसा हम सफलतापूर्वक कर ले गए तो कश्मीर के खिलाफ बोलने वाला या कश्मीर को देने की बात करने वाला कम से कम 50 वर्षों तक जनता के मन से उतर जाएगा।

भारतीय जनता इस बात पर एकमत है कि कश्मीर जाएगा नहीं, जितना गया उतना ही गया। जन दबाव बनेगा तो विरोधियों की गति भी धीमी पड़ जाएगी। जनजागरण के लिए चार या पांच पृष्ठों की छोटी पुस्तिकाओं के माध्यम से जिसमें कश्मीर मामले का वास्तविक विवरण हो, को लेकर हमको सम्पर्क करना चाहिए। इसके लिए किसी से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। यह चरण प्रारम्भ कर दें, बाकी हम सोचते हैं। सोचते माने सोचेंगे नहीं, बल्कि एकदम सोचेंगे ही। इसके लिए हमको करना है, यह बात पक्की है। मैं विश्वास दिलाता हूं कि यदि हम लोग पूरे मन से इस दिशा में लगे तो यह समस्या अगले दस वर्षों में समाप्त हो जाएगी।

(प्रस्तुत आलेख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव मधुकर भागवत द्वारा “जम्मू-कश्मीर : वर्तमान परिदृश्य” विषयक परिचर्चा में दिए गए उद्बोधन का संपादित अंश है। परिचर्चा का आयोजन ‘जम्मू-कश्मीर पीपल्स फोरम’ के तत्वावधान में 27 फरवरी 2011 को दिल्ली स्थित दीनदयाल शोध संस्थान में किया गया था।)

रविवार, फ़रवरी 21, 2010

राजनीति में स्वयंसेवक व्रत निभाएं : मोहनराव भागवत


डॉ. मोहनराव मधुकर भागवत------
'माई कंट्री-माई लाइफ’ पुस्तक के बारे में बोलने के लिए मुझे कहा गया है। वस्तुतः आडवाणी जी और मुझमें आयु की दृष्टि से लगभग एक पूरी पीढ़ी का अंतर है। उनसे बहुत ज्यादा व्यक्तिगत् सम्बंध बनाने का अवसर भी नहीं आया। पुस्तक भी दो दिन पहले मिली। लगभग 900 पृष्ठों की पुस्तक दो दिन में पढ़ना संभव नहीं था। निमंत्रण मिला तो मैं विचार करने लगा कि मैं इस कार्यक्रम में उपस्थित रहूं, इसका आग्रह क्यों है। तुरंत मुझे ध्यान में आया कि आडवाणीजी भी स्वयंसेवक हैं और मैं भी स्वयंसेवक हूं। यहां पर मेरी उपस्थिति का यही एकमेव कारण बनता है।

अब स्वयंसेवकत्व का रिश्ता क्या होता है। वास्तव में जो स्वयंसेवक है, वही अपने अनुभव से इसे समझ सकता है। बाहर के व्यक्ति के लिए इसकी कल्पना करना भी कठिन है, समझना तो दूर की बात है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक कोई 'मेंबर' नहीं है, वह सिर्फ एक विचारधारा को पकड़कर कार्य करने वाला कार्यकर्ता भी नहीं होता है। उसका जो जीवन होता है वह जीवन ही स्वयंसेवकत्व का द्योतक होता है। ह्रदय में अपनी अस्मिता के प्रति पूर्ण गौरव, मातृभूमि के अखण्ड रूप की सतत्- उत्कट भक्ति, कथनी और करनी समान रहे, ऐसा जीवन बिताने की उत्कृष्टता और कुशलता का सतत् अभ्यास और प्रयास, इसके पूर्व अपने देश, अपने समाज के प्रत्येक व्यक्ति के साथ निरपेक्ष, निर्मोही आत्मीयता जिसे गीता में अनभिस्नेह कहा है, यही आत्मीयता संघ कार्य का आधार है।

देश में कुछ लोग विद्वेष को आधार बनाकर काम करते हैं पर स्वयंसेवक ऐसा नहीं करता, कर नहीं सकता। स्वयंसेवकत्व का पहला और प्रमुख लक्षण है- देश और समाज के प्रति निर्मल आत्मीयता। और ऐसे ही एक स्वयंसेवक हैं आडवाणीजी। इसीलिए पीढ़ी में, आयु में छोटा होने के कारण, यद्यपि संबंध भी अभी नए ही बने हैं, पुस्तक पढ़ी या नहीं पढ़ी, लेकिन स्वयंसेवक के नाते के कारण उन्हें ऐसा लगा कि इस अवसर पर मेरी उपस्थिति भी होनी चाहिए, सो मैं यहां उपस्थित हूं।

पूरी पुस्तक तो मैंने नहीं पढ़ी लेकिन उसकी प्रस्तावना और मनोगत को मैंने ध्यान में लिया है। मैंने पुस्तक के प्रारंभ में उल्लिखित समर्पण पत्र भी पढ़ा। इसके चार चरण है। पहले चरण में पुस्तक सर्वप्रथम भारत की जनता को समर्पित की गई है। दूसरे चरण में इसे सहयोगी कार्यकर्ताओं को अर्पित किया गया है। तीसरे में उन दो महापुरुषों को पुस्तक समर्पित की गई है, जिन्होंने जीवन में प्रेरणा पैदा की- श्रद्धेय राजपाल जी पुरी और श्रद्धेय पंडित दीनदयाल उपाध्याय। और चौथा, सहज ही परिवार को, क्योंकि एक व्यक्ति के नाते सफलता का श्रेय तो व्यक्ति को मिलता है लेकिन उसके पीछे परिवार की मूल भूमिका रहती है।

किसी स्वयंसेवक से उसके जीवनवृत्त के लेखन के लिए जो अपेक्षा की जाय तो वैसा ही समर्पण पत्र लिखा है आडवाणीजी ने। समाज के लिए स्वयंसेवक काम करता है, परस्पर आत्मीयता से काम करता है और काम करते समय मार्गदर्शन के लिए उसके बीच दीप स्तंभ के समान कुछ जीवन होते हैं, जीवंत और प्रेरणादायी...। कोई कहानियों से या चरित्र पढ़कर ही हम प्रेरणा नहीं लेते, वरन् प्रत्यक्ष जीवन हम देखते हैं, अपनी आंखों के सामने... उनका परिचय और चरित्र पढ़कर हमने उन्हें नहीं जाना, प्रत्यक्ष जीवन हमने देखा है, ऐसे आदर्श जीवन जो हमारे जीवन को एक ध्येयमार्ग पर प्रेरित करते रहे, ऐसे श्रेष्ठ और आदर्श जीवन संघ में हमने देखे हैं।

और ऐसा हमारा भी जीवन बने, तो इसके लिए कर्तत्व स्वयं करना पड़ता है, लेकिन पीछे जो परिवार होता है, उसे भी व्रत लेना पड़ता है। आदर्श के लिए परिवार भी व्रतस्थ हो जाता है तो इस प्रकार की सभी बातों को मिलाकर एक स्वयंसेवक का जीवन बनता है।

स्वयंसेवक का जीवन आज के जमाने में, और वह भी राजनीति में! स्वयंसेवक जीवन का यापन राजनीति में सचमुच बहुत कठिन है। सभी लोग इस बात को जानते और समझते हैं। लेकिन जीवनयापन करना पड़ता है, करना है, इसलिए यह स्वयंसेवक व्रत और भी कठिन हो जाता है।

मैं एक कहानी सुनाता रहता हूं। भारतीय जनता पार्टी में काम करने वाले जो लोग यहां बैठे हैं, उनको मैंने पहले भी यह कहानी सुनाई थी। विशेषकर राजनीति में काम करने वाले हमारे स्वयंसेवक कार्यकर्ताओं को क्या करना है, और वह कितना कठिन है, फिर भी उसे क्यों करते रहना है, इसका दर्शन कराने वाली यह एक छोटी सी पुरानी कहानी है।

एक गांव में प्रत्येक घर-झोपड़ी में गृहस्थ लोग रोज होम-हवन करते थे। खुशी से सभी अपना जीवन चलाते थे। एक घर में जहां रोज हवन होता था, वहां एक दिन सायंकाल हवनकुण्ड की साफ-सफाई के समय गृहस्वामी को हवन कुण्ड में सोने का टुकड़ा मिला। गृहस्वामी ने पूरे गांव से पूछा कि ये कहीं गलती से किसी भाई या बहन का गिर तो नहीं गया लेकिन उसे इसका उत्तर नहीं मिला। लोगों ने कहा कि कुछ गिरेगा तो अंगूठी या माला गिर सकती है, सोने का टुकड़ा लेकर तो कोई घूमेगा नहीं। गृहस्वामी को बाद में उसकी धर्मपत्नी ने बताया कि आंगन में सूखने को पापड़ डाले थे। अचानक एक कुत्ता आ गया। कुत्ते को भगाने के लिए मैंने लकड़ी चलाई किंतु वह नहीं भागा। मैं आवाज नहीं दे पा रही थी क्योंकि मुंह में पान था। मैंने उसे थूका तो जल्दी में पान की पीक गलती से हवनकुण्ड में गिर पड़ी। हम लोग जिस तरह से नियमित हवन-पूजन और आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करते हैं, हो न हो, उसी के प्रताप से थूक स्वर्ण में परिवर्तित हो गई। गृहस्वामी ने धैर्य से सुना किंतु आगे से ऐसी गल्ती ना करने की चेतावनी भी दी। अगले दिन हवनकुण्ड की सफाई के समय उसे पुनः सोने का वैसा ही टुकड़ा मिला। वह समझ गया और अपनी धर्मपत्नी को फटकार लगाई। लेकिन इस बार तो उसकी पत्नी उसी पर फट पड़ी। उसने गृहस्वामी को प्रत्युत्तर दिया कि सारी जिंदगी तो तुमने सोने का एक आभूषण तक कहीं से बनवाकर ना दिया, गरीबी और अभाव में जीते-जीते जीवन कट गया और अब जब मेरी थूक से सोना पैदा होने लगा है तो तुम नाराज होते हो। अगर आइंदा डांटोगे तो आत्महत्या कर लूंगी। गृहस्वामी ने तुरंत चुप्पी साध ली, लेकिन फिर धीरे से बोला- किसी को बताना नहीं। फिर तो रोज ही हवन कुण्ड से सोने का टुकड़ा मिलने लगा।

अब तो उस गृहस्वामी के कच्चे मकान के दिन बीत गए। पक्का मकान, टाइल्स वगैरा यानी उस समय समृद्धि के जो-जो मानक थे, सब उस गृहस्वामी ने प्राप्त कर लिए। गांव के और परिवार हैरान थे, गांव की सभी स्त्रियों में कानाफूसी होने लगी। अंततः एक ने रहस्य जान लिया और फिर सबको यह बात पता लग गई कि हवन कुण्ड में थूकने से रोज स्वर्ण प्राप्त किया जा सकता है। फिर तो सारे घरों में प्रयोग शुरु हो गए और कुछ ही दिन में सबकी तकदीर बदलने लगी।

लेकिन गांव में इस वातावरण में भी एक घर वैसा कच्चे का कच्चा ही बना रहा। वहीं प्रगति के कोई चिन्ह नहीं थे। उस घर में नियमित यज्ञ-हवन तो वैसे ही चलता था लेकिन यज्ञकुण्ड में थूकने के सवाल पर गृहस्वामी ने अपनी धर्मपत्नी को चेतावनी दे रखी थी कि जिस दिन तूने स्वर्ण प्राप्त करने के लिए ऐसा पापकर्म किया तो फिर मुझे जीवित नहीं पाओगी। तय कर लो कि स्वर्ण चाहिए या पति। तो वह घर वैसा ही बना रहा और दोनों ने गांव की चकाचौंध से स्वयं को अलग ही रखा।

लेकिन कब तक यह साधना चलती। एक दिन गृहस्वामिनी से रहा नहीं गया और उसने अपने पति से कहा कि लोग ताने देने लगे हैं, गरीबी और फटेहाल मेरा इस गांव में रह पाना कठिन है। या तो तुम भी सोना पैदा करो या फिर चलो इस गांव को ही छोड़ दें। गृहस्वामी ने सख्ती से कहा- देखो हवनकुण्ड में थूक कर स्वर्ण पैदा करने का पाप मैं नहीं करूंगा और गांव छोड़कर आखिर जाऊंगा कहां। आगे से ऐसी बात करोगी तो मैं यह जीवन ही छोड़ दूंगा। इस प्रकार कुछ समय और बीत गया और इधर गांव वालों की समृद्धि आसमान छूने लगी।

इस पर गृहस्वामिनी से रहा नहीं गया। उसने एक रात को गृहस्वामी से कहा कि या तो गांव छोड़ो या फिर मैं ही अपनी जीवन समाप्त कर लूंगी। अब यहां रह पाना मेरे लिए कठिन है। चूंकि हवनकुण्ड में थूक कर सोना पैदा करना गृहस्वामी को गंवारा न था अतएव दोनों ने भोर होते ही गांव छोड़ने का निश्चय कर लिया। भोर होते ही दोनों अपनी गृहस्थी की पोटली बांधे चुपचाप गांव से बाहर निकल गए। गांव से बाहर आने के पश्चात् गृहस्वामी ने गांव की माटी को नमन कर आखिरी बार भरे मन और अश्रुपूर्ण आंखों से समूचे गांव को निहारा और फिर जैसे ही चलने को उद्यत हुआ कि समूचा गांव धूं-धूं कर आग की लपटों से घिर गया। यह देख गृहस्वामिनी भयभीत हो उठी। इस पर गृहस्वामी ने कहा कि देख ले गांव की दशा! इसीलिए मैं गांव नहीं छोड़ना चाहता था। हवनकुण्ड में थूक कर स्वर्ण प्राप्त करने के पाप ने ही सारे गांव को स्वाहा कर दिया। हम ही अकेले थे जो अपने व्रत पर डटे थे और शायद उसी का पुण्य था कि गांव अब तक बचा हुआ था। हमने छोड़ दिया गांव को और यह गांव ही खत्म हो गया।

राजनीति में हमारे स्वयंसेवकों को इस कथा के संदेश को ध्यान में रखना है। रहना तो राजनीति में ही है किंतु व्रतपूर्वक रहना है। जमाने की चाल कुछ भी हो, हमें अपनी साधना करते रहनी है। अब ये बात बुद्धि से सभी समझते हैं, कहानी की जरूरत नहीं है, लेकिन जीवन में प्रेरणा के लिए प्रत्यक्ष जीवन देखने में आना चाहिए।इस स्वयंसेवक व्रत का पालन आडवाणीजी ने अपने जीवन में कैसे किया होगा, इसका पूरा लेखा-जोखा इस पुस्तक में मिलता है, इससे अधिक बात मुझे इस अवसर पर और कहनी नहीं है। सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले सभी कार्यकर्ताओं को स्वयंसेवकत्व का व्रत निभाकर, अपने ध्येयवाद को जीवंत रखते हुए, व्यावहारिक भूमि पर दोनों पैर मजबूती से जमाकर, वातावरण को अपने ध्येय के अनुरूप परिवर्तित करने की प्रेरणा मिले, धरातल पर रहते हुए अपने स्वयंसेवक व्रत को भी वे धारण किए रह सकें, ऐसी मेरी कामना है। ये कैसे किया जाए, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण देशभर के कार्यकर्ता इस पुस्तक से प्राप्त करेंगे, इसे समझेंगे, ध्येय को अपने जीवन में धारण करने का हौंसला बढ़ा सकेंगे, यह सामर्थ्य इस पुस्तक से सभी को मिले, ऐसी शुभकामनाओं के साथ मैं पुस्तक लेखन के लिए आडवाणी जी को बधाई देता हूं।


[राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक (तत्कालीन सरकार्यवाह) डॉ. मोहनराव मधुकर भागवत द्वारा 19 मार्च 2008 को नई दिल्ली में पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा ‘माई कंट्री-माई लाइफ’ के लोकार्पण समारोह में दिए गए उद्बोधन का संपादित अंश। समारोह में मंच पर आडवाणी समेत पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम, पूर्व उप-राष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत, सुप्रसिद्ध पत्रकार चो. रामास्वामी और पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह उपस्थित थे]

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