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मंगलवार, अगस्त 07, 2012

लिखित मजमून पर भी भ्रमित कर रहा मीडिया

पवन कुमार अरविंद

भाजपा संसदीय दल के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी के हालिया ब्लाग पर जमकर हो-हल्ला मचा। कहते हैं कि “सुनी-सुनाई” बातों का गलत अर्थ निकालना कुछ हद तक तो ठीक कहा जा सकता है, लेकिन “लिखा-पढ़ी” की बातों को भी अर्थ का अनर्थ कर देना; किसी प्रकार से क्षम्य नहीं कहा जा सकता। कहते हैं कि झूठ के पांव नहीं होते, पर झूठ का मुंह जरूर होता है। आडवाणी के ब्लॉग के संदर्भ में जो बातें उनके मुंह में डालकर मीडिया प्रस्तुत कर रहा है, वह वस्तुतः संप्रग सरकार के दो बड़े मंत्रियों द्वारा कही गयी हैं। मीडिया ने आडवाणी की बातों का गलत अर्थ निकालकर जनता के विश्वास का एक बार फिर भंजन किया है। सवाल यह है कि जो बातें सीधे-सीधे सरल रूप में समझ में आ जाती हों, उसको घुमा-फिराकर बात का बतंगड़ बना देने की क्या आवश्यकता है। हालांकि इस प्रकार की घटनाओं-दुर्घटनाओं के लिए कुछ कथित मीडियाकर्मी ही जिम्मेदार रहते हैं, लेकिन इसको लेकर समूची मीडिया पर अविश्वास का संकट पैदा होता है। दरअसल, 23 जुलाई को प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने निवर्तमान राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के सम्मान में दिल्ली स्थित हैदराबाद हाउस में रात्रिभोज का आयोजन किया था। इस भोज में देश के करीब सभी राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं ने शिरकत की। भोज शुरू होने से पहले संप्रग सरकार के दो वरिष्ठ मंत्री अनौपचारिक बातचीत कर रहे थे। इस दौरान लालकृष्ण आडवाणी भी मौजूद थे। ये दोनों मंत्री आगामी आम चुनावों के बाद की स्थितियों की चर्चा करते हुए अपने भविष्य का आकलन कर रहे थे। इन दोनों केंद्रीय मंत्रियों की चिंता थी कि 16वीं लोकसभा के चुनावों में न तो क्रांग्रेस और न ही भाजपा ऐसा कोई गठबंधन बना पाने में सफल होंगे, जिसका लोकसभा में स्पष्ट बहुमत हो। इसलिए सन् 2013 या 2014 में, जब भी लोकसभा चुनाव होंगे,,संभवतया जिस ढंग की सरकार बनेगी वह तीसरे मोर्चे जैसी हो सकती है। कांग्रेसी मंत्रियों के मुताबिक यह न केवल भारतीय राजनीति की स्थिरता अपितु राष्ट्रीय हितों के लिए भी अत्यन्त नुकसानदायक होगी। उक्त बातें दोनों मंत्रियो ने आपस में की थी। इस संदर्भ में आडवाणी ने अपने ब्लाग में लिखा है- मैंने दोनों मंत्रियों के दिमाग में उमड़ रही इन चिंताओं को महसूस किया। इस बात पर मेरी प्रतिक्रिया थी- मैं आपकी चिंता को समझता हूं, मगर उससे सहमत नहीं हूं। इस मुद्दे पर मेरे अपने विचार हैं- पिछले ढाई दशकों में राष्ट्रीय राजनीति का जो स्वरूप बना है उसमें यह प्रत्यक्षत: असंभव है कि नई दिल्ली में कोई ऐसी सरकार बन पाए जिसे या तो कांग्रेस अथवा भाजपा का समर्थन न हो। इसलिए तीसरे मोर्चे की सरकार की कोई संभावना नहीं है। हालांकि एक गैर-कांग्रेसी, गैर-भाजपाई प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार जिसे इन दोनों प्रमुख दलों में से किसी एक का समर्थन हो, बनना संभव है। ऐसा अतीत में भी हो चुका है। लेकिन, चौ. चरण सिंह, चन्द्रशेखर, देवेगौड़ा और इन्द्रकुमार गुजराल के प्रधानमंत्रित्व वाली सरकारें और वीपी सिंह सरकार के उदाहरणों से स्पष्ट है कि ऐसी सरकारें ज्यादा नहीं टिक पातीं। केंद्र में तभी स्थायित्व रहा है जब सरकार का प्रधानमंत्री या तो कांग्रेस का हो या भाजपा का। दुर्भाग्यवश, 2004 से यूपीए-1 और यूपीए-2, दोनों सरकारें इतने खराब ढंग चल रहीं हैं कि सत्ता प्रतिष्ठान में घुमड़ रहीं वर्तमान चिंताओं को सहजता से समझा जा सकता है। सामान्यतया लोग मानते हैं कि लोकसभाई चुनावों में कांग्रेस का सर्वाधिक खराब चरण आपातकाल के पश्चात् 1977 के चुनावों में था। लेकिन इस पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि आगामी लोकसभाई चुनावों में कांग्रेस का हाल 1952 से अब तक के इतिहास में सर्वाधिक खराब रहे। यह पहली बार होगा कि कांग्रेस पार्टी का स्कोर मात्र दो अंकों तक सिमट कर रह जाएगा, यानी कि सौ से भी कम! तो यह था आडवाणी के ब्लाग कां अंश, लेकिन मीडिया ने तो न जाने क्या-क्या अर्थ लगा लिया। जो घोर निराशाजनक है।

गुरुवार, मई 12, 2011

'कुरूक्षेत्र' बना ग्रेटर नोयडा का भट्टा पारसौल गांव

ग्रेटर नोयडा का भट्टा पारसौल गांव इन दिनों उत्तर प्रदेश के राजनीतिक महाभारत का कुरूक्षेत्र बना हुआ है। इस महाभारत में कौरवों का पक्ष कौन है, यह पहचानना बड़ा ही कठिन है, क्योंकि सभी अपने को पाण्डव होने का ही दावा कर रहे हैं। सभी राजनीतिक दलों के नेता इस कुरूक्षेत्र में पहुंचकर केवल ‘अग्निबाण’ चलाने पर आमादा हैं। इस मामले के हल से उनका कुछ भी लेना देना नहीं। केवल अगले चुनाव में वोट का जुगाड़ हो जाय, इस महाभारत का एकमेव लक्ष्य है।

असली महाभारत तो कौरवों और पाण्डवों के बीच हुआ था, लेकिन वर्तमान का यह राजनीतिक महाभारत केवल कौरवों के बीच ही होता दिख रहा है। क्योंकि जिस प्रकार इस आंदोलन के सहारे पार्टियों में राजनीतिक बढ़त पाने की होड़ मची हुई है, उससे केवल यही उपमा समीचीन है। यहां न कोई पाण्डव है और न ही कोई कृष्ण, जो अर्जुन को गीता का उपदेश देकर धर्मपथ पर चलते हुए कर्मक्षेत्र में डटे रहने के लिए प्रेरित करे। सबको ऐन-केन-प्रकारेण ‘हस्तिनापुर’ की सत्ता ही दिख रही है। बस, वही लक्ष्य है। किसानों का दुःख-दर्द जाये भाड़ में।

सोमवार, दिसंबर 22, 2008

कहाँ से आया इतना धन ?

अपने देश में उच्च पदों पर बैठे कुछ ऐसे लोकसेवक भी हैं, जिनको भारतीय जनता की गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी से कुछ भी लेना-देना नही है, बल्कि अमेरिका के कुछ नागरिकों की गरीबी और भुखमरी के प्रति ज्यादे सहानुभूति है. पिछले दिनों ऐसी बातें प्रकाश में आयी है.
केन्द्र की यू.पी.ऐ. सरकार को समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव व राज्य सभा सदस्य अमर सिंह ने, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की संस्था "बिल क्लिंटन फाउंडेशन" को लाखों अमेरिकी डालर का सहयोग दिया है. इस संस्था का कार्य एड्स पीडितों और गरीब अमेरिकी नागरिको की मदद करना है. १८ दिसम्बर, ०८, दिन- गुरुवार को संस्था की वेबसाइट पर जारी देन-दाताओं की सूची में अमर सिंह का भी नाम है. अमर सिंह का नाम, १० लाख डालर से अधिक राशि का सहयोग देने वालों की सूची में है.
अमर सिंह जी के पास इतना धन कहाँ से आया, इसको अस्पष्ट करना चाहिए.

शुक्रवार, नवंबर 14, 2008

पाक-अधिकृत कश्मीर : नेहरु की नादानी का प्रतीक

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु के नाम का स्मरण करते ही कश्मीर समस्या की याद स्वाभाविक रूप से आ जाती है. पाक-अधिकृत कश्मीर के रूप में उपस्थित यह समस्या नेहरु की लापरवाही और नादानी का प्रतीक है. नेहरु जी मुख्यतः कश्मीरी होने के कारन अपने को कश्मीर मामलों का विशेषज्ञ समझते थे. इसी कारन जहाँ देशी राज्यों को नव-स्वतंत्र भारत में विलय करने का दायित्व सरदार पटेल पर था, वहीँ नेहरु जी ने हठ पूर्वक कश्मीर को अपने कार्यक्षेत्र में रखा. जिसके फलस्वरूप आज तक पाकिस्तान से चार युद्ध हो चुके हैं.

हम सभी जानते हैं की १५ अगस्त, १९४७ को खंडित भारत आजाद हुआ था. आज़ादी के पूर्व भारत में ५६२ रियासतें थी. इनमे १०० राज्य प्रमुख थे. जैसे- हैदराबाद, कश्मीर, बडौदा, ग्वालियर, मैसूर, आदि. इसके विपरीत कुछ रियासतें बहुत छोटी थीं. सरदार पटेल के विशेष प्रयत्नों से पाकिस्तान में शामिल होने वाली रियासतों के अतिरिक्त शेष सभी रियासतें भारत में शामिल हो गयीं. केवल जूनागढ़, कश्मीर व हैदराबाद की रियासतें विलय के लिए तैयार न थीं.जूनागढ़ और हैदराबाद की समस्या से कहीं अधिक जटिल कश्मीर का विलय करने की समस्या थी. कश्मीर में मुसलमान बहुसंख्यक थे तथा इसकी सीमा पाकिस्तान से मिलती थी. अतः जिन्ना भी कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे. कश्मीर के शासक ने भी यह स्पष्ट नहीं किया था की वह पाकिस्तान अथवा भारत किसमें मिलना चाहता है.

इस बात का लाभ उठाते हुए जिन्ना ने २२ अक्टूबर,१९४७ को कबाइली लुटेरों के भेष में पाकिस्तानी सेना को कश्मीर भेजा. इस पर कश्मीर का शासक भयभीत हो गया व उसने भारत से सैनिक सहायता मांगी. भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना के छक्के छुडाते हुए, उनके द्वारा कब्ज़ा किये गए कश्मीरी क्षेत्र को पुनः प्राप्त करते हुए तेजी से आगे बढ़ रही थी,कि बीच में ही ३१ दिसम्बर, १९४७ को नेहरु जी ने यू.एन.ओ. से अपील की कि वह पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी लुटेरों को भारत पर आक्रमण करने से रोके. फलस्वरूप १ जनवरी, १९४९ को भारत पाकिस्तान के मध्य युद्ध-विराम हो जाने के कारन भारतीय सेना के हाथ बंध गए, जिससे पाकिस्तान द्वारा कब्जा किये गए शेष क्षेत्र को भारतीय सेना प्राप्त करने में सफल न हो सकी.जो आज भी नासूर बन कर हम भारतीयों को दुःख दे रही है.
( नेहरु जी के जन्मदिन पर ------- )

गुरुवार, अक्टूबर 23, 2008

सारे जहाँ से अच्छा ' महाराष्ट्रा ' हमारा

क्या सचमुच 'राष्ट्र' से बड़ा है 'महाराष्ट्र' ?
या फ़िर राष्ट्र में महाराष्ट्र है, या महाराष्ट्र में राष्ट्र है,
या महाराष्ट्र ही उनका (राज ठाकरे)'राष्ट्र' है.
ये बातें राज ठाकरे को स्पष्ट करना चाहिए.
'मराठी मानुष' की बिध्वन्सक राजनीति करने वाले महाराष्ट्र नव-निर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे की हरकतें देश के लिए एक चुनौती है. राज ठाकरे कोई आतंकवादी नही हैं, लेकिन भाषावाद, क्षेत्रवाद के नाम पर 'क्षेत्रीयता का आतंक' मचाये हुए हैं. भारतीय नागरिकों को संविधान प्रदत्त अधिकार है कि वह किसी भी राज्य में जा कर रह सकता है. लेकिन ठाकरे की गतिबिधियाँ संविधान का उल्लंघन कर रही है.
विघटनकारी राजनीति की आग भड़काने वाले राज ठाकरे को देशद्रोही घोषित कर देना चाहिए, ताकि फ़िर कोई 'ठाकरे' अपना सर न उठा सके.

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