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शनिवार, मई 09, 2020

'अयोध्या की सामाजिक एवं कानूनी लड़ाई के चलते-फिरते इनसाइक्लोपीडिया हैं चम्पत राय'

पवन कुमार अरविंद
नई दिल्ली । श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव एवं विहिप के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चम्पत राय श्रीरामजन्मभूमि की सामाजिक एवं कानूनी लड़ाई के चलते-फिरते इनसाइक्लोपीडिया (विश्वकोश) हैं। उनको 'अयोध्या का पटवारी' भी कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, क्योंकि उनको अयोध्या की एक-एक गली, एक-एक मोहल्ले की भौगोलिक रचना कंठस्त है। श्रीरामजन्मभूमि के आसपास की एक-एक इंच भूमि के बारे में वे जानकारी रखते हैं। अयोध्या आंदोलन के एक स्तंभ माने जाने वाले विहिप के केंद्रीय मंत्री राजेंद्र सिंह 'पंकज' ने यह बात कही है।

राजेंद्र सिंह 'पंकज' ने हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में कहा कि श्रीरामजन्मभूमि के सामाजिक आंदोलन के साथ-साथ कानूनी लड़ाई में भी चम्पत राय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने अपने कक्ष को श्रीरामजन्मभूमि की फाइलों और साक्ष्यों से भर रखा था। नित्य वकीलों को सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत करने के लिए नये-नये साक्ष्यों को देर रात तक खोज कर उपलब्ध कराना, सुबह वकीलों के साथ सुप्रीम कोर्ट में जाना और सुनवाई के दौरान पूरे वक्त धैर्यपूर्वक बैठे रहना, यह कोई सामान्य बात नहीं है। डॉक्यूमेंट को संभालकर रखना और उसको समय आने पर निकाल देना यह उनके स्वभाव में ही है।

चम्पत राय चाहते तो अच्छी नौकरी करते, समाज में प्रतिष्ठापूर्ण जीवन जी सकते थे, परंतु उन्होंने चुना कठिनाइयों से भरा मार्ग। मन में निश्चय कर लिया चाहे कितनी भी बाधाएं आयें अब यह जीवन अपने लिए नहीं राष्ट्र के लिए समर्पित होगा और कार्य का माध्यम होगा संघ। वर्ष 1980 में संघ के प्रचारक निकले। सहारनपुर और देहरादून में जिला प्रचारक रहे। इसके बाद 1985 में मेरठ के विभाग प्रचारक रहे।

उन्होंने बताया कि वर्ष 1986 में चम्पत राय को विहिप में भेज दिया गया। उनको पश्चिमी उत्तरप्रदेश का सह-प्रांत संगठन मंत्री बनाया गया। उमाशंकरजी प्रांत संगठन मंत्री थे। तब उत्तर प्रदेश में सांगठनिक रूप से दो प्रांत हुआ करते थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वी उत्तर प्रदेश। इसके बाद उत्तरप्रदेश के सह क्षेत्र संगठन मंत्री और क्षेत्र संगठन मंत्री भी रहे। वर्ष 1991 से अयोध्या उनका केंद्र रहा। उस समय अयोध्या बहुत बड़ी गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था। अयोध्या में संगठन के सारे कार्यक्रमों की योजना बनाना, उसको व्यवस्थित ढंग से चलाना, उसका इंतजाम देखना, ये सब चम्पत जी के जिम्मे था। लेकिन वे कभी फ्रंट पर नहीं आते थे, या यूं कहें कि पर्दे के पीछे रहकर सारा काम करते थे। प्रचार-प्रसार से दूर रहना उनके स्वभाव में भी है। अब तो मजबूरी में मीडिया से भी बात करनी पड़ जाती है। उन्होंने बताया कि चम्पत जी से मेरा परिचय 1976-77 के दौरान हुआ। आपातकाल में चम्पत जी बरेली, नैनी और आगरा की जेलों में करीब 18 महीने रहे। उस दौरान वे बिजनौर जिले के संघ के जिला कार्यवाह थे।

चम्पत राय के छोटे भाई एवं संघ के सक्रिय कार्यकर्ता संजय कुमार बंसल ने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि वर्ष 25 जून, 1975 को जब देश में आपातकाल लगा तब चम्पत राय बिजनौर जिले के धामपुर स्थित आ.एस.एम. डिग्री कॉलेज में भौतिकी के प्रवक्ता थे। पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने कॉलेज पहुंची। चम्पत राय को प्राचार्य के कक्ष में बुलवाया गया। उस समय वे कॉलेज में विद्यार्थियों को पढ़ा रहे थे। प्राचार्य कक्ष में चम्पत राय ने पुलिस से कहा कि घर से वे कपड़े लेकर पुलिस कोतवाली में पहुंच रहे हैं। घर पहुंचकर उन्होंने माता-पिता को सारी बातें बतायीं। माता-पिता ने उनका तिलक किया और उनको पुलिस कोतवाली तक छोड़ने साथ गये। करीब 18 महीने तक जेल में रहने के बाद जब आपातकाल समाप्त हुआ तो उनको रिहा कर दिया गया। वर्ष 1980 में उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया और वृद्ध माता-पिता एवं आठ छोटे भाई-बहनों को छोड़कर संघ के प्रचारक बन गए।

संजय कुमार बंसल बताते हैं कि भैया चम्पत राय को संघ की शाखा में जाने की प्रेरणा पिताजी से मिली। वह शुरू से ही मेधावी छात्र रहे। प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जूभैया), ओम प्रकाश, सूर्यकिशन, सलेकचंद्र एवं अन्य पदाधिकारियों का घर पर आना-जाना लगा रहता था। इन सब बातों का चम्पत राय के बालमन पर विशेष प्रभाव पड़ा और उन्होंने भी संघ की शाखा में जाना शुरू कर दिया।

संक्षिप्त परिचय
चम्पत राय बंसल का जन्म 18 नवम्बर 1946 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नगीना कस्बे में मोहल्ला सरायमीर के रामेश्वर प्रसाद और सावित्री देवी के साधारण परिवार में हुआ। पिता रामेश्वर प्रसाद बाल्यकाल से ही संघ के सक्रिय कार्यकर्ता रहे। वर्ष 1948 में संघ पर प्रतिबंध लगा और पिता रामेश्वर प्रसाद को तीन माह के लिए जेल में डाल दिया गया। तब चम्पत राय की आयु करीब तीन वर्ष की थी। प्राथमिक शिक्षा कस्बे के प्राथमिक पाठशाला से हुई। हिंदू इंटर कॉलेज से इंटरमीडिएट किया। वर्ष 1967 में मेरठ कॉलेज, मेरठ से बी.एस-सी. और 1969 में एम.एस-सी. वर्धमान कॉलेज, बिजनौर से करने के बाद 1970-71 में रोहतक के एक डिग्री कॉलेज में अध्यापक बन गए। उसके बाद 1972 में आर.एस.एम. डिग्री कॉलेज, धामपुर (बिजनौर) में भौतिकी के प्रवक्ता बन गए। चम्पत राय परिवार में दूसरे नंबर के भाई हैं। बड़े भाई लाजपत राय बंसल मुख्य अभियंता पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। माता सावित्री देवी एक धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। पिताजी का देहांत जुलाई 2003 में हुआ। चम्पत राय वर्ष 1996 में विहिप के केंद्रीय मंत्री बनाए गए। वर्ष 2002 में सयुक्त महामंत्री और फिर अंतरराष्ट्रीय महामंत्री बनाए गए। वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।

सोमवार, मार्च 09, 2020

अयोध्या में दर्शनार्थियों की संख्या बढ़ी


चम्पत राय 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से अयोध्या में आवागमन बढ़ा है। श्रीरामलला के दर्शनार्थियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। हम चाहते हैं कि अयोध्या जाने वाले तीर्थयात्री यह प्रत्यक्ष अनुभव करें कि फैसले के बाद से अयोध्या में क्या-क्या परिवर्तन हुए हैं। तीर्थयात्रियों के अनुकूल व्यवस्था बनाने के लिए हम लगातार प्रयासरत हैं। 
मा. चम्पत राय, श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव
भव्य मंदिर निर्माण का कार्य पूरा होने तक श्रीरामलला को अस्थाई मंदिर में शिफ्ट किया जाएगा। हम चाहते हैं कि आगामी नवरात्र में श्रीरामलला के दर्शन अस्थायी रूप से बनाए जाने वाले मंदिर में किये जा सकें। यह अस्थायी मंदिर ऐसा होगा जिसमें एक साथ कम से कम 25 श्रद्धालु रामलला के दर्शन कर सकेंगे। अस्थायी मंदिर का काम अगले 15-20 दिन में पूरा हो जाएगा। मौजूदा व्यवस्था में श्रीरामलला का दर्शन एक बार में सिर्फ एक-दो श्रद्धालु ही कर सकते हैं। हम ऐसा काम करेंगे कि श्रद्धालु श्रीरामलला के दर्शन निकट से कर सकें। दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को ज्यादा पैदल न चलना पड़े, जितनी दूरी घटाई जा सकती है, हम घटाने का प्रयास करेंगे। सुरक्षा भी एक पहलू है। दूरी घटाने के लिए सुरक्षा खतरे में नहीं पड़नी चाहिए, हम इसका भी ध्यान रखेंगे। 
जहां तक मंदिर निर्माण की बात है तो हम कोई भी नया कार्य रामनवमी से पहले शुरू नहीं करेंगे। एक तकनीकी दिक्कत है। पहले भूमि का विधिवत परीक्षण किया जाएगा। उसके बाद ही मंदिर निर्माण शुरू होगा। कोई भी नया काम अप्रैल के तीसरे सप्ताह या अप्रैल बीतने के बाद ही शुरू करेंगे। हम श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण की दिशा में एक-एक कदम आगे बढ़ रहे हैं। क्या-क्या होना चाहिएहम इस पर अनवरत विचार कर रहे हैं। 
मंदिर बड़े नहीं होतेउसका कॉरिडोर और कॉम्प्लेक्स बड़ा होता है। विहिप के प्रस्तावित मॉडल के अनुरूप कार्यशाला में पत्थरों की तराशी का काम चल रहा है। मॉडल में परिवर्तन हुआ तो मंदिर निर्माण में लगने वाला समय बढ़ जाएगा। हम यह चाहते हैं कि मंदिर निर्माण में लगने वाले पत्थरों का रंग एक समान हो, भिन्न-भिन्न रंग के पत्थरों का उपयोग न हो। पत्थर राजस्थान के भरतपुर जिले के वंशीपहाड़पुर की पहाड़ियों का है। उसे सैंडस्टोन कहते हैं। पिंक कलर का यह सैंडस्टोन है। राष्ट्रपति भवन भी इसी का बना है। राजस्थान सरकार ने उस क्षेत्र को फारेस्ट क्षेत्र घोषित कर दिया है। अब वहां से उस रंग के पत्थर उपलब्ध नहीं हो सकेंगे।
मंदिर कंक्रीट का नहीं बनेगा, क्योंकि कंक्रीक की उम्र कम होती है। यह अधिकतम सौ साल मानी जाती है। जहां तक लोहे की बात है तो उसमें जंग लगने की संभावना अधिक होती है। जबकि, पत्थर से निर्मित होने वाले मंदिरों की उम्र कम से कम 500 साल तक होती है।
मंदिर निर्माण के शुभारंभ के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उपस्थित रह सकते हैं। ट्रस्ट की पहली बैठक के बाद ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास जी और केशव पाराशरन समेत हम चार लोग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी से मिले थे। उस दौरान नृत्यगोपाल दास जी ने प्रधानमंत्री जी से पूछा कि आप अयोध्या कब आएंगे? इस पर प्रधानमंत्री जी ने कहा कि आप जब कहेंगे, आ जाएंगे।

उम्र 93 साल, कोर्ट में 16 घंटे खड़े होकर बहस
अयोध्या केस की सुनवाई के दौरान मैं रोज सुप्रीम कोर्ट जाता था। मैंने 40 दिन कोर्ट अटेंड की है। एक प्रसंग ध्यान में आता है। वरिष्ठ अधिवक्ता केशव पाराशरन की आयु 93 वर्ष है। अयोध्या केस की सुनवाई के दौरान वे कोर्ट में खड़े हो गए। सुनवाई के दौरान तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई साहब ने कहा कि आप बहुत बुजुर्ग हैं, बैठकर बोलिए। लेकिन उन्होंने खड़े होकर दलीलें रखीं। पाराशरन जी ने टिप्पणी की कि मैंने न जाने कैसे-कैसे आदमियों का मुकदमा खड़े होकर किया है। अब जब मेरे ही आराध्य का मुकदमा है तो मैं बैठ जाऊं? भगवान ने उनको शक्ति दी। कोर्ट में लगातार दो घंटे खड़ा रहना पड़ता था। उसके बाद एक घंटे का ब्रेक। फिर दो घंटे खड़े रहना पड़ता था। इस प्रकार वे पहले राउंड में ही 16 घंटे खड़े रहे। 
हमारे दूसरे अधिवक्ता थे सीएस वैद्यनाथन, वे सुनवाई के दौरान जूते उतार देते थे। उनसे पूछा गया तो वे कहने लगे कि ये मेरे आराध्य का केस है, मैं मंदिर में बैठा हूं तो जूता कैसे पहन सकता हूं? इस प्रकार के डेडिकेशन से, इमोशन से और सेंटिमेंट से काम करने वाले लोगों ने भगवान का मुकदमा लड़ा। सिर्फ हम नहीं बल्कि पूरा समाज श्री केशव पाराशरन जी और वैद्यनाथन जी का ऋणी रहेगा।

(श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव एवं विहिप के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चम्पत राय से पत्रकार पवन कुमार अरविंद की बातचीत पर आधारित। यह बातचीत 25 फरवरी, 2020 को हुई थी।)

शुक्रवार, नवंबर 15, 2019

यह राष्ट्र हिंदू और मुसलमान सबका : चंपत राय

राम मंदिर मुद्दे पर विहिप के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय से खास बातचीत

श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में वैसे तो अनगिनत लोगों का योगदान रहा, लेकिन जो प्रमुख विभूतियों का नाम हमेशा चर्चा में रहा है उनमें अशोक सिंहल, आचार्य गिरिराज किशोर, महंत अवैद्यनाथ, विष्णुहरि डालमिया, लालकृष्ण आडवाणी, कल्याण सिंह, डॉ. मुरलीमनोहर जोशी, चंपत राय, साध्वी ऋतंभरा, उमा भारती, विनय कटियार प्रमुख हैं। राम जन्मभूमि के लिए यह लड़ाई सामाजिक और कानूनी दो मोर्चों पर लड़ी गयी। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय ऐसे व्यक्तित्व हैं जो वर्ष 1985 से सामाजिक मोर्चे पर तो सक्रिय थे ही, बाद में कानूनी लड़ाई के लिए भी दिन-रात पूरी तन्मयता के साथ जुटे रहे। जन्मभूमि के स्वामित्व को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद चंपत राय से हिन्दुस्थान समाचार के मुख्य उप-संपादक पवन कुमार अरविंद ने बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के संपादित अंश-

प्रश्न- श्रीराम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आप किस रूप में देखते हैं?
उत्तर- मैं बहुत अच्छे रूप में देखता हूं। बहुत प्रसन्न हूं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में हिन्दू संस्कृति, हिन्दू मूल्य और हिन्दुओं की भावनाओं को न्यायालय ने स्वीकार किया है। यह शायद स्वतंत्र भारत की न्यायिक प्रक्रिया का पहला केस है। मैं निजी रूप में सोच रहा हूं कि 130 करोड़ की अधिकांश जनता का समाधान इसमें हुआ है। कोई हार गया, कोई जीत गया, ऐसा इस केस में नहीं हुआ है। निर्मोही अखाड़े का केस समय-सीमा के बाहर काल बाह्य घोषित हो गया, लेकिन उनको संतुष्ट भी किया कि सरकार मंदिर के प्रबंध तंत्र में उनको रखे। यह कितनी बड़ी बात है। बैलेंस कर दिया। हाईकोर्ट ने मुसलमानों का मुकदमा रद्द किया। सुप्रीम कोर्ट ने उस मुकदमे को स्वीकार किया, लेकिन उस स्थान पर उनका अधिकार नहीं है। उनका मालिकाना हक नहीं है। उनका एडवर्स पजेशन यानी विपरीत कब्जा भी नहीं है। यह भी कह दिया। उनको संतुष्ट कर दिया कि मुस्लिम समुदाय को कहीं जमीन दो। संतुलन किया। वैज्ञानिक तथ्यों को स्वीकार किया। इतिहास के दस्तावेज, किताबें, गजेटियर, विदेशी यात्रियों के द्वारा लिखी गयी पुस्तकों में वर्णन, इन सबको उन्होंने स्वीकार किया। यह बहुत ही संतुलित निर्णय है। न्यायाधीशों ने जिस परिपक्वता का परिचय दिया है, मैं तो वकील नहीं हूं लेकिन एक फरियादी के रूप में मुझे बहुत समाधान हुआ। 40 दिन तक रोज चार घंटे एक ही बात सुनते रहना, कोई वकील एक ही बात को आठ-आठ बार, दस बार रिपीट कर रहा है, धैर्य से सुनते रहना, मैं तो समझता हूं कि बड़ी भारी तपस्या है। इस रूप में जो न्यायाधीश वर्ग ने तपस्या की है 40 दिन की, अपने धैर्य का प्रदर्शन किया है, वह प्रणम्य है। 

प्रश्न- इस फैसले में चीफ जस्टिस की दृढ़ता की भी कोई भूमिका है?
उत्तर- बहुत बड़ी। वो जैसे दृढ़ व्यक्ति हैं, अगर दृढ़ न होते तो शायद दूसरा कोई आदमी कर पाता कि नहीं कर पाता, यह कल्पना से परे है। बड़ी दृढ़ता से उन्होंने काम लिया। सभी न्यायाधीश एक जैसे होते हैं। केवल प्रशासनिक कार्यों के लिए किसी एक वरिष्ठतम की जिम्मेदारी होती है। उन्होंने अपनी वरिष्ठता का पूरा-पूरा उपयोग किया। 

प्रश्न- मुस्लिम पक्ष को पांच एकड़ भूमि क्या 14 कोसीय परिक्रमा मार्ग के बाहर दी जाएगी, आपका क्या कहना है?
उत्तर- कुछ मालूम नहीं। शासन के पास जमीन कहां है, जमीन खोजी जाएगी, लंबी प्रक्रिया है। हम इतने तक ही संतुष्ट हैं कि आज वो सारा स्थान हिंदू समाज का हो गया, भगवान का हो गया। वहां केवल मंदिर बनेगा। जनता की भावनाएं तो केवल इतनी ही थीं। जनता की भावनाएं पूरी हो गयीं। जमीन कहां देंगे, अभी तक कुछ तय नहीं। मुझे तो नहीं मालूम। इसलिए अभी कोई ज्यादा चिंता नहीं कर रहे हैं। 

प्रश्न- हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कितनी साम्यता है?
उत्तर- हाईकोर्ट ने अपनी सीमाओं के बाहर जाकर विचाराधीन भूमि के तीन टुकड़े किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने वह भूमि भगवान को सौंप दी। हाईकोर्ट ने भी निर्मोही अखाड़े का सूट रद्द किया था, इन्होंने भी कर दिया। सब ठीक है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्णय को कहीं भी पलटा नहीं और एक-आध फाइंडिंग (निर्णय) तो पलटती ही है, तभी तो अपील है।

प्रश्न- सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त मध्यस्थता पैनल असफल रहा, इस बारे में अब कुछ बताना चाहेंगे?
उत्तर- सफलता पर बोलना अच्छा लगता है, विफलता पर क्या बोलें। उनके सुझाव ही कुछ ऐसे थे जो मान्य नहीं हो सकते थे। इसलिए वे विफल हो गए। मुझे नहीं समझ में आ रहा है कि जो उन्होंने सुझाव प्रस्तुत किये थे, वो उनको दिये किसने। वो किसके दिमाग की उपज थी। मैं चाहूंगा कि स्वयं उस मध्यस्थता पैनल के मुखिया इब्राहिम कलीफुल्ला जो सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज हैं, वह अपने मुंह से बखान करें कि हमने ये समाधान दिया था। मेरा बोलना अच्छा नहीं। वार्तालाप गुप्त थी, लेकिन उसके बाद भी उन्होंने लिखित में दिये थे। उनको ही स्वयं प्रस्तुत करना चाहिए। देश की 130 करोड़ जनता अपने आप उसका फैसला कर लेगी कि वो स्वाकार्य थे कि नहीं थे। उसको तो असफल होना ही था। वो सुझाव ही सब ऐसे थे। 

प्रश्न- मंदिर निर्माण एवं उसके प्रबंधन के लिए बनने वाले ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को शामिल करने की बात है। इस पर क्या कहना चाहेंगे?
उत्तर- यह बहुत अच्छा है। मैं इसीलिए कह रहा हूं कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और जजेज की टोली ने सबका समाधान कर दिया है। उनका मुकदमा रद्द कर दिया। उन्होंने अपने मुकदमे में मंदिर का प्रबंधन सौंपने की मांग की थी। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि भारत सरकार जो प्रबंध तंत्र बनाए उसमें निर्मोही अखाड़े को भी शामिल करे। सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को संतुष्ट कर दिया। इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

प्रश्न- रामलला विराजमान पक्ष का दावा था कि जो जन्मस्थान है वो भी देवता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह दावा नहीं माना?
उत्तर- नहीं माना कोई बात नहीं। वह स्थान तो मान लिया कि यह जन्मभूमि है। न्यायालय सारी बातें मान लेगा, यह अपेक्षा करना भी गलत है। न्यायालय इसी का तो नाम है कि उसने सबकी बात मान ली। थोड़ी-थोड़ी मान ली और थोड़ी-थोड़ी छोड़ दी।

प्रश्न- फैसले से आप पूरी तरह से संतुष्ट हैं?
उत्तर- हां, पूरी तरह से। हम चाहते हैं कि देश के अंदर इसे हार और जीत के रूप में नहीं लेना चाहिए। ये राष्ट्र के गौरव और राष्ट्र के सम्मान की पुनर्प्रतिष्ठा का विषय है। इसे हिंदू और मुसलमान का विषय नहीं बनाना चाहिए। यह राष्ट्र हिंदू और मुसलमान सबका है। एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में इसको स्वीकारना चाहिए कि आखिर पांच शताब्दी के बाद एक समस्या का कोई हल सामने आ गया। 

प्रश्न- राममंदिर आंदोलन के विचार का प्रादुर्भाव कैसे हुआ?
उत्तर- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंदू जागरण मंच नाम की एक संस्था बना ली। यह मंच है, संगठन नहीं। उसके मुखिया वर्ष 1983 में थे दिनेश त्यागी। वह संघ के प्रचारक थे। बाद में वह संघ से मुक्त हुए और हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने। अध्यक्ष पद से मुक्त होने के बाद विश्व हिंदू परिषद के कार्यालय में रहने लगे। इस समय अस्वस्थ हैं। वो मुजफ्फरनगर में 23 मार्च 1983 को हुए हिंदू जागरण मंच के सम्मेलन के संयोजक थे। उसमें उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री दाऊ दयाल खन्ना और गुलजारी लाल नंदा आए थे। खन्ना ने अपने भाषण में हिंदुओं का आह्वान किया कि देश आजाद हुए इतने वर्ष हो गए हैं। अब अयोध्या, मथुरा और काशी को मुक्त कराना चाहिए। उनका आह्वान एक तरह से संघ के स्वयंसेवकों के लिए ज्यादा था। वह हिंदू सम्मेलन था, स्वयंसेवकों का सम्मेलन नहीं था। उनके इस बात को अशोक सिंहल जी ने समझने की चेष्टा की। अशोक जी विश्व हिंदू परिषद में संयुक्त महामंत्री बन चुके थे। फिर ये बात आयी कि ये बात तो संतों को समझना चाहिए। इसके बाद दिल्ली के विज्ञान भवन में सात व आठ अप्रैल 1984 को देशभर के संतों का दो दिवसीय अधिवेशन हुआ। इसको विश्व हिंदू परिषद ने धर्म संसद नाम दिया। यहां भी दाऊ दयाल खन्ना ने अयोध्या, मथुरा और काशी को मुक्त कराने का आह्वान किया। संतों को आनंद आ गया। यहीं से विश्व हिंदू परिषद का राममंदिर आंदोलन में प्रवेश हुआ। धर्म संसद में ही श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया गया था। 

प्रश्न- क्या अब मथुरा की बारी है?
उत्तर- ये भविष्य की बात है। जिम्मेदार संगठन के लिए यह महत्वपूर्ण बात है कि जो प्रश्न हाथ में लिया पहले उसका पूरा समाधान कर दो। पूरा समाधान तब होगा जब मंदिर बन जाएगा, भगवान की प्रतिष्ठा हो जाएगी। पताका चढ़ जाएगा। इसके बाद अगला सोचो। जब तक आंदोलन चल रहा था तब तक मर्यादा में कुछ भी बोलते रहने के लिए हम स्वतंत्र थे। तब कुछ करना तो था ही नहीं, केवल बोलना था। अब हमें करना है। बोलने और करने का अंतर हम समझते हैं। इसलिए हम ये कहेंगे कि पहले इसको पूरा देख लो। एक कार्य पूरा हुआ, दुनिया उसको स्वीकार कर ले। उसके बाद की पीढ़ी उसको सोचेगी। अभी हम तो इसी एक मिशन के लिए अपने को समर्पित किये हुए हैं।

बुधवार, अगस्त 14, 2019

राष्ट्र के सम्मान से जुड़े सभी विषय एक समान : चम्पत राय

विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चम्पत राय श्रीराम जन्मभूमि को राष्ट्र के सम्मान से जुड़ा मानते हैं। इसलिए वे उस स्थान पर भव्य मंदिर निर्माण के पक्ष में हैं। श्रीराम जन्मभूमि मसले पर जब सुप्रीम कोर्ट ने नियमित सुनवाई शुरू कर दी है, उन्हें भरोसा है कि इस पर निर्णय में अब विलंब नहीं होगा। श्रीराम जन्मभूमि के मुद्दे पर विहिप नेता के साथ हिन्दुस्थान समाचार के मुख्य संवाददाता पवन कुमार अरविंद ने बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश- 


अनुच्छेद-370 और श्रीराम जन्मभूमि विवाद, इन दोनों प्रकरणों में आप किसको ज्यादा पेंचीदा मानते हैं?
अनुच्छेद-370 को निष्प्रभावी बनाना संपूर्ण भारत की एकात्मता और अखंडता का आवश्यक तत्व है। दुनिया में इसके कारण हिन्दुस्तान का सम्मान बढ़ेगा। हम अपनी समस्याओं को खुद हल करने में समर्थ हैं। हमने दुनिया को संदेश दिया है कि भारत के आंतरिक विषयों में किसीबाहरी शक्ति का हस्तक्षेप उचित हीं है। हमसे पूर्व में जो भी भूलें हुईं, हमने उनका परिमार्जन किया है। अनुच्छेद-370 के मुद्दे से हिन्दुस्तान का सम्मान जुड़ा है। राम जन्मभूमि के मुद्दे से भी हिन्दुस्तान का सम्मान जुड़ा है। 1528 में विदेशी आक्रांता बाबर ने हमारे एक श्रद्धा स्थान को गिराया या गिरवाया और उसी स्थान पर उसी के मलबे का प्रयोग करके अपनी उपासना का एक स्थान तैयार किया, ये भी राष्ट्रीय अपमान थातो उस स्थान पर पहले जैसा मंदिर बनाना, यह भी राष्ट्र के सम्मान से जुड़ा हुआ विषय है। कोई छोटा, कोई बड़ा मैं इस दृष्टि से नहीं देख रहा हूं। राष्ट्र के सम्मान से जुड़े सभी विषय एक समान हैं। कोई आज हल हुआ, कोई कल हल होगा।

विवादित भूमि पर मंदिर बनना चाहिए, यह विचार कब आया?
देखिए, चार लोग हैं जिन्होंने मुकदमे दायर किए। पहला मुकदमा क्रमांक-एक 16 जनवरी 1950 को दायर हुआ। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से मांग की कि मैं रोज दर्शन करने आता हूंभगवान का भक्त हूं मेरे दर्शन में कोई बाधा नहीं पहुंचाए। जिन ठाकुर के दर्शन करता हूं उन्हें कोई उठाए नहीं, हटाए नहीं। केवल इतनी रिलीफ पहले मुकदमे में याची ने कोर्ट से की उनकी मांग आज तक चली आ रही है, उनके दर्शन पूजन होते हैं। पहले मुकदमे की बातें पूरी हो रही हैं। निर्मोही अखाड़े ने 17 दिसंबर 1959 को मुकदमा दायर किया। 1950 के बाद दर्शनार्थी दर्शन करने आने लगे तो कुछ न कुछ पैसा भी चढ़ाने लगे। तब उसके प्रबंधन की आवश्यकता पड़ी। भगवान की आरती, शयन आरती और भोग समय पर हों, इसके लिए वहां एक रिसीवर बैठाया गया। रिसीवर ने सारी व्यवस्थाओं का प्रबंध किया। ये सब 1950 में ही हो गया। लेकिन नौ साल के बाद निर्मोही अखाड़े को ध्यान आया कि इसका प्रबंध तो हमको करना चाहिए। उन्होंने अपने मुकदमे में कहा कि रिसीवर को हटाओ और ढांचे के नीचे जो भगवान की पूजा-आरती हो रही है, इसके प्रबंधन की जिम्मेदारी हमको सौंपें। न्होंने कहीं भी राम जन्मभूमि मंदिर शब्द का प्रयोग नहीं किया। नया मंदिर बनाएंगे, इसका कोई विचार नहीं है। वर्ष 1949 में भगवान प्रगट हुए। 1950 में रिसीवर बैठाए गए, दर्शन-पूजा चलती रही, लगभग 12 साल के बाद सुन्नी वक्फ बोर्ट को ध्यान में आता है कि ये स्थान हमारी मस्जिद थी। इसे सार्वजनिक मस्जिद घोषित किया जाए। भगवान हटाए जाएं, पूजा सामग्री हटाई जाए। निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ट के मुकदमे को हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को खारिज कर दिया। नो रिलीफ, शूट डिसमिस्ड। अंतिम मुकदमा है स्वयं भगवान रामलला का, जो उन्होंने अपने अभिन्न मित्र (Next friend) के माध्यम से दायर की। उस मुकदमे में उन्होंने कहा कि य मेरी जन्मभूमि है। मैं यहां पैदा हुआ हूं। मेरे भक्त यहां मंदिर बनाना चाहते हैं। मंदिर बनाने की अनुमति दी जाए। कोई मुझे यहां से हटा न दे, इसकी व्यवस्था की जाए। ये मुकदमा जीता है। हाईकोर्ट के तीनों न्यायाधीशों ने इस जीते हुए वाद क्रमांक-5 रामलला विराजमान के मुकदमे में से थोड़ी-थोड़ी जमीन निर्मोही अखाड़े और सुन्नी वक्फ बोर्ड को दी है। उनके मुकदमे में उन्हें जमीन नहीं मिली है। उनका मुकदमा तो पूरी तरह से रद्द हुआ है। विषय ये है कि क्या यह किया जा सकता था? वाद क्रमांक-5 कोई संपत्ति के बंटवारे का मुकदमा नहीं था। हमने बंटवारे की बात नहीं की थी। निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने भी बंटवारा नहीं मांगा था। बंटवारे की गवाही नहीं हुई। बंटवारे का दस्तावेज नहीं है। बंटवारे पर कोई इश्यू तैयार नहीं हुआ। हमने बंटवारा कहा ही नहीं था। हमारे मुकदमे में बंटवारा क्यों कर दिया गया। यह गलत है। यही कानून का एक बिंदु है जिसकी चर्चा सुप्रीम कोर्ट में होगी। मोल्डिंग आफ रिलीफ। आपने राहत कैसे दे दी, आपने अपने मन से मुकदमा बदल कैसे दिया। ये नहीं किया जा सकता था। यह बात महत्व की है, ये बात समाज को भी समझनी होगी।

यानी, मुकदमा था जन्मभूमि के स्वामित्व का, लेकिन हाईकोर्ट ने बंटवारा कर दिया?
देखिए, आज की 2019 की परिभाषा में स्वामित्व शब्द 1528 में कहां था। आज रेवेन्यू है, दाखिल-खारिज हैकिसके नाम खसरा-खतौनी में जमीन लिखी है, इसको कहते हैं स्वामित्व। 1528 में तो ये व्यवस्था ही नहीं थी। मुकदमा है एक मंदिर तोड़ा गया, उसको तोड़कर उसके मलबे से एक ढांचा बनाया गया। 1528 में जिसका मंदिर था, उसी का स्वामित्व होगा। इसे स्वामित्व का मुकदमा कहकर भी गलत दिशा मिलती है। बात बस इतनी है कि एक मंदिर था वो तोड़ा गया, हमें वो जमीन वापस चाहिए। हम मंदिर फिर से बनाएंगे। मंदिर था, स्वामित्व हमारा। कागज में क्या लिखा है ये महत्व की बात नहीं है। महत्व की बात है कि वहां मंदिर था या नहीं था।


जहां रामलाल विराजमान हैं, हाईकोर्ट के फैसले में वह हिस्सा रामलला को ही दी गयी है। क्या यह 2.77 एकड़ में से दी गयी है?
इसमें एक बात सुधार करने लायक है। वह यह है कि 2.77 एकड़ नाम की कोई शब्दावली अब नहीं है। कभी रही होगी। दिसंबर 1991 के बाद ही यह शब्दावली खत्म हो गयी। यूपी गवर्नमेंट ने उस विवादित ढांचे के चारों ओर 2.77 एकड़ भूमि अधिग्रहित की थी, उस अधिग्रहण को चुनौती दी जो स्वीकार कर ली गयीअधिग्रहण रद्द हो गया तो 2.77 एकड़ की बात ही खत्म हो गयी। 2.77 एकड़ ये शब्द प्रयोग गलत है। इसका कोई अस्तित्व नहीं है, ये शब्द प्रयोग भ्रम फैलाता है। बंटवारा हुआ है उतनी जमीन का जितना हाईकोर्ट ने विवादग्रस्त माना है। उसकी लंबाई-चौड़ाई है उत्तर-दक्षिण दिशा में- 135 फुट अधिक से अधिक 140 फुट। पूर्व-पश्चिम दिशा में 95 फुट अधिक से अधिक 100 फुट। 140 को 100 से गुणा करने पर क्षेत्रफल आता है- 14 हजार वर्गफुट यानी 0.3 एकड़। यही अदालत ने भी लिखा है। यही वह विवादित भूमि है जिसमें से हाईकोर्ट ने बंटवारा किया है। जो तीन गुंबदों वाले ढांचे के बीच का गुंबद था उसको तीनों न्यायाधीशों ने रामलला के लिए समर्पित माना है।

30 सितंबर 2010 के हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी। उसकी सुनवायी नौ साल बाद शुरू हो रही है। इस पर आपका क्या कहना है?
इसका दुख तो हमको भी है कि जनवरी 2011 से जुलाई 2017 तक हमारी अपीलों की फाइलें ही कभी नहीं खोली गयीं। इसका कारण तो न्यायपालिका से जुड़े हुए विद्वान बताएं। उस समय के न्यायपालिका का मार्गदर्शन करने वाले न्यायाधीश बताएं। उन्होंने सात साल तक क्यों बंद कमरे में पड़ा रखा। सुप्रीम कोर्ट में 17 डिब्बों में कागज है। कमरा शिल्ड है। आखिर क्यों ऐसा हुआ। इतने महत्वपूर्ण मुकदमे के साथ सात वर्षों तक यह अन्याय क्यों हुआ। इसका उत्तर न्यायालय के उन लोगों को बताना होगा जिन पर उस कालखंड में इस मुकदमे को सुनने या नहीं सुनने की जिम्मेदारी थी। हमें इसका कष्ट है। देश को भी इसका कष्ट है। नरेंद्र मोदी जी के सत्ता में आने के बाद 2017 से इसकी सुनवायी शुरू हो गयी। इतना ही संतोष है। इसमें दुख ये है कि सुप्रीम कोर्ट के बड़े लंबे अनुभवी वकीलों ने इस मुकदमे को चुनाव से जोड़ा और 2017 में कह दिया कि सुनवाई 2019 के चुनाव के बाद हो। ये उन वकील को बताना होगा कि इसको चुनाव से जोड़कर उन्होंने देश की कितना सेवा की, देश का कितना भला किया। सभी वकीलों के अपने-अपने तर्क होते हैं, लेकिन वही तर्क सही है जो समाज की भलाई के लिए हों अच्छा इतना ही हुआ है कि सब प्रकार की बाधाओं को पार करते हुए अब वर्तमान मुख्य न्यायाधीश महोदय ऐसा लगता है कि इस मुकदमे का निपटारा करने का मन बनाए हैं। अगर यह होता है तो उन पर भगवान की बड़ी कृपा ही होगी।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद 2003 में पांच महीने उत्खनन चला। उसकी रिपोर्ट से क्या यह सिद्ध होता है कि वहां राममंदिर था?
वर्ष 1993 में तत्कालीन राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से एक सवाल किया कि हमें यह सलाह दी जाए कि अयोध्या में उस विवादित भूमि पर 1528 के पहले कोई मंदिर था या नहीं। लगभग 20 महीने सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों ने इस पर चर्चा की। अंत में राष्ट्रपति का सवाल बिना कोई उत्तर दिये सम्मानपूर्वक वापस कर दिया गया। यह सवाल अटका ही रह गया कि 1528 के पहले क्या कोई मंदिर था? तब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साइंस एवं टेक्नोलॉजी का सहारा लिया। टेक्नोलॉजी के लोगों ने कहा कि यदि कोई बिल्डिंग किसी स्थान पर रही है और किसी ने उसको गिराया है तो जमीन के ऊपर का हिस्सा (सुपर स्ट्रक्चर) गिराया जाता है। सरकार भी जब बिल्डिंग गिराती है तो जमीन के ऊपर का हिस्सा गिराती है। इसलिए अगर कुछ गिराया गया होगा तो उसकी नींव और कुछ न कुछ अंश जमीन में जरूर मिलेंगी। इसलिए जमीन के नीचे फोटोग्राफी कराने की प्रक्रिया तय हुई। कनाडा के एक एक्सपर्ट ने फोटोग्राफी की। अपनी रिपोर्ट में कनाडा के एक्सपर्ट ने लिखा कि दूर-दूर तक जमीन के नीचे एक विशाल भवन है। मुझे दिख रहा है। तो जो वैज्ञानिक को दिख रहा है वह कोर्ट देखना चाहता है। इसलिए उत्खनन हुआ। उत्खनन से यह सिद्ध हो गया कि जमीन खाली या बंजर नहीं थी। वहां कोई बिल्डिंग था उस बिल्डिंग को तोड़कर ही नया भवन बना था। यह सिद्ध हुआ कि- इट वाज ए रिलीजियस स्ट्रक्चर। ये कोई फैमिली के रहने की जगह नहीं थी। 

राजीव गांधीचंद्रशेखर और नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व काल में इस विवाद को सुलझाने के प्रयास हुए। सभी विफल हो गए। क्या कारण आप मानते हैं?
वार्तालाप पहली बार राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्वकाल में हुई। बूटा सिंहजी और शीला दीक्षित जी वार्तालाप में बैठा करती थीं। सैयद शहाबुद्दीन साहब ने यह कह दिया था कि अगर ये पता लग जाए कि वहां कोई मंदिर था और उसे तोड़ा गया तो उसे हम स्वेच्छा से सौंप देंगे। एक दूसरे मुस्लिम नेता जो वहां बैठे थे, उन्होंने कहा था कि यह कोई माचिस कि डिब्बी नहीं है जो दे देंगे।  यह मौखिक वार्तालाप होती थी इसलिए इसका रिकॉर्ड नहीं है। लेकिन सरकार के रिकॉर्ड में यह लिखा है कि कुछ मुस्लिम नेताओं ने ये वन दिया कि यदि ये सिद्ध हो गया कि यह मंदिर था तो वह इस पर दावा छोड़ देंगे। इस रिकॉर्ड में किसी का नाम नहीं है। किसी तारीख का भी जिक्र नहीं है। वार्तालाप का सबसे ईमानदार प्रयास चंद्रशेखर जी के कार्यकाल में हु था चंद्रशेखर जी ने चार मध्यस्थ नियुक्त किये। राजस्थान, महाराष्ट्र एवं उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री क्रमशः- भैरोसिंह शेखावत, शरद पवार, मुलायम सिंह और तत्कालीन गृह राज्यमंत्री सुबोधकांत सहाय। इन चार लोगों की उपस्थिति में वार्ता होती थी। एक आईपीएस अफसर कुणाल किशोर ओएसडी के रूप में नियुक्त हुए। इस वार्तालाप का रिकॉर्ड मिलता है। हमारे पास भी है। इसके बाद 1992 में पीवी नरसिम्हा राव की प्रेरणा से वार्ता हुई, परंतु पत्राचार के द्वारा। ये पत्राचार उपलब्ध है। ये वार्ता किसीनिष्कर्ष पर पहुंची ही नहीं और छह दिसम्बर आ गया। इसलिए तीन बार के वार्तालाप का इतिहास है।  

सुप्रीम कोर्ट का तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल अपने उद्देश्यों में विफल हो गया। आपका क्या कहना है?
मध्यस्थता पैनल की यह इच्छा थी कि इस वार्ता को गुप्त रखा जाए। हमने उसका पालन किया, अन्य लोगों ने भी किया। अभी वार्तालाप में क्या हुआ, क्या सवाल-जवाब हुए, क्या वो चाहते थे, क्या हम नहीं चाहते थे, इन सभी बातों का खुलासा करने का यह उपयुक्त समय नहीं है। समय आने पर जरूर बताया जाएगा कि यह वार्ता क्यों विफल हुई। ये देश के सम्मान की लड़ाई है, किसी व्यक्ति की लड़ाई नहीं है। इसलिए वार्तालाप सफल नहीं हो पा रही है। ये समाज के सम्मान से जुड़ा हुआ विषय है। समाज एक बहुत व्यापक शब्द है। इसलिए वार्ता में मुस्लिम पक्ष को भी कठिनाई हो रही है। वार्तालाप में इस स्थान को छोड़ना उनके सम्मान को ठेस पहुंचाएगा। उन पर उन्हीं के समाज के लोग भिन्न-भिन्न प्रकार के आरोप लगाएंगे। हम तो वार्तालाप की शर्तें स्वीकार कर ही नहीं सकते। परंतु वार्तालाप की शर्तें स्वीकार करना मुस्लिम समाज के नेताओं के लिए भी घातक होता। इसलिए जो हुआ, ठीक हुआ।

सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमे में ये 14 पक्षकार कौन-कौन हैं?
देखिए, जिन्होंने मुकदमा दायर किया, उन्हीं के पक्ष में कोई राहत मिलती है। वो कुल हैं चार। 1950 में गोपाल सिंह विशारद, 1959 में निर्मोही अखाड़ा, 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड और 1989 में रामलला विराजमान। शेष अन्य जितने भी हैं वो सब या तो प्रतिवादी हैं, या जिन्होंने बीच में इंटरवेंशन (हस्तक्षेप) किया है, हस्तक्षेप करके जो अंदर आए हैं। इन्हें कोई राहत नहीं मिलती। ये मूल मुकदमे के पक्षकार नहीं माने जाते। हां, किसी न किसी पक्ष को ये लाभ या हानि पहुंचाते हैं। इसलिए ये जो चार वादी हैं, समर्थ हैं, सक्षम हैं। पूरी तैयारी से मुकदमा लड़ रहे हैं। इसलिए जो बाकी के 10 लोग हैं, वो हमारे लिए कोई बहुत ज्यादा चिंता का विषय नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस नवंबर में रिटायर हो जाएंगे। क्या आपको विश्वास है कि तब तक यह फैसला आ जाएगा?
उत्तर- यह मुकदमा कोई बहुत लंबा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट को अपने समय का महत्व पता है। कोर्ट में एक मिनट की बात को एक दिन में कहना, ये वकील की भी अयोग्यता का प्रतीक है। या वकील जानबूझकर समय बर्बाद कर रहा है। अगर कोर्ट ने इसको नियंत्रित किया, सूत्र रूप में बातें रखी गयीं, विस्तार से लिखकर दो, मौखिक कम समय लो, अगर सब लोगों ने इसका पालन किया तो मुझे विश्वास है कि यह मामला अक्टूबर में समाप्त हो जाएगा।

पिछले दिनों अनुवाद का मुद्दा उठा था, अनुवाद न होने के कारण सुनवाई स्थगित कर दी गयी, इसके पीछे का क्या कारण है?
बस, समय बर्बाद करना था। अनुवाद हो चुका था। अनुवाद को सुन्नी वक्फ बोर्ड के स्थानीय वकीलों ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद भी एक बड़े बुजुर्ग वकील अनुवाद का बहाना लेकर खड़े हो गए, शायद उनकी आयु के कारण या जोर-जोर से बोलने के कारण, ये समय बर्बाद हो गया। अब फिर से उन्होंने अनुवाद के विषय को लगभग समाप्त कर दिया है। जनवरी-फरवरी 2018 में ही अनुवाद का चैप्टर क्लोज हो चुका है।  

सोमनाथ मंदिर के प्रबंधन के लिए एक ट्रस्ट बनाया गया। क्या राममंदिर बन जाने के बाद भी इसके संचालन के लिए ट्रस्ट बनेगा?
यह भविष्य की बातें हैं। यह सब डिपेंड करेगा सरकार पर या कोर्ट पर। हम पर डिपेंड ही नहीं करेगा। हां, सरकार सोचे इस बारे में, हम तो नहीं सोचते।

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