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शुक्रवार, नवंबर 07, 2008

"तुमको प्रणाम"

हे भारत के अग्रदूत ! हे कालजयी !
तुमको प्रणाम, है कोटि-नमन
शत-शत अभिनन्दन औ बंदन।
सूर्य-पुंज की तरह ज्योति छलकाने वाले
तन-मन-धन सबकुछ अर्पित कर
राष्ट्रसिंधू की धारा में मिल जाने वाले,
हे भारत के भाग्यविधाता !
जन-गन-मन के सच्चे त्राता
तुमको प्रणाम, है कोटि-नमन ---!!
हे भारतभूमि उद्धारक !
राष्ट्रध्वजा के सच्चे वाहक
देवभूमि औ ध्येयभूमि के सबल सुधारक
धर्मभूमि औ समरभूमि के अमर सहायक
महामुक्ति के कोकिल गायक
नवयुग नवजग राष्ट्र-विधायक
पुरे जग को पथ दिखलाने वाले ,
हे भारत के नायक !
तुमको प्रणाम, है कोटि नमन
शत-शत अभिनन्दन औ बंदन !!

शुक्रवार, अक्टूबर 24, 2008

'मानव'

पृथ्वी पर मनुष्य ही
एक ऐसा प्राणी है,
जो अपने मद में मस्त,
अपने में पस्त,
जीवन-यापन में ब्यस्त,
लोगों को करता है त्रस्त,
पता नहीं किस नशे में चूर,
दुनिया से बहुत दूर,
दूसरो के प्रति क्रूर,
अपने जीवन का एक-एक क्षण,
समाज की गतिबिधियों से परे होकर
गुजार देता है.
आखिर ऐसा क्यों है ?
क्या वह नहीं जनता
या फिर,
इस पड़ाव को मंजिल समझकर
अपना लक्ष्य भूल गया है.
जरा सोच !
जिस वत्सल मातृभूमि ने
तुमको जन्म दिया,
पालन-पोषण किया,
उसके प्रति तुम्हारा
कुछ कर्त्तव्य नहीं बनता क्या ?
अब बहुत हो चुका,
निरुद्देश्य मत भटक !
जीवन की सार्थकता को समझ !
हवा में नहीं
ज़मीन से जुड़कर
चिंतन किया कर !

शनिवार, अगस्त 30, 2008

संकल्प

आओ कोलाहल को स्वर दें !
बिखरे भावों को शब्द,
शब्द को गीत,
गीत को लय दें।

वर्षा के जल को प्रवाह दें,
प्रवाह को दिशा ,
नदी को भगीरथ तट दें।

संशय भरे अनिश्चय को निष्ठा ,
निष्ठां को विश्वास ,
विश्वास को संकल्पित मन दें।

भटके लोगों को राह ,
राह को ध्येय ,
ध्येय तक बढ़ते पग दें ,
आओ कोलाहल को स्वर दें ।

प्रस्तुति : पवन कुमार अरविन्द

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