रूस की अदालत ने भगवद्गीता के रूसी भाषा में अनूदित संस्करण 'भगवत् गीता एस इट इज' पर रोक लगाने और इसके वितरण को अवैध घोषित करने की याचिका 28 दिसम्बर को खारिज कर दी। इसके अनुवादक इस्कान के संस्थापक ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद हैं। इसके प्रकाश में आने के बाद से ही कुछ ईसाई संगठनों ने खिलाफत का झंडा उठा लिया था। रूस के शक्तिशाली आर्थोडॉक्स चर्च का कहना था कि यह जर्मन तानाशाह एडॉल्फ हिटलर की आत्मकथा ‘मीन कांफ’ से कम नहीं है। चर्च से जुड़े एक संगठन ने जून में इसके खिलाफ साइबेरिया प्रांत के तोमस्क शहर की अदालत में याचिका दायर की थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि यह उग्रवादी विचारधारा को बढ़ावा देती है। अदालत ने महीनों चली सुनवाई के बाद 19 दिसंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने 28 दिसम्बर के रूसी अदालत के फैसले पर खुशी जताई। उन्होंने कहा कि रूसी अदालत में दायर याचिका कुछ सनकी लोगों की दिमागी उपज थी। विगत दिनों इस मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में काफी हंगामा हुआ था। रूसी अदालत के फैसले की सूचना भारत सरकार ने भी लोकसभा को दी। लोकसभा में नेता सदन एवं वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने अधिकृत रूप से 29 दिसम्बर को बताया कि रूसी अदालत ने भगवद्गीता के अनूदित संस्करण पर प्रतिबंध लगाने से इंकार कर दिया है। प्रणव की सूचना का सभी सदस्यों ने मेजें थपथपाकर स्वागत किया।
दरअसल, भगवद्गीता में विरोध लायक कुछ नहीं है। रूस में जो लोग इसका विरोध कर रहे थे, उनकी पृष्ठभूमि सर्वविदित है। भगवद्गीता के संकलनकर्ता महर्षि वेदव्यास ने इसे मानवमात्र का धर्मशास्त्र कहा है। उन्होंने इसे सारे वेदों के प्राण और उपनिषदों का भी सार बताया है। यद्यपि विश्व में सर्वत्र गीता का समादार है फिर भी यह किसी सम्प्रदाय या मजहब का ग्रन्थ नहीं बन सका; क्योंकि सम्प्रदाय किसी न किसी रूढ़ि से जकड़े हैं। यह किसी विशिष्ट व्यक्ति, जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, पन्थ या देश-काल का ग्रन्थ नहीं है बल्कि यह सार्वलौकिक व सार्वकालिक है। विश्व मनीषा की अमूल्य धरोहर है।
इसका प्रादुर्भाव महाभारत युद्ध के दौरान हुआ। युद्धक्षेत्र ‘कुरुक्षेत्र’ में कौरव और पाण्डव पक्ष की सेना लड़ने को तैयार थी और अपने-अपने सेनापतियों के शंख फूँकने की प्रतीक्षा कर रही थीं। ठीक उसी समय पाण्डव पक्ष का मुख्य योद्धा अर्जुन अपना ‘गाण्डीव’ रथ के पिछले हिस्से में रखकर बैठ जाता है और कृष्ण से कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूंगा। युद्ध में अपने ही प्रियजनों, सगे-संबंधियों को मारकर खून से सने राज्य का भोग करने से बेहतर भिच्छा का अन्न ग्रहण करना होगा। इसलिए हे भगवन् ! कोई दूसरा उपाय बताइए। क्योंकि अपने ही सगे-संबंधियों को देखकर मेरे हाथ-पांव कांप रहे हैं।
कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार करने के निमित्त उपदेश दिये थे। इस उपदेश का संकलन ही भगवद्गीता है। दरअसल, कृष्ण ने इस उपदेश का माध्यम अर्जुन को बनाया, लेकिन उनका उद्देश्य समूचे जगत को अमूल्य शिक्षा देने से था। यह युद्धक्षेत्र में दिया गया अहिंसा का अद्वितीय संदेश है।
गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भगवद्गीता में कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। इसमें संजय-धृतराष्ट्र और कृष्णार्जुन के संवाद हैं। कुल 42 श्लोंकों में संजय-धृतराष्ट्र संवाद और 658 श्लोंकों में कृष्णार्जुन संवाद का वर्णन है। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से 84 श्लोंकों के माध्यम से प्रश्न किए हैं। कृष्ण ने इसका उत्तर कुल 574 श्लोंकों के माध्यम से दिये हैं।
अज्ञान से आवृत्त धृतराष्ट्र जन्मान्ध है; किन्तु संयमरूपी संजय के माध्यम से वह हस्तिनापुर राजमहल में बैठकर महाभारत युद्ध देखता व सुनता है। उसकी बातों में चिन्ता है, लेकिन पश्चाताप् का भाव नहीं है। उसको पश्चाताप् तब होता है जब सारा खेल खत्म हो जाता है। उसका रुख केवल प्रश्नवाचक है और संजय से बार-बार पूछता है कि कुरूक्षेत्र का ताजा समाचार क्या है?
भगवद्गीता का मूल श्रीकृष्णार्जुन संवाद है। इसमें वैश्विक सृष्टि के सारे निहितार्थ समाहित हैं। यह समाधानकारक ग्रन्थ है, साथ ही वैज्ञानिक भी। यह स्वयं में एक सम्पूर्ण ग्रन्थ है। इसमें कहीं भी हिंदू-मुस्लिम या अन्य मत-पंथ सम्प्रदायों की चर्चा नहीं है। इसमें प्रबंधन की शिक्षा और पर्यावरण परिरक्षण का पाठ है। त्याग है, तपस्या है। सदाचार के पाठ भी समाहित हैं। घर और परिवार के संचालन की शिक्षा है। समाज में बड़ों के साथ व्यवहारगत शिक्षा का समावेश है।
गीता का विरोध करने वाले याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह युद्ध के लिए प्रेरित करती है। हालांकि, गीता में युद्ध के लिए प्रेरित करने का सवाल ही नहीं है। यह लड़ाई तो विधर्मियों के खिलाफ थी। यदि विधर्मियों के खिलाफ लड़ना अनैतिक है, तो न लड़ना या जीवनदान देना उससे भी बड़ा अनैतिक है।
कोई व्यक्ति क्या कहता है या क्या कहना चाहता है, इसका केवल शब्दों से ही अर्थ नहीं निकाला जा सकता। श्रीकृष्ण ने जिस समय गीता का उपदेश दिया था, उस समय उनके मनोगत भाव क्या थे? मनोगत भाव पूर्ण रूप से केवल वाणी द्वारा ही व्यक्त नहीं किये जा सकते। वाणी द्वारा कुछ तो व्यक्त हो जाते हैं, लेकिन कुछ भाव-भंगिमा से व्यक्त होते हैं और शेष पर्याप्त क्रियात्मक होते हैं। इसे कोई पथिक चलकर ही जान सकता है। जिस स्तर पर श्रीकृष्ण थे, क्रमश: चलकर उसी अवस्था को प्राप्त महापुरुष ही जानता है कि गीता क्या कहती है। श्रीकृष्ण ने कहा भी है कि इसको समझने के लिए किसी योग्य पुरुष का सानिध्य आवश्यक है।
इस पर प्रतिबंध की मांग करने वाले याचिकाकर्ता ने गीता को समझने के लिए क्या किसी योग्य पुरुष की शरण ली, या फिर पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर ही सारे आरोप लगा दिए? हालांकि, भगवद्गीता में आस्तिकता-नास्तिकता और आस्था-अनास्था का प्रश्न ही नहीं है। यह तो समाज के सभी क्षेत्रों के प्रबंधन का पाठ है। यह देववाणी का संकलन है। कालजयी ग्रन्थ है। इस कारण इसकी प्रासंगिकता हर कालखण्ड में है। पूर्वाग्रह ही इसके विरोध की मूल प्रेरणा है।
गुरुवार, दिसंबर 29, 2011
सार्वलौकिक और सार्वकालिक ग्रन्थ है भगवद्गीता
सोमवार, दिसंबर 12, 2011
साम्प्रदायिक हिंसा बिल के खिलाफ होगा देशव्यापी आंदोलन
भारतीय संस्कृति सभा के तत्वावधान में दिल्ली स्थित ज्वालामुखी मंदिर में आयोजित दो दिवसीय ‘अखिल भारतीय शीर्ष संत समागम’ ने एक स्वर से “साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा विधेयक - 2011” का विरोध करते हुए राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) को तत्काल भंग किये जाने की मांग की।
समागम में पारित प्रस्ताव में विधेयक को देश को तोड़ने वाला, असंवैधानिक, हिंदू एवं मुस्लिमों को बांटने वाला, देश के हिंदुओं को गुनहगार मानकर विश्व में सहिष्णु हिंदु संस्कृति को बदनाम करने वाला, दंगाई, जेहादी, व्यवहार को प्रोत्साहन एवं हिंसा करने के बाद संरक्षण देने वाला, देश के प्रशासन के ऊपर इस कानून के द्वारा नई असंवैधानिक व्यवस्था खड़ी करने वाला बताया गया।
इस दौरान विशेष रूप से आमंत्रित किये गये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव मधुकर भागवत ने कहा कि विश्व में धर्म की एकमात्र शक्ति भारत बची है, जो अन्य मजहबों के लोगों को अपने मार्ग का रोड़ा लगता है, उनकी मंशा पूरी हो सके इसके लिए वे भारत को तोड़ने में लगे हुए हैं।
उन्होंने कहा कि प्रस्तावित विधेयक देखने से स्पष्ट हो जाता है कि यह अन्याय को न्याय बनाने वाला, प्रशासन को पंगु और पंचमहापातक को नियम बनाने वाला विधेयक है। संघ प्रमुख ने कहा कि संत समाज के विरोध के कारण वे विधेयक में कुछ परिवर्तन की बात करने लगे हैं किंतु यह ऐसा ही है मानो ताड़का को पूतना के रूप में प्रस्तुत किया जाए।
डॉ. भागवत ने उपस्थित संत समुदाय से अपील की कि इस विधेयक को खारिज करवाने के लिए बड़ा शक्ति प्रदर्शन करना होगा जिसके लिए पूरी तैयारी रखनी है। इसके लिए आवश्यक जनजागरण की विस्तृत योजना संत समाज तय करे जिसमें संघ पूरी तरह सहभागी होगा।
कार्यक्रम के उपरांत संवाददाताओं से बातचीत करते हुए विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अशोक सिंहल ने कहा कि परिषद इस विधेयक सहित देश में तुष्टीकरण के प्रत्येक प्रयास का कड़ा विरोध करेगी।
उन्होंने कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में प्रधानमंत्री से मिलने गये 25 कांग्रेसी सांसदों के प्रतिनिधिमंडल द्वारा 12वीं पंचवर्षीय योजना में मुस्लिम समुदाय के लिए 15 प्रतिशत बजट आवंटन का विशेष प्रावधान किये जाने को तुष्टीकरण की पराकाष्ठा करार दिया।
प्रस्ताव में कहा गया है, “इस विधेयक से देश के मंदिर, संत, रामलीला, गणेशोत्सव तथा हिंदुओं के अन्य धार्मिक कार्यक्रम, हिंदुओं की सामाजिक धार्मिक संस्थाएं, हिंदुओं के व्यापार, जेहादियों के दया पर निर्भर हो जायेंगे। संतों की यह सभा देश के सभी संत, सभी सामाजिक-धार्मिक बिरादरी की संस्थाओं का आह्वान करती है कि इस विधेयक के खिलाफ देशव्यापी जनजागरण एवं आदोलन हो और दिल्ली में भी प्रदर्शन की तैयारी हो।”
समागम में संतों ने संकल्प व्यक्त किया और कहा कि इस विधेयक को किसी भी कीमत पर कानून का रूप नहीं लेने देंगे। इसके लिए देश की जनता किसी भी प्रकार के बलिदान के लिए तैयार है। संतों के इस प्रस्ताव को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद सहित देश के लगभग सभी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक संगठनों ने अपना खुला समर्थन व्यक्त किया।
मंगलवार, मई 25, 2010
विदेशों में भारतीय माटी की महक

भारत का अतीत ही गौरवशाली नहीं रहा बल्कि भविष्य भी गौरवशाली है। इसकी छटा समय-समय पर देखने और सुनने को मिलती रहती है।
यह भारत के माटी की ही विशेषता है कि भारतीयता में सराबोर भारतीय मूल के व्यक्ति जहां कहीं भी जाते हैं, अपनी पहचान का झंडा जरूर गाड़ते हैं।
शायद इसीलिए यह समाचार सुनकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि भारतीय मूल की कमला प्रसाद बिसेसर कैरिबियाई देश त्रिनिदाद एण्ड टोबैगो की पहली महिला प्रधानमंत्री चुनी गई हैं।
यह पहला अवसर है जब कोई भारतीय मूल की महिला किसी देश के प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुई है। हालांकि, इससे पहले फिजी और मॉरीशस में भारतीय मूल के नेता सर्वोच्च पद पर आसीन रह चुके हैं।
कमला ईश्वर में अपार विश्वास रखने वाली हिंदू महिला हैं। उन्होंने लॉ-स्कूल में टॉप करने के साथ-साथ वेस्टइंडीज विश्वविद्यालय से प्रबंधन किया है। इसके अलावा वह शिक्षा के क्षेत्र में डिप्लोमा भी कर चुकी हैं। वह देश में कई प्रमुख पदों पर काम कर चुकी हैं।
कमला के पूर्वज उन 148,000 भारतीय श्रमिकों में से एक रहे हैं, जो 1845 से 1917 के बीच कैरेबियाई द्वीपों पर गन्ने और कोकोआ के खेतों में काम करने के लिए लाए गए थे। त्रिनिदाद एवं टोबैगो की जनसंख्या 13 लाख है, जिसकी 44 फीसदी आबादी भारतीय है।
विपक्षी दल यूनाइटेड नेशन्स कांग्रेस (यूएनसी) की अध्यक्ष एवं पूर्व अटॉर्नी जनरल 58 वर्षीय कमला बिसेसर ने पिछले 13 साल से प्रधानमंत्री पद संभाल रहे पीपुल्स नेशनल मूवमेंट पार्टी के नेता पैट्रिक मैनिंग को आम चुनाव में पराजित किया है।
पैट्रिक ने हार स्वीकार कर ली है। वह 1997 से देश के प्रधानमंत्री थे, जबकि उनकी पार्टी चार दशक से भी अधिक समय से सत्ता में है। जानकारी के मुताबिक, देश में पिछले 10 साल में यह पांचवें चुनाव हुए हैं।
मैनिंग ने विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को टालने के लिए मध्यावधि चुनाव की घोषणा की थी। इससे पहले मैनिंग पर लगातार धन के दुरूपयोग और सार्वजनिक इमारतों के निर्माण पर अंधाधुंध खर्च के आरोप लगते रहे थे।

कमला के नेतृत्व में चुनाव लड़ने वाले राजनीतिक गठबंधन ने भारी बहुमत के साथ सत्तारूढ़ पार्टी के 43 वर्ष के शासन को खत्म किया है। कमला की पीपुल्स पार्टनरशिप पार्टी ने सोमवार को हुए मतदान में 41 में से 29 संसदीय सीटों पर कब्जा किया।
करीब तेरह लाख की जनसंख्या वाले छोटे देश त्रिनिदाद एण्ड टोबैगो में लगभग पचास प्रतिशत संख्या उन लोगों की है, जिनके पूर्वज उस समय भारत से वहां गए थे, जब यह देश ब्रिटेन के कब्जे में था।
मंगलवार, अप्रैल 13, 2010
अनूठा है गाजियाबाद का नंदी पार्क
नगर के सांड़ों के लिए गाजियाबाद नगर निगम ने एक 'नंदी पार्क' बनाया है और नगर में इधर-उधर घूमने वाले छुट्टा सांड़ों को यहां रखने का समुचित प्रबंध किया गया है।
इस समय पार्क में लगभग 260 सांड़ हैं। देश के इस पहले नंदी पार्क की स्थापना कराने वाली नगर की महापौर श्रीमती दमयंती गोयल बताती हैं कि इन सांड़ों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इन सांड़ों को यहां प्रशिक्षित किया जाता है और ये सांड़ अपने लिए चारा काटने, पानी निकालने और इनवर्टर चार्ज कर अपने लिए बिजली उत्पादन की व्यवस्था भी स्वयं कर रहे हैं। इन सांडों से प्राप्त गोबर से कम्पोस्ट खाद तैयार की जा रही है, जो अच्छे दामों पर नंदी कम्पोस्ट के नाम से बाजार में बिकने लगी है।
नंदी पार्क में स्वस्थ उन्नत नस्ल के सांडों को प्रजनन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है और दो सौ रूपये प्रति गाय की दर से गर्भाधान की कीमत भी प्राप्त की जा रही है। प्रतिदिन चार-पांच गाय प्रजनन के लिए यहां लाई जाती हैं। श्रीमती दमयंती गोयल बताती हैं कि तीन वर्ष पूर्व जब उन्होंने नगर निगम की बागडोर संभाली थी तब नगर में आवारा सांड़ों की संख्या बहुत अधिक थी। इन सांड़ों ने एक वर्ष के भीतर एक दरोगा समेत दो लोगों की जान ले ली और एक दर्जन से अधिक लोगों को बुरी तरह घायल कर दिया।
तब नगर निगम ने अनेक गोशालाओं से सम्पर्क किया मगर कोई भी इन सांड़ों की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हुआ। अत: उन्होंने नगर आयुक्त अजय शंकर पांडे के साथ मंत्रणा कर साहिबाबाद में बेकार और बंजर पड़ी भूमि पर नंदी पार्क की नींव रख दी।
धीरे-धीरे अनेक संगठन भी इन सांड़ों की देखभाल के लिए आगे आने लगे। सर्दी के दिनों में इन सांड़ों को गुड़ खिलाने वालों का यहां तांता लगने लगा।
नगर के शनि मंदिरों में चढ़ाए जाने वाले तेल को मंदिर के पुजारियों से एकत्रकर इन सांड़ों को तेल पिलाया जाता है। देश भर के नगर निगम प्रमुखों का एक प्रतिनिधिमंडल हाल में ही इस पार्क को देखने पहुंचा। यही नहीं अनेक महापौर अपने-अपने नगरों में इसी प्रकार के पार्क विकसित करने का संकल्प लेकर गये।
नंदी कम्पोस्ट और प्रजनन संवर्धन केंद्र से आवारा सांड अपनी देखभाल और खुराक का खर्च स्वयं निकाल रहे हैं। कोल्हू में जोतकर पानी निकालने, बिजली बनाने और चारा मशीन चलाने का यह अभिनव प्रयोग गाजियाबाद में अब लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गया है।
रविवार, मार्च 07, 2010
केवल मनरेगा से बदहाली दूर नहीं होगीः प्रो.महाजन

दिल्ली विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के आचार्य एवं राष्ट्रवादी चिंतक प्रो. अश्वनि महाजन ने कहा है कि वित्तीय संकटों के संदर्भ में यह बजट निराशाजनक है। बजट में नये रोजगार उपलब्ध कराने के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। जबकि रोजगार के साधनों का कम होना मुख्य समस्या है।
प्रो. महाजन ने दूरभाष पर बातचीत में कहा कि “लगता है कि सरकार ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ (मनरेगा) को देश के सम्पूर्ण युवकों के लिए रोजगार देने का माध्यम मान बैठी है। जबकि इस योजना से केवल मजदूर स्तर के रोजगार की ही संभावना रहती है।”
प्रो. महाजन ने कहा कि मनरेगा के माध्यम से सरकार वर्ष के 365 में से 100 दिनों के रोजगार देने के नाम पर शेष 265 दिनों की बेरोजगारी की गारंटी लेती है। यह देश की जनता के साथ धोखा है।
उन्होंने कहा कि बेरोजगारी दूर करने के लिए केवल मनरेगा से काम नहीं चलेगा बल्कि स्थाई उपाय करने होंगे औऱ इसके लिए सरकार तैयार नहीं है। यह बजट के प्रति निराशा का प्रमुख कारण है।
कृषि पर चर्चा करते हुए प्रो. महाजन ने कहा कि उत्पादन लगातार अस्थिर बना हुआ है। गन्ने, तेल, चीनी, दलहन सहित अन्य फसलों का उत्पादन घट रहा है। इसका प्रभाव पूरे देश पर पड़ रहा है। बजट में इन सब समस्याओं की अनदेखी की गई है। यह बजट के निराशाजनक होने का दूसरा बड़ा कारण है।
उन्होंने कहा कि सरकार खेती में आधुनिक भंडारण सुविधाओं के लिए विदेश से पैसा लाने का दरवाजा जरूर खोलती है लेकिन खेती में उपज बढ़ाने की चर्चा करना भी मुनासिब नहीं समझती।
उन्होंने कहा कि सरकार यह अच्छी तरह जानती है कि खेती की बदहाली औऱ कालाबाजारी ही महंगाई का प्रमुख कारण है। इसके बावजूद भी महंगाई घटाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है।
उन्होंने कृषि ऋण को पांच प्रतिशत किए जाने पर कहा, ‘यह फैसला काबिले तारीफ है, लेकिन ब्याज दर यदि शूऩ्य प्रतिशत कर दी जाए तो भारत का किसान खुशहाल हो जाएगा और कर्ज के बोझ के कारण आत्महत्याएं करने पर मजबूर नहीं होगा।’
उन्होंने कहा कि किसानों की समस्याएं तभी दूर होंगी जव कृषि को मौलिक स्वरूप देने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाए। केवल बजट में बढ़ोत्तरी कर देना समस्याओं के समाधान के लिए नाकाफी है।
उन्होंने कहा कि सरकार राष्ट्रमण्डल खेलों के लिए हजारों करोड़ रुपए खर्च करने की घोषणा करती है जबकि देश के पूर्वी क्षेत्रों में हरित क्रांति के लिए सिर्फ 400 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार का यह कदम एक छलावा भर है।
शनिवार, फ़रवरी 27, 2010
गंगा नदी पर राजनीति बंद करे सरकारः गोविंदाचार्य

पवन कुमार अरविंद, नई दिल्ली। सरकार द्वारा आम बजट में गंगा की सफाई के लिए धनराशि को दोगुना किए जाने पर राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संयोजक श्री के.एन. गोविंदाचार्य ने कहा है कि गंगा नदी के संदर्भ में सरकार का रवैया शुरु से ही धोखाधड़ीभरा रहा है। सरकार में बैठे लोग अच्छी तरह जानते हैं कि केवल बजट में बढ़ोत्तरी कर देने से गंगा निर्मल नहीं होगी। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा आवंटित धन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। इसलिए इस मुद्दे पर केवल धनराशि में बढ़ोत्तरी ही बहुत मायने नहीं रखती है।
श्री गोविंदाचार्य ने दूरभाष पर हुई बातचीत में कहा कि गंगा में जब तक गोमुख से आने वाला 70 प्रतिशत जल नहीं रहेगा तब तक सरकार 500 करोड़ क्या 5 हजार करोड़ भी खर्च करे, गंगा निर्मल नहीं हो सकती।
ज्ञातव्य हो कि वित्त मंत्री श्री प्रणब मुखर्जी ने आम बजट में गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की राशि दोगुना बढ़ाकर 500 करोड़ रुपए कर दिया है। यह राशि मूल रूप से गंगा की सफाई में खर्च किया जाएगा।
उन्होंने कहा, “गंगा को ‘गंगा’ बनाए रखने के लिए आवश्यकता इस बात की है कि उसका प्रवाह अविरल बना रहे। जबकि मौजूदा सरकार विकास के नाम पर इसके अविरल प्रवाह को अवरुद्ध कर रही है।”
श्री गोविंदाचार्य़ ने कहा कि प्रदूषण को दूर किए जाने के नाम पर सरकार जनता की आंखों में धूल झोंकने का कार्य कर रही है।
गुरुवार, जनवरी 21, 2010
अपने विकास के लिए भारत की ओर निहार रहा है इंग्लैण्ड
भारतीय संस्कृति, सभ्यता और इस पर आधारित कालजयी अर्थव्यवस्था एवं भारतीयों की उच्चकोटि की प्रतिभा ने दुनिया में अपना लोहा मनवाया है। शायद यही कारण है कि सैकड़ों वर्षों तक भारत पर साम्राज्यवाद की छड़ी घुमाने वाला इंग्लैण्ड आज अपने विकास के लिए भारत की ओर देख रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत और भारतीयों के बढ़ते प्रभाव के कारण ही इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री श्री गार्डन ब्राऊन को यह कहना पड़ा है कि भारत और भारतीय समुदाय के लोगों के योगदान के बिना इंग्लैण्ड अपने मुकाम पर कायम नहीं रह सकेगा। उन्होंने कहा है कि इंग्लैण्ड की प्रगति में भारतीयों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत के साथ ठोस संबंध आधुनिक इंग्लैण्ड के लिए आवश्यक है।
श्री ब्राउन ने भारतीय गणतंत्र की 61वीं वर्षगांठ के अवसर पर इंग्लैण्ड की प्रमुख पत्रिका “एशियन लाइट” के गणतंत्र दिवस विशेषांक के लिए लिखे अपने एक लेख में कहा है कि 21वीं सदी में इंग्लैण्ड और भारत के बीच बराबरी की साझेदारी के रूप में ऐतिहासिक संबंध और प्रगाढ़ होंगे।
श्री ब्राऊन ने लिखा है कि आश्चर्यजनक गति से परिवर्तन, गतिशीलता और बड़ा करने की क्षमता ही सभी भारतीयों की पहचान है। भारत का आजादी के लिए लंबा सफर अब एक तेज सफर के रूप में तब्दील होकर संपन्नता की ओर उन्मुख है।
उन्होंने लिखा है कि भारत के संविधान अंगीकार करने और इंग्लैण्ड उपनिवेश से गणराज्य बनने के साठ वर्ष पूरे हो रहे हैं। भारत के साथ अपने मजबूत संबंधों और भारतीय समुदाय के लोगों के योगदान के बिना इंग्लैण्ड अपने मुकाम पर कायम नहीं रह सकेगा।
इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री ने लिखा है कि कई वर्षों से हमारी लोक सेवाओं, पेशों, कारोबार और सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योगों को भारतीय समुदाय उन्नत बनाता रहा है, इसलिए इंग्लैण्ड-भारत संबंध हमारी साझी संपन्नता का केंद्र है और भारतीय मूल के लोग यहां आधुनिक इंग्लैण्ड समाज के अभिन्न अंग हैं।
दस डाऊनिंग स्ट्रीट पर दीवाली के आयोजन की याद ताजा करते हुए श्री ब्राउन ने लिखा है कि इंग्लैण्ड में रहने वाले भारतीय मूल के जानेमाने लोगों से उनकी बातचीत उन्हें दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के बीच गहरी दोस्ती और सम्मान का स्मरण कराती है।
उन्होंने कहा कि इंग्लैण्ड और भारत, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन और परमाणु प्रसार जैसे प्रमुख मुद्दों का साथ मिलकर मुकाबला करते रहे हैं।
सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों की सफलता के लिए श्री ब्राऊन ने कहा है कि अगले वर्ष इंग्लैण्ड 82.5 करोड़ पौंड मुहैया कराएगा, जिसमें से करीब 50 करोड़ पौंड की राशि भारत में स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च की जाएगी। उन्होंने कहा कि मैं भारत की उन लड़कियों से प्रेरित हुआ हूं जो स्कूल जा रही हैं, प्रशिक्षण हासिल कर रही हैं और नौकरियां प्राप्त कर रही हैं। उन्होंने कहा कि हमें हर बच्चे को शिक्षा का बुनियादी अधिकार देना चाहिए।
शुक्रवार, जनवरी 15, 2010
आधुनिक गणित में वेदों के योगदान की पर्याप्त संभावनाएं

वेद विश्व का सबसे प्राचीन ग्रंथ है, जिससे इतिहासकार भी सहमत हैं। शून्य से लेकर नौ तक के अंकों का प्रयोग वैदिक ऋचाओं में भी है। इसके साथ ही और कई ऐसे तथ्य हैं, जिनकी खोज आवश्यक है।
वेद की ऋचाओं का आधुनिक गणित में क्या योगदान हो सकता है, इन सभी संभावनाओं को लेकर डा. परमेश्वर झा शोधरत हैं। डा. झा कहते हैं कि आधुनिक गणित में वेदों के योगदान की पर्याप्त संभावनाएं हैं।
बिहार के सुपौल निवासी डा. झा का प्रयास यदि सफल हुआ तो दशमलव तथा शून्य ही नहीं अपितु और भी कई गणितीय आंकड़े एवं संक्रियाएं, विश्व को भारत की देन हैं, ऐसा मानने पर मजबूर कर देंगी।
भारत में आर्यभट्ट पर 1970 में पहला शोध प्रबंध 'आर्यभट्ट एंड हिज कंट्रीब्यूशन्स टू मैथमेटिक्स' एवं राज्य में पहला 'हिस्ट्री आफ मैथमेटिक्स' पर शोध प्रबंध प्रस्तुत करने वाले डा. झा के पहले शोध प्रबंध को बिहार मेथेमेटिकल रिसर्च सोसाइटी पटना के सहयोग से 1988 में प्रकाशित किया गया।
ज्ञातव्य हो कि आर्यभट्ट ने अपनी पुस्तक 'आर्यभट्टम' में गणित के बहुत सारे सिद्धांतों का प्रयोग किया है, जिनका प्रयोग वैदिक ऋचाओं में भी है।
वर्ष 1959 में स्थानीय बीएसएस कालेज में विभागाध्यक्ष के रूप में गणित का अध्यापन कार्य शुरू करने वाले श्री झा, 1997 में प्राचार्य के पद से इसी कालेज से सेवानिवृत्त हुए। इस दौरान दो वर्षो तक सहरसा पीजी सेंटर में विभागाध्यक्ष, बीएनएमयू मधेपुरा में विज्ञान संकाय के डीन के पद को भी इन्होंने सुशोभित किया।
एंसिएंट इंडियन मैथमेटिक्स, जैन मैथ, मिथिलाज कंट्रीब्यूशन्स इन दिस फिल्ड जैसे विषयों पर लगभग पांच दर्जन रिसर्च पेपर इन्होंने प्रस्तुत किया। 2005 में बिहार मैथमेटिकल सोसाइटी के रिसर्च प्रोजेक्ट 'लाइव्स एंड वर्क्स आफ मैथमेटिक्स आफ बिहार' को पूरा किया।
डा. झा की अब तक गणित की चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और तीन प्रकाशनाधीन हैं। जिनमें उच्चतर माध्यमिक अंकगणित (1962), आर्यभट्ट एंड हिज कंट्रीब्यूशन्स टू मैथ (1988), भारतीय विज्ञान के महान उन्नायक आर्यभट्ट (1999), लाइव्स एंड वर्क्स आफ मैथेमेटिशियन आफ बिहार (2005) में प्रकाशित हो चुकी है।
डा. झा, कई रिसर्च स्कालर्स को हिस्ट्री आफ मैथमेटिक्स विषय पर मार्गदर्शन भी दे चुके हैं। बिहार रिसर्च सोसाइटी, कुंद ज्ञानपीठ इंदौर, गुरुकुल कांगड़ी विवि हरिद्वार, बीपीपी सहरसा व स्थानीय जिला प्रशासन से पुरस्कृत डा. झा का नाम वर्ल्ड डाइरेक्टरी आफ हिस्ट्रीयन्स आफ मैथमेटिक्स टोरंटो, बायोग्राफी इंटरनेशनल दिल्ली, मैथमेटिकल साइंस: हूज हू दिल्ली आदि में भी शामिल है।
फिलहाल, गणित के अनेक संगठनों से जुड़े श्री झा वेद की ऋचाओं का गणित में योगदान ही नहीं बल्कि अन्य संभावनाओं को भी तलाशने में जुटे हैं। सीमित संसाधनों के बीच जीवन के चौथे चरण में, शोध के प्रति उनका लगाव समर्पण की पराकाष्ठा को ही प्रदर्शित करता है।
सोमवार, जनवरी 11, 2010
भारत का ही लाल होगा अगला बिल गेट्स!
ज्ञातव्य हो कि बिल गेट्स, विश्व की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट कार्पोरेशन के चेयरमैन हैं। वर्ष 1995-2007 के दौरान
उनकी आय विश्व के धनी व्यक्तियों में सर्वाधिक रही है।
कंज्यूमर इलेक्ट्रानिक एसोशिएसन (सीईए) ने लास वेगास में विश्व के सबसे बड़े तकनीकी व्यापार प्रदर्शनी में जारी किए इस राष्ट्रीय सर्वेक्षण में कहा, ‘जब लोगों से पूछा गया कि अगला बिल गेट्स कहां से आएगा तो 40 प्रतिशत अमेरिकियों ने भारत या चीन का अनुमान लगाया।’
सर्वेक्षण में करीब 96 प्रतिशत लोगों का मानना है कि आर्थिक जगत में अमेरिका के विश्व नेता की भूमिका में भावी सफलता के लिए नए विचारों का होना महत्वपूर्ण होगा लेकिन उन्हें बढते वित्तीय घाटे की चिंता थी जिसके कारण उन्हें लगता है कि अगली पीढ़ी को नुकसान उठाना पड़ेगा ।
सर्वेक्षण के अनुसार, 68 प्रतिशत को पूरा विश्वास है कि उनके रोजगार की सफलता के लिए नए बिचार बेहद महत्वपूर्ण होंगे, जबकि 50 प्रतिशत का मानना है कि ये नए विचार अमेरिका में उनकी नौकरी बचाने में भी मददगार होंगे।
विश्व आर्थिक मंच की रिपोर्ट में बताया गया था कि अमेरिका अपनी वैश्विक प्रतिस्पर्धा की क्षमता खो रहा है, वहीं भारत, चीन और ब्राजील इस मामले में आगे आए हैं।
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