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शुक्रवार, नवंबर 16, 2012

शाखा ही संघ की मूल शक्ति (भाग 3)

पवन कुमार अरविंद
 
यह मृत्यु लोक है। यहां आत्मा और कीर्ति को छोड़कर कुछ भी अमर नहीं है। यदि आप अच्छा कार्य करते हैं तो मृत्यु के बाद भी आमजन के अन्तस में विराजमान रहेंगे। मृत्यु लोक का स्वभाव है अंत। इसलिए मनुष्य का जीवन निश्चित है। इसी प्रकार थलचर, नभचर व जलचरों सहित सभी प्राणियों का जीवन भी निश्चित है। लेकिन राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठनों का जीवन निश्चित नहीं होता है। उनका जीवन उनके विचारों और कार्य व्यवहारों पर निर्भर करता है। जिसको आधार मानकर जनता उनके प्रति अपना समर्थन और विश्वास व्यक्त करती रहती है। लेकिन इसके लिए परिवर्तन और समय व समाज के अनुसार स्वयं का समायोजन आवश्यक होता है। ऐसा करते हुए कोई भी संगठन अपना अस्तित्व दीर्घकाल तक बनाए रख सकता है।
 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। कुछ लोगों का अनुमान है कि 2025 तक अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरा करते-करते संघ का अंतिम संस्कार निश्चित है। लेकिन ऐसा अनुमान महज बकवास के सिवाय और कुछ भी नहीं है। इस अनुमान के विपरीत संघ 2025 के बाद भी अपना अस्तित्व बनाए रख सकता है लेकिन इसके लिए उसको अपनी कार्य पद्धति और कार्य व्यवहार पर गहन चिंतन करते हुए समय के अनुसार परिवर्तन और समायोजन के लिए तैयार रहना होगा। कुछ लोग यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि संघ स्वयं समाप्त हो जाएगा लेकिन उसके विविध क्षेत्रों में कार्यरत संगठन प्रभावी रूप से जीवित रहेंगे। लेकिन ऐसा विचार जल के सतह पर उठे बुलबुल के समान है जो पलक झपकते ही फूट जाता है। 

संघ एक वैचारिक संगठन है। इस कारण उसकी एक विचारधारा है। विचार आत्मा के समान है और धारा शरीर के। शरीर का अंत निश्चित है लेकिन (श्रीमद्भग्वद्गीता के अनुसार) आत्मा अजन्मा, अविनाशी और सनातन है। संघ नहीं रहेगा तब भी उसके विचार विद्यामान रहेंगे। हालांकि संघ के रहने और न रहने का कोई सवाल ही नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि यदि किसी प्रभावी संगठन का प्रभाव नगण्य हो जाए तो यह एक प्रकार से निधन के ही समान कहा जाएगा। निधन एक बात है और पतन दूसरी। दोनों में जमीन-आसमान से अधिक का अंतर है। निधन के बाद किसी व्यक्ति या संगठन का न तो उद्भव हो सकता है और न ही पराभव। क्योंकि निधन के कारण सारी संभावनाएं शून्य हो जाती हैं। लेकन पतन की राह पर अग्रसर व्यक्ति अपने अंदर सकारात्मक परिवर्तन लाकर उत्थान या उद्भव की तरफ कदम बढ़ा सकता है।
 
संघ में अभी बहुत श्वांस शेष है। सके बावजूद संघ कमजोर हुआ है। संघ कार्य अब केवल बौद्धिक-भाषण तक ही सीमित हो गया है। वर्तमान संघ कार्य की प्रक्रिया में भोजन-बैठक तो है लेकिन विश्राम नदारद है। पहले कार्य होता था तो विश्राम की आवश्यकता पड़ती थी, लेकिन अब केवल विश्राम ही विश्राम है। इन बातों को तर्कों के तीर चलाकर काटा जा सकता है, लेकिन ऐसा करना वास्तविकता से मुख मोड़ना होगा। संघ में बहुत अच्छे लोग हैं। लेकिन चिंता और चिंतन की बात यह है कि इसकी कार्यपद्धति को आम युवा पसंद क्यों नहीं करते ? इस नापसंदगी के पीछे भी बहुत बड़ा कारण है। आप 87 वर्ष से एक ही लकीर पीटते चले आ रहे हैं। लकीर का फकीर बनने वाले न तो कोई नई लकीर खींच सकते हैं और न देश व समाज को को नई दिशा ही दे सकते हैं। दिशा देने के लिए स्वयं की दशा बदलनी पड़ती है, और स्वयं में बदलाव कई प्रकार के मार्ग खोलता है। संघ का जीवित और प्रभावी रहना देश व समाज हित में जरूरी है।

मंगलवार, नवंबर 06, 2012

शाखा ही संघ की मूल शक्ति (भाग 2)

पवन कुमार अरविंद

किसी व्यक्ति में संगठन के तत्व समाहित हो सकते हैं और संगठन कार्यों में तल्लीन होकर व्यक्ति स्वयं को विलीन कर सकता है, लेकिन व्यक्ति ही संगठन नहीं होता, व्यक्तियों से संगठन बनता है। किसी एक आदमी को ही पूरा संगठन कैसे मानलिया जाए ? यह ठीक उसी प्रकार अनुचित है जैसे यह कहा जाए कि अमुक व्यक्ति के नहीं रहने पर संगठन का अस्तित्व ही शून्य हो जाएगा।

नितिन गडकरी को भाजपा नहीं कहा जा सकता और न ही भाजपा को नितिन गडकरी। भाजपा संगठन को चलाने के लिए एक व्यवस्था के तहत गडकरी को अध्यक्ष पद पर बैठाया गया है। अध्यक्ष का पद स्थायी है और उस पर बैठने वाला अस्थायी। कभी अटल बिहारी वाजपेई, लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे, के. जनाकृष्ण मूर्ति, एम. वेंकैया नायडू, राजनाथ सिंह अध्यक्ष हुए, तो आज गडकरी इस पद पर विराजमान हैं। यह परिवर्तन का क्रम चलता रहेगा।
गडकरी पर भ्रष्टाचार के कथित आरोप लग रहे हैं। इन आरोपों के लिए पूरी भाजपा को उत्तरदायी कैसे कहा जा सकता है ? मानलीजिए आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहनराव मधुकर भागवत ने विशेष रूचि लेते हुए गडकरी को भाजपा का अध्यक्ष बनवा ही दिया तो इस कारण से समूचे संघ पर प्रश्नवाचक कैसे लगाया जा सकता है ? लेकिन इसके बावजूद नेतृत्व की सोच, आचार-विचार और कार्य व्यवहार कहीं न कहीं संगठन के कार्यकर्ताओं के मन-मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं, जिससे पूरा संगठन प्रभावित होता है। एक-एक कार्यकर्ता के आचरण से ही संगठन की छवि निर्मित होती है। इस छवि को संरक्षित रखते हुए उत्तरोत्तर निखारने का प्रयास करना नेतृत्व का काम है। लेकिन इसके लिए नेतृत्व को अनुभवी, समझशील और विवेकशील होना चाहिए। साथ ही उसमें स्वयं को सुधारते हुए संगठन कार्यों को गति देने की क्षमता भी होनी चाहिए।

समाज सेवा और राजनीति में किसान जैसा धैर्य चाहिए, तो लोहा गर्म रहते उस पर चोट करने का स्वभाव भी जरूरी है। बंदर स्वभाव का किसान अपने ही बोए आम के फल का स्वाद कभी नहीं चख सकता। सार्वजनिक जीवन में कभी-कभी ऐसी स्थितियां भी आती हैं जब केवल पद से चिपके रहने भर से ही व्यक्ति की महत्ता नहीं बढ़ती बल्कि पद छोड़ने के बाद भी व्यक्ति की महत्ता बढ़ जाया करती है। यदि गडकरी अपने ऊपर लग रहे कथित आरोपों के तत्काल बाद भाजपा अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिए होते तो सार्वजनिक जीवन में वह और बड़ा नेता बनकर उभरते। ऐसी स्थिति में उनके समक्ष पार्टी के द्वितीय पंक्ति के सारे नेतागण कहीं नहीं ठहरते। लेकिन उन्होंने अपनी व्यवसायी बुद्धि लगाकर पद का मोह किया और स्वयं को छोटा बनाए रखा। हालांकि गडकरी को पद छोड़ने के लिए नैतिकता की प्रेरणा लेने के लिए बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं थी। संघ और भाजपा में अगणित ऐसे लोग हैं जो नैतिकता के धुरंधरकहे जा सकते हैं। पार्टी के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी ने जैन हवाला मामले में अपना नाम आने के तत्काल बाद संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था, और दोषमुक्त होने तक चुनाव न लड़ने की घोषणा की थी। खैर, गडकरी यदि अब इस्तीफा देते भी हैं तो उसका लाभ न तो संगठन को मिलेगा और न ही उनको। बीएस येदियुरप्पा के मसले पर कानून और नैतिकता की चर्चा करके उनका बचाव करने वाले गडकरी खुद नैतिकता के मसले पर पिछड़ गये हैं। समय की गाड़ी छूट चुकी है।

गडकरी ने एक और बड़ी गलती दिसंबर 2009 में भाजपा अध्यक्ष पद संभालने के तत्काल बाद की थी। अध्यक्ष पद संभालते ही वह स्वयं की बजाए दूसरों को ही ठीक करने के काम में जुट गए। स्पष्ट है कि जब आप ऐसा कहने लगते हैं कि मैं सबको ठीक कर दूंगा, तो आपके इस बयान पर अन्य लोग क्या सोचेंगे। परिणामत: वे लोग दबी जुबान में आपके विरोधी हो जाएंगे। पार्टी संगठन को ठीक करने का कार्य स्वयं में परिवर्तन लाते हुए मौन रहकर भी किया जा सकता है। लेकिन गडकरी यहीं विफल हो गये। वह अपने को ठीक करने की बजाए दूसरों को ही ठीक करने के काम में जुट गये। व्यक्ति के इस प्रकार के आचरण को सद्गुण विकृति कह सकते हैं, साथ ही ईमानदारी का अहंकार भी। शायद डॉ. भागवत चयन में यहीं चूक गये। चूकें भी क्यों न, जब कोई निर्णय आमसहमति और आपसी विश्वास को बनाए रखते हुए होता हो तो वह दूरगामी प्रभाव छोड़ता है, लेकिन दिन-प्रतिदिन कमजोर हो रहे संघ के नये नेतृत्व ने भाजपा पर अपना प्रभाव जमाने के मद्देनजर यह निर्णय किया, इसलिए चूक होना अवश्यंभावी ही था। यह चूक इसलिए भी हुई क्योंकि संघ स्वयं को न ठीक करते हुए भाजपा को ही ठीक करने के काम में जुट गया।

संघ का मूल कार्य व्यक्ति निर्माण है। इसके लिए दैनंदिनी लगने वाली शाखाओं को माध्यम माना गया है। किसी क्षेत्र में लगने वाली शाखाओं की संख्या जितनी बढ़ती है तो कहा जाता है कि उस क्षेत्र में संघ मजबूत हो रहा है। लेकिन आज किसी क्षेत्र विशेष में ही नहीं बल्कि देश भर में शाखाएं कहीं नहीं लग रही हैं और यदि लग भी रही हैं तो उसका प्रभाव नगण्य है। आज शाखाएं युवाओं को आकर्षित नहीं करतीं, उलटे अरूचि ही उत्पन्न करती हैं। इस कारण संघ समाज को प्रभावित नहीं कर रहा बल्कि स्वयं प्रभावित होता जा रहा है। देश भर में शाखा कार्य के लिए संघ के करीब 2355 प्रचारक हैं। इन प्रचारकों के पूर्णकालिक प्रयास के बाद भी शाखाओं में संख्या नहीं होती। संघ को अपनी शाखाएं बढ़ाने और उसको प्रभावी बनाने की ज्यादा चिंता करनी चाहिए। तभी संघ मजबूत होगा और मजबूत संघ के आगे भाजपा सदैव नतमस्तक रहेगी, उसको नियंत्रण में रखने के लिए कोई अन्य प्रयास की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। लेकिन यह न करके शार्ट कट का रास्ता अपनाया जा रहा है। (जारी...)  

शुक्रवार, नवंबर 02, 2012

शाखा ही संघ की मूल शक्ति (भाग एक)

पवन कुमार अरविंद

भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष नितिन गडकरी वर्ष 2009 में महाराष्ट्र की राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर अचानक आ धमके। गडकरी के इस अस्वाभाविक और अत्यंत तीव्र विकास के पीछे राजनीतिक हलकों में आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहनराव मधुकर भागवत का आशीर्वाद बताया जाता है। ये बातें गडकरी की कंपनियों पर लग रहे भ्रष्टाचार के कथित मामलों से साफ भी हो गया है, क्योंकि भ्रष्टाचार के इन कथित मामलों के कारण गडकरी से ज्यादा चिंतित डॉ. भागवत और आरएसएस खेमा दिख रहा है। डॉ. भागवत की भाजपा में विशेष रूचि के कारण पूरे संघ परिवार की प्रतिष्ठा दांव पर है। गडकरी की कंपनियों में घोटाला हुआ है या नहीं, यह बाद की बात है और जांच की बात है। लेकिन भ्रष्टाचार के लपेटे में गडकरी के आने से पूरा संघ निरुत्तर है। क्योंकि गडकरी परमपूज्यकी परम पसंदहैं।

संघ के सरसंघचालक का पद उससे जुड़े सभी संगठनों के लिए मार्गदर्शक का होता है। संघ से जुड़े विविध संगठनों की संख्या 60 से भी ज्यादा है। ये संगठन समाज के विभिन्न क्षेत्रों व वर्गों का संगठन करते हैं। जैसे- छात्रों के बीच कार्य करने वाली अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, वकीलों का संगठन करने वाली अधिवक्ता परिषद, किसानों के क्षेत्र में सक्रिय भारतीय किसान संघ, मजदूरों के क्षेत्र में सक्रिय भारतीय मजदूर संघ, वनवासी व गिरिवासी क्षेत्रों में सक्रिय वनवासी कल्याण आश्रम, हिंदू जागरण मंच, भारत विकास परिषद, विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय सेविका समिति और राजनीतिक क्षेत्र में कार्य करने वाली भारतीय जनता पार्टी सहित आदि संगठन हैं। इन संगठनों के कार्यकर्ताओं के लिए सरसंघचालक का पद पूजनीय माना जाता है। यहां तक कि सरसंघचालक का आदेश सभी संगठनों के लिए अंतिम है।

डॉ. भागवत संघ के छठें सरसंघचालक हैं। इसके पहले संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य गुरूजी, बाला साहब देवरस, प्रो. राजेंद्र सिंह उपाख्य रज्जूभैया, कुप्पहल्ली सीतारामैया सुदर्शन जैसे महान व्यक्तित्व इस पद को सुशोभित कर चुके हैं। प्रथम सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार ने 1925 में संघ की स्थापना की थी और इस पद पर वह 1939 तक रहे। उसके बाद गुरूजी वर्ष 1939 से 1973 तक इस पद पर रहे। गुरूजी के कार्यकाल में 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापनी हुई थी। गुरूजी प्रकाण्ड विद्वान थे, साथ ही सिद्ध पुरुष भी माने जाते थे। इस कारण वे राजनीति की काली कोठरी की कालिमा को जानते थे। वे राजनीतिक दल बनाने के पक्ष में नहीं थे लेकिन सहयोगियों के आग्रह पर आधेमन से भारतीय जनसंघ की स्थापना के लिए तैयार हुए और संघ के कुछ पूर्णकालिक कर्यकर्ताओं को जनसंघ के कार्य के लिए भेजा। इसके बावजूद गुरूजी संघ कार्यकर्ताओं को अपने त्यागमयी व्यक्तित्व से राजनीति से आवश्यक दूरी बनाकर चलने के लिए प्रेरित करते रहे। हालांकि वे राजनीति के विरोधी नहीं थे लेकिन संघ के सांगठनिक कार्यों में राजनीति के घालमेल के सर्वथा खिलाफ थे। 
तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस भी गुरूजी के ही रास्ते पर चले। उनका जीवन गुरूजी की ही तरह निर्विवाद रहा। चौथे सरसंघचालक के रूप में रज्जूभैया भाजपा के काफी निकट आये लेकिन उन्होंने भी अपनी मर्यादा और गरिमा को बनाए रखा। इसके बाद प्रकांड विद्वान सुदर्शन वर्ष 2000 में संघ के पांचवे सरसंघचालक बने। उन्हीं के साथ डॉ. भागवत सरकार्यवाह के पद पर चुने गये थे। हालांकि बतौर सरसंघचालक सुदर्शन का कार्यकाल बहुत उतार-चढ़ाव भरा रहा। उन्होंने भाजपा के राजनीतिक मामलों में काफी रूचि भी ली, इसके बाजवजूद उन्होंने अपने पद की गरिमा और महिमा को बरकरार रखा। लेकिन मार्च 2009 में सरसंघचालक बने डॉ. भागवत ने अपनी स्थापित छवि के विपरीत भाजपा के राजनीतिक मामलों में अप्रत्यक्ष रूप से जोरदार रूचि लेनी शुरू कर दी।

आज गडकरी पर आरोप लग रहे हैं तो इसी कारण संघ चिंतित नजर आ रहा है। हालांकि सोनिया गांधी के दामाद राबर्ड वाड्रा पर आरोप लगने के बाद हरियाणा की कांग्रेस सरकार ने उनको पाक साफ करार दिया है। केंद्र सरकार भी वाड्रा के खिलाफ किसी भी जांच को तैयार नहीं है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि अरविंद केजरीवाल की प्रेस कान्फ्रेंस के बाद कुछ मीडिया रिपोर्टों में गडकरी के खिलाफ कथित मामलों की चर्चा को सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम आदेश सरीखा मानलिया गया है। समाज के कुछ लोगों, राजनीतिक दलों और मीडिया का ऐसा रवैया सरासर अनुचित है। यहां तक कि गडकरी अपने खिलाफ लगे आरोपों की किसी भी जांच के लिए तैयार हैं। लेकिन वाड्रा जांच से घबरा रहे हैं और बिना जांच के ही अपने को पाक साफ साबित करने में जुटे हुए हैं। वाड्रा और गडकरी के खिलाफ लगे कथित आरोपों में कितना दम है और कितनी सच्चाई, यह जांच का विषय है। लेकिन बिना जांच के ही दोनों को अपराधी मान लेना अनुचित ही कहा जाएगा। संघ भी यही बात कह रहा है। लेकिन संघ यह बात डॉ. भागवत से गडकरी की निकटता के कारण कह रहा है। यह अत्यंत निकटता ही संघ की छवि धूमिल कर रही है। साथ ही संघ के निष्ठावान व त्यागमयी जीवन जीने वाले कार्यकर्ताओं को कई बातें सोचने पर भी मजबूर कर रही हैं। कार्यकर्ताओं की यह सोच ही संगठन के उद्भव या पराभव का मार्ग प्रशस्त करती है। (जारी….)

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