मंगलवार, मई 11, 2010

कसाब और अफजल को शीघ्र फांसी देशहित में


26/11 मुंबई हमलों के संदर्भ में कानूनी प्रक्रिया ने यह प्रमाणित कर दिया है कि पाकिस्तान न केवल जिहादी आतंकवाद की फौज तैयार कर रहा है बल्कि उसे भारत के विरुद्ध खुले रूप में इस्तेमाल भी कर रहा है।

आतंकवाद के प्रति यूपीए सरकार की नरम नीतियों के कारण ही पाकिस्तान समर्थित आतंकियों के हौसले में वृद्धि हो रही है।

संसद पर हमला कर भारत की संप्रभुता को खुली चुनौती देने वाले अफजल गुरु को शीर्ष अदालत से फांसी की सजा पर अंतिम मुहर लगे करीब चार वर्ष हो गए लेकिन यूपीए सरकार आदेश पर कुंडली मारे बैठी है और वोट का नफा-नुकसान भांप रही है।

अफजल के संदर्भ में सरकार के रवैये से स्पष्ट होता है कि वह आतंकियों के प्रति नरम नीति अपना रही है। यदि ऐसा नहीं होता तो अफजल को कभी फांसी हो गई होती।

इन दुर्दांत आतंकियों को फांसी पर शीघ्र लटका देना भारत और भारतीय जनता के हित में है। नहीं तो इन सजायाफ्ता आतंकियों को छुड़ाने के लिए पाकिस्तान में बैठे इनके आका कांधार विमान अपहरण जैसा कोई और कांड कर सकते हैं। वैसी स्थिति में भारत सरकार हाथ मलती रह जाएगी। और उसके पास पश्चाताप के शिवाय कोई दूसरा चारा नहीं रह जाएगा।

26/11 मामले में कसाब के फैसले से भारत को एक महत्वपूर्ण अवसर हाथ लगा है। इसलिए इस अवसर को व्यर्थ नहीं गवांना चाहिए।

यही समय है कि संसद भवन पर हमले के मुख्य अभियुक्त अफजल गुरू और मुंबई हमले के अभियुक्त अजमल आमिर ईमान ‘कसाब’ को अविलंब फांसी देकर विश्वमंच पर पाकिस्तान की करतूतों को बेनकाब किया जाए।

आखिरकार मुंबई आतंकी हमले में मारे गए निर्दोष लोगों तथा सुरक्षा बलों के जवानों का बलिदान रंग लाया और न्यायिक प्रक्रिया पूरी करके विशेष अदालत ने कसाब को फांसी की सजा सुना दी।

देश में अब तक हुई अनेक जघन्य आतंकी घटनाओं में यह पहला मामला है, जिसमें इतनी त्वरित गति से फैसला आया है।

केंद्र सरकार को अब समझ लेना चाहिए कि अमेरिका से गुहार लगाकर वह पाकिस्तान पर अंकुश नहीं लगा सकती। क्योंकि अमेरिका तो दक्षिण एशिया में अपने हित-संपादन के लिए पाकिस्तान को मोहरा बनाए हुए है।

इसीलिए भारत में अमेरिकी राजदूत टिमोथी ने इस फैसले पर टिप्पणी करते हुए यह भी जोड़ दिया कि पाकिस्तान ने आतंकवाद के मुद्दे पर अमेरिका का सहयोग करने का संकल्प लिया है।

सरकार को यह ध्यान में रखना चाहिए कि कसाब को सबूतों के आधार पर सजा मिली है, उसकी स्वीकारोक्ति के आधार पर नहीं, पाकिस्तान के खिलाफ इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है?

इसलिए सरकार को चाहिए कि वह इस अवसर का लाभ उठाकर पूरी दृढ़ता के साथ पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दे। इसमें थोड़ी सी भी चूक भारी पड़ सकती है।

सोमवार, मई 10, 2010

हाय रे शिबू सोरेन ----!


सत्ता के अपने ही चाल में स्वयं चित होने के बाद शिबू सोरेने को हर प्रकार से माफी मांगनी पड़ी। उन्होंने भाजपा नेतृत्व से लिखित और मौखिक के साथ, इस दुनिया में माफी मांगने के और भी जितने तरीके होते हैं, उन-उन तरीकों का बखूबी इस्तेमाल किया, लेकिने बात नहीं बनी। यहां तक कि उनका बेटा हेमंत सोरेने भी खुद चाहता है कि वह इस्तीफा दे दें और मुख्यमंत्री पद के लिए उसका रास्ता खाली कर दें।

अपने माफीनामे को और बल प्रदान करने के लिए उनको यहां तक कहना पड़ा कि लोकसभा में मतदान के समय उनकी तबियत बिगड़ गई थी, इस कारण वह समझ नहीं पाए कि उनका वोट कहां जा रहा है।

दरअसल, लोकसभा में भाजपा द्वारा लाए गए कटौती प्रस्ताव के दौरान शिबू सोरेन ने सरकार के पक्ष में वोट किया था। गठबंधन धर्म के कारण नियमतः उनको भाजपा के पक्ष में वोट करना चाहिए था।

भाजपा ने भी आनन-फानन में संसदीय बोर्ड की बैठक कर सोरेन सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी। जिसके बाद उनकी ‘कूटनीतिक तबियत’ और बिगड़ गई।

दरअसल, बात यह नहीं है कि सोरेन ने गठबंधन धर्म का पालन किया या नहीं किया। बात यह भी नहीं है कि उन्होंने भाजपा नेतृत्व को मेन मौके पर धोखा दे दिया। भई उनका वोट है, वो किसी को भी दें, किसी और को क्या ऐतराज हो सकता है।

बल्कि, मुख्य मुद्दा तो यह है कि उन्होंने अपने माफीनामे में जो जिक्र किया था, वह हास्यास्पद ही है। उन्होंने कहा था, ‘उनकी तबितय बिगड़ गई थी और वह समझ नहीं पाए कि उनका वोट कहां जा रहा है।’

उनकी ऐसी बातें एक प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में और वह भी लिखित रूप में, उचित नहीं कहा जा सकता। जब उनकी एक छोटी स्थिति में ही तबियत बिगड़ जा रही है तो प्रदेश के बड़े-बड़े निर्णयों के समय क्या हाल होता होगा, यह सोचने वाली बात है।

हालांकि, एक निरक्षर आदमी भी यह समझने की योग्यता रखता है कि सोरेन की तबियत का शिगूफा महज एक झूठ था, इसके सिवाय और कुछ भी नहीं था। क्योंकि वह चाल तो कुछ और चले थे लेकिन कांग्रेस के धोखा देने के बाद स्वयं ही फंस गए। जिसके बाद पश्चाताप ही पश्चाताप है।

रविवार, मई 09, 2010

कानून को धता बताकर मस्जिद में जारी है निर्माण


दक्षिण दिल्ली के अत्यंत पॉश इलाके कालकाजी थाना अन्तर्गत गत 30 वर्षों से कानून को धता बताकर मस्जिद का अवैध निर्माण हो रहा है। न्यायालय के स्थगन आदेश के बावजूद पुलिस निर्माण कार्य रुकवाने में नाकाम रही है। इस संदर्भ में पुलिस का रवैया पक्षपातपूर्ण रहा है। इस पूरे मामले की सत्यता जानने के लिए पवन कुमार अरविंद ने मौके पर जाकर मौजूदा स्थिति का अवलोकन किया और इस निर्माण के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे अरावली रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन के पदाधिकारियों से भी बातचीत की। प्रस्तुत है एक रिपोर्ट-

दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) नें अलकनंदा इलाके में अरावली अपार्टमेंट के निर्माण के लिए 30 अगस्त 1979 को एक कार्ययोजना तैयार की। इस कार्ययोजना में डीडीए द्वारा अधिग्रहीत भूमि के एक छोटे से हिस्से पर चर्च का नाम तो था लेकिन मस्जिद का कहीं भी जिक्र नहीं था।

1980 में कालकाजी थानान्तर्गत अलकनंदा मुहल्ले में अरावली अपार्टमेंट का निर्माण कार्य शुरू हुआ। निर्माण कार्य में लगे कुछ मुस्लिम मजदूरों ने नमाज अता करने के लिए अस्थाई रूप से अपार्टमेंट के कार पार्किंग क्षेत्र में बालू और सीमेंट से एक छोटा चबूतरा बना दिया। और उस पर हरी चादर ओढ़ा दी। इस स्थान पर मुस्लिम मजदूरों ने नियमित रूप से नमाज अता करना शुरू कर दिया। देखते ही देखते मुसलमानों का एक वर्ग उस भू-भाग पर मस्जिद होने का दावा करने लगा। और बाद में मस्जिद निर्माण का कार्य भी शुरू कर दिया। हालांकि, इस निर्माण के लिए डीडीए, डीएमसी (दिल्ली महानगर पालिका) आदि किसी वैधानिक संस्था से स्वीकृति भी नहीं ली गयी।

अपार्टमेंट के अंतर्गत कारपार्किंग के लिए करीब 800 वर्ग गज जमीन निर्धारित था। इसी भू-भाग में से करीब 200 वर्ग गज भूमि पर अवैध रूप से मस्जिद खड़ी कर दी गयी। राजस्व रिकार्ड में मस्जिद का कहीं भी नाम नहीं है।

हालांकि, इस अवैध निर्माण के बावजूद भी डीडीए ने रहमदिली दिखाते हुए अवैध मस्जिद को नजदीक के धोबी घाट पर स्थानांतरित करने के लिए स्थानीय मुस्लिम नेताओं को कब्जाए गए जमीन का करीब ढाई गुना यानि 500 वर्ग गज जमीन देने का प्रस्ताव रखा था लेकिन मुसलमानों की जिद के कारण डीडीए का यह प्रस्ताव धरा का धरा रह गया। जबकि, ईसाईयों ने चर्च की वैध भूमि के बदले अपार्टमेंट के नजदीक ही दूसरी भूमि लेना स्वीकार कर लिया।

अवैध निर्माण मामले को राज्यसभा सदस्य श्री सत्यप्रकाश मालवीय ने 22 मार्च 1986 को सदन में उठाया। जिसके जवाब में केंद्रीय आवास एवं शहरी विकास मंत्री श्री अब्दुल गफूर ने अपने लिखित बयान में यह स्वीकार किया कि मस्जिद का निर्माण अवैध है। और इसको कहीं अन्यत्र स्थानांतरित करने का प्रयास किया जा रहा है।

इस मामले की लड़ाई अलकनंदा स्थित अरावली रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन लड़ रहा है। एसोसिएशन के उपाध्यक्ष श्री रामगोपाल गुप्ता कहते हैं कि 1983 में मस्जिद की चहारदीवारी का कार्य प्रारंभ हुआ। इस चहारदीवारी को पहले से भी अधिक भू-भाग पर अतिक्रमण कर बनाया गया। श्री गुप्ता कहते हैं कि पहले मस्जिद के पिछले हिस्से में 6 फीट का रास्ता था लेकिन उसको भी कब्जा कर लिया गया है। इस रास्ते की चौड़ाई कहीं तीन तो कहीं 4 फीट बची है।

जुलाई 2006 में जब चहारदीवारी के अंदर आरसीसी से निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ तो एसोसिएशन ने 5 जुलाई 2006 को तीसहजारी अदालत में स्थगनादेश के लिए याचिका दायर की। 19 जुलाई 2006 को अदालत ने मौके पर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया। उसके बाद भी निर्माण कार्य जारी रहा। एसोसिएशन ने इस निर्माण के विरूद्ध अगस्त 2006 में न्यायालय की अवमानना याचिका दायर की। हालांकि, इस संदर्भ में अभी कोई निर्णय नहीं आया है।

इसके पूर्व एसोसिएशन ने मस्जिद को स्थानांतरित करने के लिए उच्च न्यायालय में गुहार लगायी। इस पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने 19 जनवरी, 2009 को कहा, “मामले में बहुत पेंचीदगी है। एक पक्ष का कहना है कि यह अनाधिकृत है और दूसरा पक्ष कहता है कि यह दिल्ली बोर्ड की प्रॉपर्टी है। इसका फैसला निचली अदालत में हो सकता है। इस संदर्भ में जो पक्ष चाहे अपना पक्ष दायर करे।”

इस संदर्भ में एसोसिएशन ने पुराने केस के साथ ही तीसहजारी आदालत से मामला स्थानांतरित करा कर पटियाला अदालत में अप्रैल 2009 में याचिका दायर की। जहां मामले की संयुक्त सुनवाई हो रही है।
एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री पी.आर. चौधरी कहते हैं कि 19 जनवरी 2009 के उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद मस्जिद में मदरसा शुरु कर दिया गया है। मदरसे में करीब 40 विद्यार्थी हैं। इनकी उम्र 5 से लेकर 17 वर्ष के बीच है। इस छात्रों का निवास मस्जिद परिसर में ही है।

19 जुलाई 2009 के उच्च न्यायालय के निर्णय के मुताबिक, नमाजी सिर्फ मस्जिद में ही नमाज अता कर सकते हैं। उन्हें मस्जिद की सीमा के बाहर कार पार्किंग क्षेत्र के अन्य खाली जगहों के इस्तेमाल की इजाजत नहीं है।

लेकिन पुलिस की निष्क्रियता के कारण उच्च न्यायालय के आदेश का पालन नहीं हो सका। इस कारण रेजीडेंट एसोसिएशन ने उच्च न्यायालय में दिल्ली वक्फ बोर्ड तथा स्थानीय मस्जिद के खिलाफ न्यायालय की अवमामना का मामला दर्ज कराया। जिसके बाद ही पुलिस ने कार्रवाई शुरू की। और नमाजियों को मस्जिद के अंदर ही नमाज अता करने के लिए विवश किया।
हालांकि, इस मामले में पुलिस ने अपना जवाब दाखिल कर न्यायालय को यह आश्वासन दिया कि वह भविष्य में अदालत केआदेश का पूरी तरह पालन करेगी। पुलिस के इस आश्वासन के बाद न्यायालय ने अवमानना मामला बंद कर दिया।

इसके तुरंत बाद स्थानीय मस्जिद कमेटी ने 23 अप्रैल 2010 को पुनः अवैध निर्माण कार्य मस्जिद परिसर में प्रारंभ कर दिया। इस निर्माण कार्य के संदर्भ में एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने मस्जिद कमेटी को इस आशय की सूचना भी दी कि मस्जिद में किसी भी निर्माण कार्य के लिए न्यायालय का स्थगनादेश है। इसलिए आप लोग निर्माण कार्य बंद कर दें। फिर भी निर्माण कार्य जारी रहा।

एसोसिशन ने निर्माण कार्य की सूचना कालकाजी पुलिस स्टेशन में दी। लेकिन पुलिस अगले 55 घंटों तक निष्क्रिय बनी रही। पुलिस की निष्क्रियता के खिलाफ अरावली निवासियों ने मस्जिद के सामने प्रदर्शन किया जिसके बाद पुलिस सक्रिय हुई। और निर्माण कार्य 25 अप्रैल को सायं 5 बजे रुकवा दिया। इसके बाद से ही मस्जिद परिसर में पुलिस तैनात है और यथास्थिति बनी हुई है।
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