बुधवार, अगस्त 04, 2010

इण्डोनेशिया में हिन्दू प्रभाव

लालकृष्ण आडवाणी

कुछ वर्ष पूर्व मेरे एक मित्र ने दुनिया के सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या वाले देश इण्डोनेशिया से लौटने के बाद कच्छ के आदीपुर (गुजरात) में मुझे एक 20 हजार रुपया वहां की करेंसी का नोट दिखाया जिस पर भगवान गणेश मुद्रित थे। मैं आश्चर्यचकित हुआ और प्रभावित भी।

जब पिछले महीने इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता से सिंधी समुदाय के कुछ महानुभावों के समूह ने 9,10 तथा 11 जुलाई 2010 को जकार्ता में होने वाले विश्व सिंधी सम्मेलन में आने का न्यौता दिया तो मैंने इसे तुरन्त स्वीकारा। इसका कारण यह था कि मैं इस देश पर भारतीय सभ्यता और विशेष रूप से रामायण और महाभारत जैसे महाग्रंथों के प्रभाव के बारे में अक्सर सुनता रहता था। करेंसी नोट पर गणेशजी का छपा चित्र इसका एक उदाहरण है।

मेरी पत्नी कमला, सुपुत्री प्रतिभा, दशकों से मेरे सहयोगी दीपक चोपड़ा और उनकी पत्नी वीना के साथ मैं 8 जुलाई को यहां से रवाना हुआ तथा 13 जुलाई को इस यात्रा की अविस्मरणीय स्मृतियां लेकर लौटा।

इण्डोनेशिया में 13,677 द्वीप हैं जिनमें से 6000 से ज्यादा पर आबादी है। वहां की कुल जनसंख्या 20.28 करोड़ में से 88 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम और 10 प्रतिशत ईसाई हैं। यहां की 2 प्रतिशत हिन्दू आबादी मुख्य रुप से बाली द्वीप में रहती है।

बाली द्वीप के लिए हाल ही में स्वीकृत किया गया नया ब्राण्ड ‘लोगो’ (प्रतीक चिन्ह) देश की हिन्दू परम्परा का प्रकटीकरण है। इण्डोनेशिया के पर्यटन मंत्रालय का प्रकाशन इस प्रतीक चिन्ह को इस प्रकार बताता है, त्रिकोण (प्रतीक चिन्ह की आकृति) स्थायित्व और संतुलन का प्रतीक है। यह तीन सीधी रेखाओं से बना है जिनमें दोनों सिरे मिलते हैं, जो सास्वत, अग्नि (ब्रह्मा- सृष्टि निर्माता), लिंग या लिंग प्रतिमान के प्रतीक हैं।

त्रिकोण् ब्रहमाण्ड के तीन भगवानों - (त्रिमूर्ति- ब्रह्मा, विष्णु और महेश), प्रकृति के तीन चरणों (भूर, भुव और स्वाहा लोक) और जीवन के तीन चरणों (उत्पत्ति, जीवन और मृत्यु) को भी अभिव्यक्त करते हैं। प्रतीक चिन्ह के नीचे लिखा बोधवाक्य शान्ति, शान्ति, शान्ति भुवना अलित दन अगुंग (स्वयं और विश्व) पर शान्ति, जोकि एक पावन और पवित्र सिरहन देती है, जिससे गहन दिव्य ज्योति जागृत होती है जो सभी जीवित प्राणियों में संतुलन और शान्ति कायम करती है।

यहां 20 हजार रुपये के करेंसी नोट का नमूना दिया गया है। जैसा मैंने ऊपर वर्णन किया कि कुछ वर्ष पूर्व मैंने इसे देखा था और तभी तय किया था कि यदि मुझे इस देश की यात्रा करने का अवसर मिला तो मै स्वयं जा कर इसे प्राप्त करुंगा तथा औरों को दिखाऊंगा।

जकार्ता जाने वाले यात्रियों के लिए इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता के उत्तर-पश्चिम तट पर स्थित शहर के बीचोंबीच भव्य निर्मित अनेक घोड़ों से खिंचने वाले रथ पर श्री कृष्ण-अर्जुन की प्रतिमा सर्वाधिक आकर्षित करने वाली है।

इण्डोनेशिया में स्थानों, व्यक्तियों के नाम और संस्थानों का नामकरण संस्कृत प्रभाव की स्पष्ट छाप छोड़ता है। निश्चित रूप से यह जानकर कि इण्डोनेशिया में सैन्य गुप्तचर का अधिकारिक शुभांकर हनुमान हैं, काफी प्रसन्नता हुई। इसके पीछे के औचित्य को वहां के एक स्थानीय व्यक्ति ने यूं बताया कि हनुमान ने ही रावण द्वारा अपहृत सीता को जिन्हें अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा गया था, का पता लगाने में सफलता पाई थी।

हमारे परिवार ने चार दिन इण्डोनेशिया, दो दिन जकार्ता और दो दिन बाली में बिताए। बाली इस देश के सर्वाधिक बड़े द्वीपों में से एक है। यहां के उद्योगों में सोने और चांदी के काम, लकड़ी का काम, बुनाई, नारियल, नमक और कॉफी शामिल हैं। लेकिन जैसे ही आप इस क्षेत्र में पहुंचते हैं तो आप साफ तौर पर पाएंगे कि यह पर्यटकों से भरा हुआ है। लगभग तीन मिलियन आबादी वाले बाली में प्रतिवर्ष एक मिलियन पर्यटक आते हैं।

इस द्वीप की राजधानी देनपासर है। हमारे ठहरने का स्थान मनोरम दृश्य वाला फोर सीजंस रिसॉर्ट था, जो समुद्र के किनारे पर है और हवाई अड्डे से ज्यादा दूर नहीं है। रिसॉर्ट जाते समय रास्ते में मैंने जकार्ता में कृष्ण-अर्जुन जैसी विशाल पत्थर पर बनी आकृति देखी हालांकि यह जकार्ता में देखी गई आकृति से अलग किस्म की थी।

मैंने अपनी कार के ड्राइवर से पूछा: यह किसकी प्रतिमा है? और क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब उसने जवाब दिया तो मैं आश्चर्यचकित रह गया। उसने बताया- ‘यह महाभारत के घटोत्कच की प्रतिमा है।’ उसने शहर में इस आकृति में घटोत्कच के पिता भीम को भी दिखाया गया है जो दानव से भीषण युद्ध कर रहे हैं।

भारत में इन दोनों महाकाव्यों रामायण और महाभारत में से सामान्य नागरिक रामायण के अधिकांश चरित्रों को पहचानते हैं। लेकिन महाभारत के चरित्र कम जाने जाते हैं। वस्तुत:, भारत में भी बहुत कम होंगे जिन्हें पता होगा कि घटोत्कच कौन है और वहां हमारी कार का ड्राइवर भीम से उसके रिश्ते के बारे में भी पूरी तरह से जानता था।

जकार्ता में सिंधी सम्मेलन और बाली में हमें रामायण के दृश्यों के मंचन की झलक देखने को मिली जो भारत में प्रचलित परम्परागत रुप से थोड़ा भिन्न थी। कलाकारों का प्रदर्शन तथा प्रस्तुति और जिन स्थानों पर यह प्रदर्शन देखने को मिले वहां का सामान्य वातावरण भी पर्याप्त श्रध्दा और भक्ति से परिपूर्ण था। मैं यह अवश्य कहूंगा कि इण्डोनेशिया के लोग हमसे ज्यादा अच्छे ढंग से रामायण और महाभारत को जानते हैं और संजोए हुए है।
(लेखक : भारत सरकार के पूर्व उप-प्रधानमंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं)

रविवार, अगस्त 01, 2010

'राम को नकारना कठिन ही नहीं असंभव भी’


राजधानी के दरियागंज स्थित प्रकाशन संस्थान द्वारा हाल ही में प्रकाशित एक पुस्तक में भगवान राम के अस्तित्व को नकारने की प्रवृत्ति का कड़ा प्रतिवाद किया गया है और दलील दी गई है कि इसका सीधा अर्थ तो यह हुआ कि बाकायदा आज भी मौजूद अयोध्या तथा सरयू समेत श्रीराम से जुडे़ तमाम स्थान एवं प्रतीक भी काल्पनिक हैं।

प्रसिद्ध लेखक डॉ. भगवती शरण मिश्र ने अपनी पुस्तक ‘मैं राम बोल रहा हूँ’ में लिखा है- ‘राम को नकारने वालों को सरयू, अयोध्या, चित्रकूट, कनक भवन, लक्ष्मण किला, हनुमान गढ़ी, रामेश्वरम, जनकपुर आदि को भी नकारना होगा।’

इस पुस्तक में राम को उत्तम पुरुष एक वचन की भूमिका में पाठकों को प्रत्यक्ष रूप से संबोधित करते हुये दर्शाया गया है। लेखक वर्तमान परिस्थितियों पर भगवान राम के ही मुंह से बेबाक टिप्पणियां करता है और कहता है कि राम को नकारना तो बहुत आसान है पर उनके प्रतीकों को मिटाना दुष्कर ही नहीं असम्भव भी है।

डॉ. मिश्र ने भगवान राम के माध्यम से जो दलीलें दी हैं, वे उन्हीं के शब्दों में इस प्रकार हैं- 'राम को नकारोगे तो अयोध्या को भी नकारना पडे़गा। इस पूरे नगर और इसमें गली-गली में स्थित मंदिरों, मठों के अस्तित्व को भी झुठलाना होगा। इसकी विभिन्न छोटी, बडी इमारतों को भी क्योंकि तब ये सभी एक कल्पना प्रसूत नगर के अंश हो जाएंगे। अयोध्या को नकारो तो कनक भवन के सदृश करोड़ो रुपयों से निर्मित विशाल मंदिर को भी नकारना होगा क्योंकि उसमें राम-सीता अवस्थित हैं और सरयूतीर स्थित वह भव्य लक्ष्मण किला इसे तो लक्ष्मण द्वारा ही निर्मित किया गया था। उसके अस्तित्व को भी नकारना होगा। एक मिथ्या को मिटाना होगा।'

डॉ. मिश्र कहते हैं- 'और देखा है वह हनुमान गढ़ी, किलानुमा यह भव्य उच्च प्रासाद जिसमें हनुमान और उनकी माता अंजना की मूर्तियां स्थापित हैं। लक्ष्मण और सीता के भी विग्रह हैं इसमें। अयोध्या की पहचान ही है यह। दूर से ही इसका शिखर दृष्टिगोचर होता है। तो उसे भी नकारोगे या एक मिथ्या को ढोये चलेगी यह सरकार। जब ये सब नहीं रहेंगे तो अयोध्या एक श्मशान ही तो बन जाएगा। यहां के श्रद्धालु, साधक, संत और साधु कहीं और पलायन को बाध्य होंगे। पर इस पर भी ध्यान दिया है कि यह तीर्थ नगरी एक पर्यटन स्थल भी है। हजारों लोग यहां की आय पर पलते हैं। अयोध्या को नकारोगे तो जिस नदी के तट पर यह बसा है, उस सरयू को भी नकारने में क्यों पीछे रहो। यह कल्पित न भी हो पर कल्पितों द्वारा यह अपवित्र कर दी गयी है। पवित्रता और अपवित्रता पर तुम विश्वास नहीं भी करोगे तो यह सलिल वाहिनी अपनी अर्थवत्ता तो खो ही चुकी है। रामबंधुओं ने इसकी पूजा-अर्चना की। इसमें स्नान करके अपने को धन्य किया। वसिष्ठ, विश्वामित्र के सदृश कल्पित ऋषि-मुनियों ने इसमें सांध्य वन्दन किया। इसके किनारे यज्ञ जाप हुए। राम के श्रद्धालुओं ने इसके जल में डुबकियां लगायीं, आज भी लगाते हैं।'

उन्होंने लिखा है- 'इस सरयू का क्या करोग, इसे सुखा दोगे, यह तुम्हारे वश की बात नहीं। फिर इसके उद्गम पर ही रोक लगा दो। कुछ कोसों तक भूमि ही जलमग्न होगी न, कुछ लोग ही तो विस्थापित होंगे। तुम्हें इसकी चिन्ता नहीं। नर्मदा-परियोजना में तुमने यह सब देखा-झेला है। तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ा है, अब भी नहीं बिगड़ेगा। एक अर्थहीन नदी से तो मुक्ति मिलेगी। पर ध्यान देना, तुम्हारे देश की नदियां ही तुम्हारी जीवन रेखा हैं। इसके किनारे ही नगर-गांव आबाद हुये हैं। सभ्यता-संस्कृति पनपी है। तुम्हारा देश कृषि प्रधान है। कृषि के लिये जल चाहिए। सरयू को मिटाओगे तो इसके तीर बसे नगर-गांव उजड़ जायेंगे। सहस्त्रों की संख्या में इन उजड़े लोगों का क्या करोगे, भारी समस्या है। कुछ बोलने, कुछ करने से पहले सोचना आवश्यक है।’

संस्कृत के एक कथन के माध्यम से डॉ. मिश्र लिखते हैं- 'सहसा अभिहितं कार्य न कर्त्तव्यम, अर्थात सहसा कोई कार्य मस्तिष्क में आये तो न करो। इसे तर्क की कसौटी पर कसो। सोचो-विचारो। करणीय हो तो करो। न करणीय हो तो नहीं करो। सरयू और अयोध्या को नकराने से ही राम का नकारना पूरा नहीं होता बल्कि इसके लिए बहुत कुछ नकारना होगा।'
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