शुक्रवार, मई 20, 2011

गैर-लोकतांत्रिक है सुरक्षा परिषद का ‘वीटो’ अधिकार

पवन कुमार अरविंद

सत्ता के संचालन की लोकतांत्रिक प्रणाली; इस सृष्टि की सर्वोच्च शासन व्यवस्था मानी गई है। क्योंकि अब तक शासन के संचालन की जितनी भी पद्धतियां ज्ञात हैं उनमें लोकतांत्रिक प्रणाली सर्वाधिक मानवीय होने के कारण सर्वोत्कृष्ट है। यह एक ऐसा तंत्र है जिसमें इकाई राज्य के सभी जन की सहभागिता अपेक्षित है। इस तंत्र में न तो कोई आम है और न ही कोई खास, बल्कि लोकतांत्रिक सत्ता की निगाह में सभी समान हैं। लोकतांत्रिक देश यानी सभी जन की सहभागिता से निर्मित तंत्र।

भारत इस सर्वोत्कृष्ट शासन प्रणाली का जन्मदाता है। कुछ लोग ब्रिटेन को भी मानते हैं; पर यह सत्य नहीं है, भले ही भारत को आजादी मिलने तक देश के सभी रियासतों में राजतंत्र रहा हो और इस राजतांत्रिक पद्धति से सत्ता संचालन का सिलसिला अयोध्या के राजा दशरथ के शासनकाल के बहुत पहले से चलता रहा हो, फिर भी जनता के प्रति सत्ता की जवाबदेही के परिप्रेक्ष्य में भारत ही लोकतांत्रिक प्रणाली का जन्मदाता कहा जाएगा।

दशरथ पुत्र मर्यादापुरुषोत्तम राम का शासन राजतांत्रिक होते हुए भी लोकतांत्रिक था। क्योंकि उनके राज्य की सत्ता जनता के प्रति पूर्ण-रूपेण जवाबदेह थी। उनकी पत्नी सीता पर अयोध्या के मात्र एक व्यक्ति ने आलोचना की थी, राजा राम ने इसको गंभीरता से लिया और राजधर्म का पालन करते हुए सीता को जंगल में भेज दिया। यहां सवाल यह नहीं है कि राम ने सीता के प्रति अपने पति धर्म का पालन किया या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि आलोचना करने वाले की संख्या मात्र एक थी, फिर भी कार्रवाई कठोर हुई। उनके जैसा संवेदनशील राजतंत्र अब तक देखने या सुनने को नहीं मिला है। वह एक ऐसा तंत्र था जो लोकतंत्र से भी बढ़कर था। हांलाकि, राज्य के राजा का चयन सत्ता उत्तराधिकार की अग्रजाधिकार विधि के तहत होता था। यानी राजा का ज्येष्ठ पुत्र सत्ता का उत्तराधिकारी। उस समय मतदान प्रक्रिया की कहीं कोई चर्चा भी नहीं थी।

अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने कहा था कि यदि किसी इकाई राज्य की सत्ता, उस इकाई राज्य की जनता द्वारा चुनी गई हो, जनता के हित में कार्य करती हो और जनता के लिए समर्पित हो; तो ऐसी सरकार को लोकतांत्रिक कह सकते हैं। लिंकन के कहने का अर्थ यह भी है कि सरकार के निर्माण या चयन में लोकतांत्रिक इकाई के सभी लोगों की समान सहभागिता होनी चाहिए।

कहने को तो अमेरिका लोकतंत्र का सबसे बड़ा पैरोकार है लेकिन वह भी वैश्विक संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) के महत्पूर्ण घटक सुरक्षा परिषद में लोकतंत्र की पूर्ण स्थापना के लिए कुछ भी नहीं कर रहा है। यूएनओ को वैश्विक सत्ता कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। हालांकि भारत सहित दुनिया के मात्र 192 देशों को ही यूएनओ की सदस्यता प्राप्त है, फिर भी इसकी सत्ता को वैश्विक सत्ता कहना ज्यादा समीचीन होगा।

वर्तमान में सुरक्षा परिषद के सदस्यों की संख्या 15 है। इनमें से पांच- अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और ब्रिटेन; स्थाई सदस्य हैं, जबकि 10 देशों की सदस्यता अस्थाई है। इन अस्थाई सदस्यों में भारत भी शामिल है। अस्थाई सदस्यों का कार्यकाल दो वर्ष का होता है। स्थाई सदस्यों को वीटो का अधिकार प्राप्त है। यह वीटो अधिकार ही सुरक्षा परिषद में लोकतंत्र की स्थापना की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। क्या आप कुछ सदस्यों को कुछ विशेष अधिकार देकर लोकतांत्रिक सत्ता स्थापित कर सकते हैं, यह कदापि संभव नहीं है।

आखिर सुरक्षा परिषद में लोकतंत्र की पूर्ण-रूपेण स्थापना के लिए अमेरिका कोई पहल क्यों नहीं करता? क्या वह सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्य देशों को मिले वीटो के अधिकार को बनाए रखना चाहता है और शेष अस्थाई सदस्य देशों को अस्थाई के नाम पर इस अधिकार से दूर रखना चाहता है? क्या यही अमेरिका की लोकतंत्रिक सोच है। हालांकि यह पहल चीन से करना बेमानी है क्योंकि उसकी सोच गैर-लोकतांत्रिक है। अमेरिका को यह महत्वपूर्ण पहल इसलिए भी करना चाहिए क्योंकि वह सोवियत संघ के विघटन के बाद एक-ध्रुवीय विश्व का इकलौता नेता है।

भारत भी सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के लिए अभियान चलाए हुए है। इससे उसको क्या हासिल होगा। कुछ विशेष सहूलियत मिल सकती है। महासभा के सदस्य देशों या विश्व के अन्य देशों के लिए वैश्विक नीति-निर्माण की दिशा में मत देने का अधिकार मिल सकता है, लेकिन इससे क्या वह संयुक्त राष्ट्र महासभा के 192 सदस्यों में से पांच देशों- अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और ब्रिटेन, को छोड़कर शेष 187 देशों का स्वाभाविक नेता बना रह सकता है। सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के बजाए भारत को परिषद के मानक को पूरा करने वाले सभी सदस्य देशों के लिए समान अधिकार की सदस्यता के निमित्त अभियान चलाना चाहिए। भारत का यह प्रयास यूएनओ की सुरक्षा परिषद सहित विश्व के सभी देशों में लोकतंत्र की जड़ें गहरी करने की दिशा में अहम सिद्ध होगी।

बुधवार, मई 18, 2011

राहुल गांधी का हवा-हवाई ‘दिग्विजयी दावा’

पवन कुमार अरविंद

सचिव वैद्य, गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राजधर्म तनु तीनि कर होईं बेगहिं नास॥


अर्थात-‘जिस राजा के सचिव, वैद्य और गुरू राजा के भयवश या उसे खुश रखने के लिए उसके सम्मुख उसके मन की और चिकनी-चुपड़ी बातें बोलते हों, उस राजा के राज्य, शरीर और धर्म का सर्वनाश हो जाता है।’ (रामचरितमानस)

ठीक इसी प्रकार, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी राहुल गांधी के एक ऐसे सचिव प्रतीत हो रहे हैं; जो केवल अपने नेता को प्रसन्न रखने के लिए ही बोलता है। दिग्विजय जैसे अपने सचिव सदृश व्यक्ति के बचनों में राहुल को सत्य दिखता है। यदि ऐसा नहीं होता तो राहुल दिग्विजय के तर्कों के आधार पर ग्रेटर नोएडा के भट्टा व पारसौल गांव के संदर्भ में 74 लोगों को मारे जाने का दावा क्यों करते ? भट्टा व पारसौल गांव में जो कुछ भी दिग्विजय ने पत्रकारों से कहा था, वही बातें राहुल ने प्रधानमंत्री के समक्ष दुहरायी।

दरअसल, इस मामले को लेकर राहुल सोमवार को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से मिलने पहुंचे। इस दौरान उन्होंने दिग्विजय की बातों को ही दुहराया। उन्होंने डॉ. सिंह से कहा कि भट्टा व पारसौल में कम से कम 74 शवों की राख बिखरी पड़ी है। उन्होंने दावा किया कि इसके बारे में गांव के सभी लोगों को जानकारी है। राहुल ने पुलिस कार्रवाई में कथित रूप से जले हुए शव और किसानों एवं उनके परिवार के लोगों के खिलाफ हिंसा की तस्वीरें भी दिखाई थी। उन्होंने कई स्थानीय महिलाओं के साथ बलात्कार होने की बात भी दुहरायी और यह भी कहा था कि स्थानीय लोगों की निर्ममता से पिटाई की गयी है।

लेकिन राहुल के इन दावों की हवा निकलती दिख रही है। दोनों गांवों में से एक भी व्यक्ति राहुल के दावों की पुष्टि करने को तैयार नहीं है। भट्टा व पारसौल गांव के लोगों का कहना है कि उन्होंने महिलाओं से बलात्कार संबंधी खबरें सुनी है लेकिन वे इसका दावा नहीं कर सकते। इस संदर्भ में ग्रामीण सिर्फ इतना ही बता रहे हैं कि पुलिस ने उनकी पिटाई की थी।

विदित हो कि 11 मई को राहुल गांधी प्रशासन को धता बताते हुए बाइक पर सवार होकर भट्टा व पारसौल पहुंचे थे। इस दौरान काफी राजनीतिक ड्रामा हुआ था। उनका साथ देने दिग्विजय सिंह भी उपस्थित थे। कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारी भी हुई थी। वहां से लौटने के बाद सोमवार को राहुल ने 8 स्थानीय लोगों के साथ प्रधानमंत्री डॉ. सिंह से मुलाकात की। इन 8 स्थानीय लोगों में वीरेन्द्री देवी भी शामिल थी। वीरेन्द्री का कहना है कि उसे ऐसी किसी महिला के बारे में जानकारी नहीं है जिसके साथ दुष्कर्म हुआ हो। वीरेन्द्री ने बताया कि पुलिस ने कुछ महिलाओं की पिटाई जरूर की थी। पुलिस ने उसकी बेटी खुशबू की भी पिटाई की थी। वीरेन्द्री ने बताया कि उसने प्रधानमंत्री को यह नहीं बताया था कि भट्टा व पारसौल गांव से मिली राख में हडि्डयां मिली थी। वीरेन्द्री ने यह भी कहा कि वह प्रधानमंत्री के साथ अंग्रेजी में हो रही बातचीत को समझ नहीं पाई। आश्चर्य की बात यह है कि राहुल के साथ प्रधानमंत्री से मिलने वाले 8 किसानों में से 7 भूमिगत हो गये हैं।

राहुल के इन दावों के बाद गौतमबुद्ध नगर जिला प्रशासन भी हरकत में आ गया और भट्टा व परसौल गांवों से मंगलवार को राख के कुछ सैंपल एकत्रित कर जांच के लिए आगरा भेजे गये। मेरठ के कमिश्नर भुवनेश्वर कुमार ने बताया कि गांव के पांच स्थानों से राख का सैंपल केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला इसलिए भेजा गया है; ताकि उसमें विस्फोटकों की जांच हो सके। हालांकि, उन्होंने इस जांच के पहले ही कह दिया कि राख में मानव कंकाल मिलने से संबंधित आरोप बेबुनियाद हैं। हालांकि सत्यता क्या है, जांच रिपोर्ट आने के बाद स्वतः स्पष्ट हो जाएगा। मेरठ के पुलिस महानिरीक्षक ने कहा कि गांव का कोई भी सदस्य गायब नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि 23 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, 17 घायल हैं और दो की मौत हो गई है। इसके अलावा सभी लोग गांव में ही हैं।

वहीं, कांग्रेस राहुल के समर्थन में खड़ी हो गई है। पार्टी का कहना है कि किसानों पर पुलिस फायरिंग मामले की न्यायिक जांच होनी चाहिए। किसानों को जब तक न्याय नहीं मिलेगा, कांग्रेस अपना आंदोलन बंद नहीं करेगी। विदित हो कि ग्रेटर नोएडा के किसान अपनी जमीनों की मुआवजा राशि बढ़ाने की मांग को लेकर पिछले करीब 4 महीने से गांव में धरने पर बैठे थे। धरनारत किसानों ने रोडवेज के कुछ कर्मचारियों को बंधक बना लिया था। प्रशासन बंधकों को मुक्त कराने के लिए 7 मई को भट्टा पारसौल गांव पहुंचा था, इसी दौरान किसानों व सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। इसमें पीएसी के 2 जवानों सहित चार लोगों की मौत हो गयी थी।

अब प्रश्न उठता है कि “कांग्रेस का भविष्य” और देश के भावी प्रधानमंत्री कहे जाने वाले राहुल गांधी क्या अपनी पार्टी के विनाश तक दिग्विजय जैसे लोगों के कर्णप्रिय लगने वाले वचनों को सुनते रहेंगे; या फिर कुछ अपनी भी बुद्धि लगायेंगे। क्योंकि निराधार और “तोतारटंत” बातें व्यक्ति की छवि तो बिगाड़ती ही हैं, विनाश की ओर भी उन्मुख करती हैं।

रविवार, मई 15, 2011

डॉ. वेद प्रकाश नन्दा को ‘छठा भारतवंशी गौरव सम्मान’

पवन कुमार अरविंद, नई दिल्ली।

अमेरिका के डेन्वेर विश्वविद्यालय में विधि विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक एवं वर्ल्ड ज्यूरिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. वेद प्रकाश नन्दा को “छठा भारतवंशी गौरव सम्मान” से सम्मानित किया गया। डॉ. नन्दा को यह सम्मान दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित मालवीय भवन के सभागार में शनिवार को आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान बिहार के मुख्यमंत्री श्री सुशील कुमार मोदी ने प्रदान किया।

कार्यक्रम का आयोजन अंतरराष्ट्रीय सहयोग न्यास के तत्वावधान में किया गया था। इस दौरान मुख्य रूप से पूर्व राज्यपाल केदारनाथ साहनी, पूर्व पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्यमंत्री संतोष गंगवार, वरिष्ठ पत्रकार अशोक टण्डन, दिल्ली की मेयर प्रो. रजनी अब्बी, मृदुला सिन्हा, मीडिया नैपुण्य संस्थान के निदेशक आशुतोष भटनागर, भाजपा नेता विजय जौली, पी.एन. पाठक सहित कई गण्यमान्य उपस्थित थे।

डॉ. नन्दा ने अमेरिका में प्रवासी भारतीयों के बीच भारत की संस्कृति व सभ्यता के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वह विदेशों में कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किये जा चुके हैं। इसके अलावा अभी हाल ही में वह इण्डियन लॉ टीचर्स एसोसिएशन के द्वारा सर्वश्रेष्ठ शिक्षक सम्मान से सम्मानित किये जा चुके हैं।

डॉ. नन्दा ‘लॉ जर्नल’ व ‘नेशनल मैगजीन’ का प्रकाशन भी करते हैं और अंतरराष्ट्रीय कानून पर उनकी 23 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वह अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर ‘डेन्वेर पोस्ट’ के नियमित स्तम्भकार हैं। उन्होंने बीबीसी व वॉयस ऑफ अमेरिका सहित विश्व के विभिन्न रेडियो व टीवी चैनलों पर समीक्षक के नाते भी अपनी विशेष पहचान बनायी है।

यह पुरस्कार अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के द्वारा प्रदान किया जाता है। यह देश की पहली ऐसी संस्था है जो विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के लोगों से संबंध स्थापित करने और भारत की संस्कृति व सभ्यता के प्रचार-प्रसार का कार्य करती है। इसकी स्थापना वर्ष 1960 में वरिष्ठ पत्रकार एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ श्री बालेश्वर अग्रवाल ने की। 94 वर्षीय श्री अग्रवाल परिषद के संस्थापक अध्यक्ष और जे.सी. शर्मा अध्यक्ष हैं। संस्था का केंद्रीय कार्यालय दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित प्रवासी भवन में है।

इस पुरस्कार का चयन उच्चस्तरीय समिति के द्वारा किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से मॉरीशस के राष्ट्रपति अनिरुद्ध जगन्नाथ, फिजी के पूर्व प्रधानमंत्री महेंद्र चौधरी, त्रिनिडाड के पूर्व प्रधानमंत्री बासुदेव पाण्डेय, पूर्व केंद्रीय विधि मंत्री एवं जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी, दैनिक जागरण के प्रधान सम्पादक संजय गुप्ता, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के संस्थापक अध्यक्ष बालेश्वर अग्रवाल, जी टेलीफिल्म्स लिमिटेड के एमडी सुभाष चन्द्रा, वरिष्ठ पत्रकार मनोहर पुरी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग न्यास के सचिव विजेंद्र मित्तल और नरेश गुप्ता शामिल हैं।

विदित हो कि संस्था के द्वारा ‘पहला भारतवंशी गौरव सम्मान’ 25 अक्टूबर 2005 को दक्षिण अफ्रीका निवासी श्री रणजीत रामनारायण को प्रदान किया गया था। उनको यह पुरस्कार मॉरीशस के प्रधानमंत्री श्री नवीनचंद्र रामगुलाम ने प्रदान किया था। ‘दूसरा भारतवंशी गौरव सम्मान’ त्रिनिदाद व टोबैगो निवासी श्री सत्यनारायण महाराज को 23 दिसम्बर 2006 को पूर्व प्रधानमंत्री श्री इंदर कुमार गुजराल ने प्रदान किया था। ‘तीसरा भारतवंशी गौरव सम्मान’ ग्लोबल ऑर्गनाइजेशन ऑफ पीपुल्स ऑफ इण्डिया (जीओपीआईओ) के चेयरमैन डॉ. थामस अब्राहम को 4 जनवरी 2008 को तत्कालीन उप-राष्ट्रपति श्री भैरोंसिंह शेखावत ने प्रदान किया था।

‘चौथा भारतवंशी गौरव सम्मान’ मॉरीशस के ह्यूमन सर्विस ट्रस्ट (एचएसटी) नामक गैर-सरकारी संगठन को 11 जनवरी 2009 को पूर्व उप-प्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी ने प्रदान किया था और ‘5वां भारतवंशी गौरव सम्मान’ थाईलैंड के श्री शिवनाथ राय बजाज को 10 जनवरी 2010 को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमती सुषमा स्वराज ने प्रदान किया था।

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