रविवार, जुलाई 18, 2010

‘हिन्दू आतंकवाद’ का भूत कांग्रेस की सुनियोजित साजिश


कांग्रेस को डर है कि महंगाई, आतंकवाद, नक्सलवाद और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर यूपीए सरकार की कथित जनविरोधी नीतियां कहीं उसके ‘युवराज’ राहुल गांधी की ताजपोशी में बाधा न पैदा कर दे, इसीलिए वह जनता का इन मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए ‘हिंदू आतंकवाद’ का हौवा खड़ा कर रही है।

इसी साजिश के तहत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने के लिए कांग्रेस तरह-तरह के हथकंडे अपना रही है और 'हिन्दू आतंकवाद' का भूत खड़ा कर रही है।

‘हिन्दू आतंकवाद’ जैसे छद्म शब्द गढ़कर संघ को उससे जो़डना कांग्रेस की ओछी राजनीति के अलावा और कुछ नहीं है। किसी इक्का-दुक्का हिन्दू मंच के आक्रोश को ‘हिन्दू आतंकवाद’ का नाम दे देना छुद्र राजनीतिक मानसिकता का ही परिचायक है।

कांग्रेस चुनावी लाभ के लिए कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देना चाहती है। वह ऐन-केन-प्रकारेण अपने ‘युवराज’ राहुल गांधी का राजनीतिक मार्ग प्रशस्त करने को आतुर है। महंगाई, आतंकवाद, नक्सलवाद और भ्रष्टाचार पर सरकार की जन विरोधी नीतियों का दंश राहुल गांधी की ताजपोशी के लिए खतरा न बन जाए इसके लिए कांग्रेस मुस्लिम वोट पर एकाधिकार चाहती है।

मालेगांव विस्फोट में साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी का मामला हो या फिर अजमेर दरगाह विस्फोट कांड में आरोपी बनाए गए देवेंद्र गुप्ता का, जांच एजेंसियां कोई ठोस आधार स्थापित नहीं कर पाई हैं। पूछताछ के नाम पर उनकी पहचान को मीडिया के माध्यम से सुनियोजित तरीके से दुष्प्रचारित कर संघ को बदनाम करने की कोशिश की गई।

ज्ञातव्य है कि हाल ही में एक समाचार चैनल पर संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी को कथित तौर पर ‘हिन्दू आतंकवाद’ से जुड़ी गतिविधियों में शामिल होने से संबंधित रिपोर्ट प्रसारित की गई थी। इस रिपोर्ट के प्रसारित होने के बाद संघ के कार्यकर्ताओं ने समाचार चैनल के दिल्ली स्थित वीडियोकॉन टॉवर कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया था।

इस प्रदर्शन के बाद टीवी टुडे समूह से जुड़े चैनल और अन्य समाचार चैनलों ने इसको ‘आरएसएस के गुंडों का हमला' करार दिया था। प्रदर्शन के दौरान बात बस इतनी सी थी कि भीड़ में शामिल लगभग 40-50 लोगों का समूह संघ के वरिष्ठ लोगों की अनदेखी करता हुआ मुख्य द्वार के भीतर घुस गया और तोड़फोड़ करने लगा, जिसके परिणामस्वरूप कुछ गमले टूट-फूट गए थे। हालांकि संघ ने इसके लिए खेद भी जताया था।

यह भी कम हास्यास्पद नहीं है ये चैनल लश्कर-ए-तैयबा जैसे खूंखार आतंकी संगठन के आतंकियों को ‘लश्कर का कार्यकर्ता’ बताते हैं और अनुशासनप्रिय, शांतिपूर्ण तथा अहिंसक तरीके से संघ के कार्यकर्ताओं के लोकतांत्रित विरोध-प्रदर्शन को ‘आरएसएस के गुंडों का हमला’ करार देते हैं।

इस प्रकार का आचरण व कार्य व्यवहार इस आशंका को बल प्रदान कर रहा है कि सेकुलरिज्म का ढिंढोरा पीटने वाली वर्तमान मीडिया सत्ताभिमुखी होकर अपने सारे लोक-लाज भूल गई है और माध्यम की बजाए मध्यस्थ की भूमिका निभाने लगी है।

यदि उसका आचरण इसी प्रकार सत्ताभिमुखी और गैर-लोकतांत्रिक रहा तो वह दिन दूर नहीं जब जनता का विश्वास ही उस पर से उठ जाएगा और तब मांगे विज्ञापन क्या भिक्षा भी नहीं मिलने वाला।

सत्याग्रह और गांधी जी


विजय कुमार

कुछ बातें कुछ लोगों के साथ चिपक जाती हैं, या यों कहें कि जबरन चिपका दी जाती हैं। कुछ ऐसा ही सत्याग्रह और गांधी जी के साथ है। नि:संदेह गांधी जी ने सत्याग्रह रूपी शस्त्र का प्रयोग कर जन-जन में स्वाधीन होने की इच्छा जगाई। लाखों लोग सड़कों पर उतरे। यद्यपि ऐतिहासिक तथ्य यह है कि इससे देश को स्वाधीनता नहीं मिली; पर 1947 के बाद सत्ताधारी कांग्रेस ने निजी स्वार्थ हेतु स्वाधीनता का कारण गांधी जी और उनके चरखे की चूं-चूं को घोषित कर दिया।

इसके साथ ही एक बड़ा झूठ गांधी जी के साथ यह चिपका दिया गया है कि सत्याग्रह का सर्वप्रथम प्रयोग उन्होंने ही किया। पहले उन्होंने इसे अफ्रीका में आजमाया और फिर भारत में। इसलिए दुनिया में कहीं भी कोई सत्याग्रह करे, तो उसे गांधी का प्रभाव मान लिया जाता है। यद्यपि अब इसकी गंभीरता इतनी घट गयी है कि इसे मजाक में 'गांधीगीरी' कहा जाने लगा है।

वस्तुत: भारत में सत्याग्रह का प्रयोग विभिन्न रूपों में सदा से होता रहा है। मर्यादा पुरुषोत्ताम श्रीराम के पूर्वज महाराजा दिलीप नि:संतान थे। अत: पूरे परिवार एवं राजमहलों में उदासी छायी रहती थी। अपने कुलगुरू के आदेश पर राजा और रानी ने नंदिनी गाय की सेवा का व्रत स्वीकार किया। कुलगुरू ने उन्हें बताया कि नंदिनी की सेवा और उसके अमृतमयी दूध के साथ आवश्यक औषधियां लेने, पथ्य परहेज करने आदि से उनके महल में निश्चित ही किलकारियां गूंजेंगी।

संतान का आकर्षण किसे नहीं होता? राजा और रानी ने इस कठोर व्रत को स्वीकार कर लिया। अब जब नंदिनी बैठती, तब ही वे बैठते। जब वह सोती, तब उसे मक्खी-मच्छरों से बचाने के लिए दोनों पंखा करते। सोते हुए भी उसे कष्ट न हो, अत: दोनों में से कोई एक अवश्य जागता रहता। नंदिनी के लिए नरम घास का बिस्तर बनाते और स्वयं चटाई पर लेटते। उसे भरपेट भोजन कराने के बाद ही वे अन्न-जल मुंह में डालते। वह जंगल में चरने जाती, तो वे उसके साथ जाते और वापस लौटते। इस प्रकार कई महीने बीत गये।

भारतीय इतिहास और पुराण ग्रन्थों में बहुत सी बातें प्रतीकों के रूप में कही गयी हैं। ऐसा कहते हैं कि भगवान भोलेनाथ उनकी सेवा भावना से प्रसन्न हुए। वे उन्हें संतान का वर तो देना चाहते थे; पर अंतिम रूप से वे एक प्रत्यक्ष परीक्षा (viva-voce) और लेना चाहते थे। अत: एक बार जब नंदिनी जंगल में घास चर रही थी, तो अचानक एक सिंह ने प्रकट होकर उसे दबोच लिया। राजा दिलीप बड़े असमंजस में पड़ गये। वे नि:शस्त्र थे और इस सेवा साधना के दौरान कैसी भी हिंसा वर्जित थी।

मजबूर होकर राजा ने सिंह से गाय को छोड़ देने की प्रार्थना की। इस पर सिंह बोला कि उसे भूख लगी है और पशु उसका स्वाभाविक आहार है। यदि राजा उसके लिए कोई और पशु ला दे, तो वह गाय को छोड़ देगा। अहिंसा व्रत का पालन कर रहे राजा के लिए यह भी संभव नहीं था। इधर सिंह की भूख बढ़ रही थी। वह नंदिनी पर दबाव बढ़ा रहा था। नंदिनी भयभीत नेत्रों से राजा की ओर देख रही थी।

अंतत: राजा ने सत्याग्रह का निर्णय लिया। उन्होंने सिंह से आग्रह किया कि वह उन्हें खाकर अपनी भूख मिटा ले और गाय को छोड़ दे। सिंह मान गया। राजा प्राणों का मोह छोड़कर सिर झुकाकर घुटनों के बल बैठ गये; पर काफी समय बीतने पर भी जब सिंह ने आक्रमण नहीं किया, तो राजा ने सिर उठाया। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। क्योंकि वहां तो भगवान भोलेनाथ स्वयं उपस्थित थे। उसके बाद उन्होंने राजा को इच्छित वर दिया, जिससे उनका वंश खूब फला-फूला।

राजा शिबि की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक बार जब वे दरबार में बैठे थे, तो एक कबूतर उनकी गोद में आकर छिप गया। उसका पीछा एक भूखा गरुड़ कर रहा था। गरुड़ ने भी राजा से कहा कि वह कबूतर को उसे सौंप दे; पर शिबि शरणागतों के रक्षक थे। उन्होंने मना कर दिया। अंत में यह सहमति हुई कि राजा कबूतर के भार के बराबर अपना मांस गरुड़ को दे दें।

दरबार में ही तराजू मंगाया गया। एक पलड़े पर कबूतर और दूसरे पर राजा अपने शरीर के टुकड़े रखते गये; पर कबूतर का पलड़ा नीचे ही रहा। अंतत: शिबि स्वयं दूसरे पलड़े पर बैठ गये। ऐसा होते ही भगवान भोलेनाथ प्रकट हो गये, जो राजा के शरणागत रक्षा वाले वचन की परीक्षा ले रहे थे। राजा ने सत्याग्रह के माध्यम से अपने वचन को सत्य सिद्ध कर दिखाया।

भारतीय इतिहास में ऐसे एक नहीं, हजारों उदाहरण हैं। ''रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जांहि पर वचन न जाई'' भी तो सत्य और अपने वचन पर आग्रह का ही उद्धोष करता है। राजा दशरथ चाहते, तो कैकेयी को दुत्कार सकते थे। पूरा राज्य राजा के साथ था; पर राजा ने अपने वचन का पालन किया। और श्रीराम ने तो पिता के आदेश की प्रतीक्षा भी नहीं की। वे वचन की बात सुनते ही वन को चल दिये। भरत भी 14 वर्ष तक उनकी पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर व्रत-उपवास के साथ जीवन बिताते रहे। शत्रु का सगा भाई होते हुए भी शरणागत वत्सल श्रीराम ने विभीषण को अभयदान दिया। यह सत्याग्रह नहीं, तो और क्या है? बालक ध्रुव और प्रह्लाद, सीता, सावित्री, द्रौपदी और राजा हरिश्चंद्र आदि की कथाएं भी सत्याग्रह का अनुपम उदाहरण हैं।

भीष्म की प्रतिज्ञा और उसके पालन के लिए अस्त्र-शस्त्रों का त्याग, अभिमन्यु की वीरगति का समाचार पाकर अर्जुन की प्रतिज्ञा और उसके पूरा न होने पर चितारोहण की तैयारी, श्रीकृष्ण द्वारा शिशुपाल की 100 गालियों को सहन करना, कर्ण द्वारा सब जानते हुए भी कवच और कुंडलों का त्याग, द्रोणाचार्य द्वारा अश्वत्थामा की मृत्यु का झूठा समाचार सुनकर शस्त्र त्याग आदि सत्याग्रह के ही तो उदाहरण हैं। फिर भी न जाने क्यों सत्याग्रह का प्रणेता गांधी बाबा को बता दिया जाता है।

रामायण और महाभारत काल को सत्य मानने से जिनके पेट में दर्द होता हो, वे मुगल हमलों के काल को तो मानते ही होंगे, जब इस सत्याग्रह ने कई बार 'सद्गुणविकृति' का रूप भी लिया है। राजा पृथ्वीराज चौहान ने 16 बार मौहम्मद गौरी को क्षमा किया। राजा हम्मीर ने अलाउद्दीन खिलजी के भगोड़े सैनिक मुहम्मदशाह को अभयदान दिया। परिणाम दोनों बार इनके और देश के विरुद्ध गये। मुगल काल में वीर हकीकत, गुरू तेगबहादुर, भाई मतिदास, सतिदास और दयाला, बन्दा बैरागी, जोरावर और फतेह सिंह आदि के बलिदान भी तो सत्याग्रह ही हैं। यदि वे मुसलमान बन जाते, तो अपार धन सम्पदा और सुख सुविधाएं पा सकते थे; पर उन्होंने सत्य का आग्रह नहीं छोड़ा और मृत्यु का वरण किया। हजारों हिन्दू वीर माताओं और बहिनों का जौहर भी तो सत्याग्रह ही है।

थोड़ा और आगे चलें। जिला सुरेन्द्र नगर, गुजरात के मुली कस्बे में गत 600 वर्ष से तीतर की रक्षा हित हुए युद्ध की याद में एक मेला होता है। सिंध के निवासी सोधा परमार जाति के लोग 1474 ई0 में मुली गांव में आकर बसे। एक बार सूर्य देवता के प्रतीक मंडावरै जी की प्रतिमा के पीछे एक घायल तीतर छिप गया। उसे ढूंढते हुए चाबड़ जाति के शिकारी आये; पर परमारों के मुखिया लखबीर जी की मां जोमबाई ने शरणागत को वापस करने से मना कर दिया। इस बात पर हुए युद्ध में लखबीर के छोटे भाई मुंजोजी सहित 200 परमार तथा 400 चाबड़ योद्धा मारे गये। क्या यह सत्याग्रह नहीं था?

5 सितम्बर, 1730 (भादों शुक्ल दशमी, वि. संवत 1787) को अलवर के पास ग्राम खेजड़ली में हरे पेड़ों की रक्षा के करते हुए इमरती देवी के नेतृत्व में 363 स्त्री-पुरुषों और बच्चों द्वारा 27 दिन तक लगातार चलाये गये बलिदान पर्व को क्या कहेंगे? 28 वें दिन राजा को स्वयं वहां आकर इन पर्यावरण प्रेमियों के सम्मुख अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा मांगनी पड़ी। आज भी उस घटना की स्मृति में वहां विशाल मेला होता है। अंग्रेजी तोपों के आगे खड़े होने वाले कूकाओं और हंसते हुए फांसी का फन्दा चूमने वाले भगतसिंह आदि क्रांतिवीरों के सत्याग्रह के आगे गांधीवादियों का सत्याग्रह कुछ नहीं बचता।

ऐसे प्रसंग भारत के चप्पे-चप्पे पर बिखरे हैं। वस्तुत: गांधी जी ने इनसे प्रेरणा लेकर सत्याग्रह को अंग्रेजों के विरुद्ध एक युगानुकूल शस्त्र का रूप दिया, जिससे स्वाधीनता आंदोलन को भरपूर लाभ हुआ। गांधी जी के मन पर बचपन में अपनी मां से सुनी श्रीराम, श्रीकृष्ण, ध्रुव, प्रह्लाद, गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, अभिमन्यु आदि की उन कहानियों का बहुत प्रभाव था, जिनमें बार-बार सत्य और अपने वचन पर आग्रह की बात आती है। इससे ही गांधी जी के मन में सत्याग्रह की भूमिका बनी होगी।

गांधी जी नि:संदेह सत्य के आग्रही थे; पर उन्हें सत्याग्रह का प्रणेता बताकर भारत की लाखों वर्षों की परम्परा पर धूल डालना निरा दुराग्रह है। ऐसे लोगों के लिए भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने कहा है-
सबसे भले हैं मूढ़, जिन्हें न व्यापै जगत गति॥
भगवान इन मूढ़ों से भारत की रक्षा करें। हे राम।

(लेखक ‘राष्ट्रधर्म’ मासिक पत्रिका के पूर्व सहायक संपादक हैं)
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