गुरुवार, दिसंबर 29, 2011

सार्वलौकिक और सार्वकालिक ग्रन्थ है भगवद्गीता

पवन कुमार अरविंद

रूस की अदालत ने भगवद्गीता के रूसी भाषा में अनूदित संस्करण 'भगवत् गीता एस इट इज' पर रोक लगाने और इसके वितरण को अवैध घोषित करने की याचिका 28 दिसम्बर को खारिज कर दी। इसके अनुवादक इस्कान के संस्थापक ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद हैं। इसके प्रकाश में आने के बाद से ही कुछ ईसाई संगठनों ने खिलाफत का झंडा उठा लिया था। रूस के शक्तिशाली आर्थोडॉक्स चर्च का कहना था कि यह जर्मन तानाशाह एडॉल्फ हिटलर की आत्मकथा ‘मीन कांफ’ से कम नहीं है। चर्च से जुड़े एक संगठन ने जून में इसके खिलाफ साइबेरिया प्रांत के तोमस्क शहर की अदालत में याचिका दायर की थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि यह उग्रवादी विचारधारा को बढ़ावा देती है। अदालत ने महीनों चली सुनवाई के बाद 19 दिसंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था।

विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने 28 दिसम्बर के रूसी अदालत के फैसले पर खुशी जताई। उन्होंने कहा कि रूसी अदालत में दायर याचिका कुछ सनकी लोगों की दिमागी उपज थी। विगत दिनों इस मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में काफी हंगामा हुआ था। रूसी अदालत के फैसले की सूचना भारत सरकार ने भी लोकसभा को दी। लोकसभा में नेता सदन एवं वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने अधिकृत रूप से 29 दिसम्बर को बताया कि रूसी अदालत ने भगवद्गीता के अनूदित संस्करण पर प्रतिबंध लगाने से इंकार कर दिया है। प्रणव की सूचना का सभी सदस्यों ने मेजें थपथपाकर स्वागत किया।

दरअसल, भगवद्गीता में विरोध लायक कुछ नहीं है। रूस में जो लोग इसका विरोध कर रहे थे, उनकी पृष्ठभूमि सर्वविदित है। भगवद्गीता के संकलनकर्ता महर्षि वेदव्यास ने इसे मानवमात्र का धर्मशास्त्र कहा है। उन्होंने इसे सारे वेदों के प्राण और उपनिषदों का भी सार बताया है। यद्यपि विश्व में सर्वत्र गीता का समादार है फिर भी यह किसी सम्प्रदाय या मजहब का ग्रन्थ नहीं बन सका; क्योंकि सम्प्रदाय किसी न किसी रूढ़ि से जकड़े हैं। यह किसी विशिष्ट व्यक्ति, जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, पन्थ या देश-काल का ग्रन्थ नहीं है बल्कि यह सार्वलौकिक व सार्वकालिक है। विश्व मनीषा की अमूल्य धरोहर है।

इसका प्रादुर्भाव महाभारत युद्ध के दौरान हुआ। युद्धक्षेत्र ‘कुरुक्षेत्र’ में कौरव और पाण्डव पक्ष की सेना लड़ने को तैयार थी और अपने-अपने सेनापतियों के शंख फूँकने की प्रतीक्षा कर रही थीं। ठीक उसी समय पाण्डव पक्ष का मुख्य योद्धा अर्जुन अपना ‘गाण्डीव’ रथ के पिछले हिस्से में रखकर बैठ जाता है और कृष्ण से कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूंगा। युद्ध में अपने ही प्रियजनों, सगे-संबंधियों को मारकर खून से सने राज्य का भोग करने से बेहतर भिच्छा का अन्न ग्रहण करना होगा। इसलिए हे भगवन् ! कोई दूसरा उपाय बताइए। क्योंकि अपने ही सगे-संबंधियों को देखकर मेरे हाथ-पांव कांप रहे हैं।

कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार करने के निमित्त उपदेश दिये थे। इस उपदेश का संकलन ही भगवद्गीता है। दरअसल, कृष्ण ने इस उपदेश का माध्यम अर्जुन को बनाया, लेकिन उनका उद्देश्य समूचे जगत को अमूल्य शिक्षा देने से था। यह युद्धक्षेत्र में दिया गया अहिंसा का अद्वितीय संदेश है।

गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भगवद्गीता में कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। इसमें संजय-धृतराष्ट्र और कृष्णार्जुन के संवाद हैं। कुल 42 श्लोंकों में संजय-धृतराष्ट्र संवाद और 658 श्लोंकों में कृष्णार्जुन संवाद का वर्णन है। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से 84 श्लोंकों के माध्यम से प्रश्न किए हैं। कृष्ण ने इसका उत्तर कुल 574 श्लोंकों के माध्यम से दिये हैं।

अज्ञान से आवृत्त धृतराष्ट्र जन्मान्ध है; किन्तु संयमरूपी संजय के माध्यम से वह हस्तिनापुर राजमहल में बैठकर महाभारत युद्ध देखता व सुनता है। उसकी बातों में चिन्ता है, लेकिन पश्चाताप् का भाव नहीं है। उसको पश्चाताप् तब होता है जब सारा खेल खत्म हो जाता है। उसका रुख केवल प्रश्नवाचक है और संजय से बार-बार पूछता है कि कुरूक्षेत्र का ताजा समाचार क्या है?

भगवद्गीता का मूल श्रीकृष्णार्जुन संवाद है। इसमें वैश्विक सृष्टि के सारे निहितार्थ समाहित हैं। यह समाधानकारक ग्रन्थ है, साथ ही वैज्ञानिक भी। यह स्वयं में एक सम्पूर्ण ग्रन्थ है। इसमें कहीं भी हिंदू-मुस्लिम या अन्य मत-पंथ सम्प्रदायों की चर्चा नहीं है। इसमें प्रबंधन की शिक्षा और पर्यावरण परिरक्षण का पाठ है। त्याग है, तपस्या है। सदाचार के पाठ भी समाहित हैं। घर और परिवार के संचालन की शिक्षा है। समाज में बड़ों के साथ व्यवहारगत शिक्षा का समावेश है।

गीता का विरोध करने वाले याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह युद्ध के लिए प्रेरित करती है। हालांकि, गीता में युद्ध के लिए प्रेरित करने का सवाल ही नहीं है। यह लड़ाई तो विधर्मियों के खिलाफ थी। यदि विधर्मियों के खिलाफ लड़ना अनैतिक है, तो न लड़ना या जीवनदान देना उससे भी बड़ा अनैतिक है।

कोई व्यक्ति क्या कहता है या क्या कहना चाहता है, इसका केवल शब्दों से ही अर्थ नहीं निकाला जा सकता। श्रीकृष्ण ने जिस समय गीता का उपदेश दिया था, उस समय उनके मनोगत भाव क्या थे? मनोगत भाव पूर्ण रूप से केवल वाणी द्वारा ही व्यक्त नहीं किये जा सकते। वाणी द्वारा कुछ तो व्यक्त हो जाते हैं, लेकिन कुछ भाव-भंगिमा से व्यक्त होते हैं और शेष पर्याप्त क्रियात्मक होते हैं। इसे कोई पथिक चलकर ही जान सकता है। जिस स्तर पर श्रीकृष्ण थे, क्रमश: चलकर उसी अवस्था को प्राप्त महापुरुष ही जानता है कि गीता क्या कहती है। श्रीकृष्ण ने कहा भी है कि इसको समझने के लिए किसी योग्य पुरुष का सानिध्य आवश्यक है।

इस पर प्रतिबंध की मांग करने वाले याचिकाकर्ता ने गीता को समझने के लिए क्या किसी योग्य पुरुष की शरण ली, या फिर पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर ही सारे आरोप लगा दिए? हालांकि, भगवद्गीता में आस्तिकता-नास्तिकता और आस्था-अनास्था का प्रश्न ही नहीं है। यह तो समाज के सभी क्षेत्रों के प्रबंधन का पाठ है। यह देववाणी का संकलन है। कालजयी ग्रन्थ है। इस कारण इसकी प्रासंगिकता हर कालखण्ड में है। पूर्वाग्रह ही इसके विरोध की मूल प्रेरणा है।

बुधवार, दिसंबर 14, 2011

समस्या के समाधान तक उठाएंगे कश्मीर मुद्दा

सुरेश जोशी उपाख्य भैयाजी

वर्ष 1947 के पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में एक खेल मैदान पर खेलते थे, वह खेल था दिल्ली किसकी है। 1947 के बाद खेल बदला और प्रश्न आया कि कश्मीर किसका है? कश्मीर हमारा है। संघ की शाखा में स्वयंसेवकों के मन में इस भाव का जागरण बहुत पहले से ही होता आया है। समस्या है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, इसके बारे में संघ के स्वयंसेवकों के मन में अलग कोई भावना या विचार नहीं है, पहले से ही इस प्रकार की धारणा है।

कश्मीर के संदर्भ में भावी परिदृश्य क्या होता है? जो भूत में था वही परिदृश्य है, वर्तमान में वही रहेगा, कोई अलग नहीं है। वर्तमान में जो है उसके कारण कुछ प्रश्न है। कश्मीर के संदर्भ में वर्तमान परिदृश्य भूतकाल का परिदृश्य नहीं है और यह वर्तमान का भी परिदृश्य देने वाल नहीं है। कश्मीर के संदर्भ में भावी परिदृश्य यही है कि जो प्रारम्भ से चला आ रहा है उसी दृष्टिकोण को देश ही नहीं बल्कि दुनिया के समक्ष सिद्ध करना, हमारा यही कार्य है। परिदृश्य के बारे में कोई दोराय नहीं है।

इस देश पर समय-समय पर विभिन्न प्रकार के आक्रमण होते आये हैं। शस्त्र लेकर आये, सारा एकदम खुला स्वरूप था आक्रमण का, ध्यान में आता है, तो लोग तैयारी करते थे आक्रमण का। पुरुषार्थ के बल पर, शक्ति के बल पर विजय प्राप्त करते हैं। तो एक बहुत लम्बी परम्परा इस देश की शक्ति ने, पुरुषार्थ ने देखी है कि किस प्रकार से शत्रुओं का सामना करना पड़ता है। शस्त्र के सामने न झुकते हुए चलते थे उसी कारण भारत का अस्तित्व विश्वमंच पर बना रहा है नहीं तो भारत समाप्त हो जाता।

एक दूसरा विभिन्न प्रकार का आक्रमण जो चला, योजना पूर्वक एक षड्यंत्र के रूप में रहा, अंग्रेजों का जो आक्रमण था वह बहुत ही सहज, हमें लगा भी नहीं कि कोई शत्रु आ रहा है, अंग्रेज हमें मित्र ही लगे। लोगों को कितनी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध करायी। अगर अंग्रेज नहीं होते तो यह देश कैसे बनता, अंग्रेजों ने एक देश को देश दिया है। ऐसी भावना अच्छे-अच्छे और बुद्धिमान लोगों के मन में है। कभी-कभी लोग कहते थे कि अंग्रेजों का राज्य बहुत अच्छा था, क्या अच्छा था- तो कोई कष्ट नहीं, सुविधाएं सब प्रकार की थी, सब सम्मान मिलता था। रायबहादुर वगैरह इस प्रकार की पदवियां दी जाती थीं। समाज के संभ्रांत लोग अपने आपको धन्य मानते थे। उस समय के अंग्रेज अधिकारियों के साथ उठना-बैठना तथा चाय-पान करने को एक बड़ा गौरव मानते थे। तो शत्रु को शत्रु न समझना, यह बहुत ही कठिन स्थिति है किसी देश के लिए। अंग्रेज इस देश में कई प्रकार के बीज रोपण करके गये कि यहां का एक समान्य व्यक्ति भी भारत का दिखेगा लेकिन भारत का रहेगा कि नहीं, यह प्रश्न है। यह सामान्य अनुभव हम लोग देखते आये हैं।

अब वर्तमान का दृश्य जब हम देखते हैं तो दोनों प्रकार के आक्रमण हमारे देश पर चल रहे हैं। शस्त्र का सहारा लेकर आतंकवाद यहां प्रवेश कर चुका। और भी भिन्न-भिन्न प्रकार की आर्थिक शक्तियों का इस देश के जीवन में हस्तक्षेप भारत को फिर से अर्थ की दृष्टि से गुलाम बनाने में लगा हुआ है। शस्त्र का सहारा लेकर आतंकवाद के रूप में खुला आक्रमण भी चल रहा है; परन्तु दुर्भाग्य की स्थिति इस समय यह हो रही है कि इस देश में रहने वाले लोगों को ही अपने मित्र बनाकर अपने देश के साथ गद्दारी करने वाले खड़े करते गये। आतंकी घटनाएं होती हैं, मुम्बई, दिल्ली, जम्मू में होती है, या देश में कहीं और होती है, यह इसीलिए होती है क्योंकि उनको सहयोग करने वाले तत्व यहां विद्यमान हैं। यह पिछले आक्रमणों की तुलना में आया हुआ एक नया रूप है। इस देश के अंदर ही उनको सब प्रकार से सहयोग करने वाले लोग हैं। क्या अजमल कसाब बिना किसी सहयोग के ही यहां आया? केवल कसाब की ही बात नहीं है, बल्कि 26/11 में तो 10 पाकिस्तानी आतंकी समुद्री सीमा से देश में घुस आये और मुम्बई में तीन दिन तक रहकर 26/11 को अंजाम दे दिया। यह बिना किसी सहयोग के संभव ही नहीं है। यह सारा कुछ इसलिए हो रहा है कि देश के साथ गद्दारी करने वाली शक्तियां सक्रिय हैं। यह एक बड़ी समस्या है। इसके साथ हम जूझ रहे हैं।

सीमावर्ती देश पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश अपने देश में घुसपैठ कारने की कोशिश करते रहते हैं। एसे सीमावर्ती क्षेत्र पीड़ित हैं। तो ऐसी परिस्थितियां देश के अंदर हैं। देश के जो रणनीतिकार हैं उनका दायित्व बनता है कि अपने देश के लिए रणनीति बनाकर चलें। कोई नीति है क्या, इस प्रकार की नीति बनाने वाले जो लोग हैं उनकी प्रामाणिकता पर, देशभक्ति पर प्रश्नचिन्ह कभी-कभी लगाये जाते हैं। क्या वे प्रामाणिकता से देशहित को सामने रखकर रणनीति बनाने में लगे हुए हैं, यह सोचना आवश्यक है।

यह बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनैतिक-तात्कालिक स्वार्थ को सामने रखकर, उसको हिंदू मुस्लिम का संघर्ष बताकार उसको राजनीतिक पाले में डाल दो, यह एक बड़ी आदत है। अब कश्मीर के बारे में कोई बोलेगा, घुसपैठ और आतंकवाद के बारे में कोई बोलेगा तो वह साम्प्रदायिक है। वह इस्लाम का विरोधी है। ऐसी छवि निर्माण करने का प्रयास हो रहा है।

प्रश्न के मूल में जाकर, उसको समझकर, समस्या निवारण के प्रति योजना या रणनीति बनाने की बजाय अपने राजनीतिक स्वार्थ को सामने रखकर क्षणिक लाभ देनेवाली बातें करते रहना, दुर्भाग्य से कुछ राजनीतिक दलों ने अपनी भूमिका इस प्रकार की बनायी है।

अब इस राष्ट्र के बारे में, देश की समस्याओं के बारे में बोलना भी राजनीतिक हो गया है, वह राष्ट्रीय नहीं रहा। यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रीय मुद्दों को उठा रहा है तो वह राजनीतिक हो गया। क्या राष्ट्रहित से जुड़े हुए मुद्दों को जनजागरण की दृष्टि से उठाने में कोई चुनावी लाभ निहित है? किसी राजनैतिक क्षेत्र को प्रभावित करने के लिए है? ऐसे कुछ संकुचित स्वार्थ को लेकर क्या प्रश्न उठाये जाते हैं? जनसामान्य की देशभक्ति पर इस प्रकार की आशंकाएं प्रकट करना क्या देश की मानसिकता को दुर्बल करने वाला सिद्ध नहीं होगा? परन्तु इतना प्रामाणिकता से विचार करने के लिए किसके पास समय है, यह सोचने की आवश्यकता रहेगी।

भारत की शैली रही है बाचतीत करो, वार्तालाप करो, समझौता करो। यह पद्धति तो श्रेष्ठ है। इस इक्कीसवीं सदी में, आज के इस वैज्ञानिक युग में, एक विकसित मानव-जीवन के कालखंड में वार्तालाप करते हुए, गलतफहमियां दूर करते हुए, मनुष्य का जीवन सुख-शांति से चले, यह समय की मांग है। परन्तु बातचीत करने वाले को दुर्बल माना जाता है, शक्ति नहीं है तो बात करने आये हैं। जो शांति का मार्ग लेकर चले हैं और सबको मिलकर चलने की बात करते हैं, सबकी अस्मिताओं का संरक्षण करते हुए अपना-अपना देश अपने-अपने ढंग से चलता रहे, ऐसी बात करना दुर्बलता का प्रतीक माना गया है! इस प्रकार की एक गलत सोच विकसित हुई है।

भारत मित्रता चाहता है, सबसे मित्रता का इच्छुक है। समानता के आधार पर, हम अपनी छोटी भूमिका लेकर नहीं, और कुछ बातों में हम श्रेष्ठ भी हैं, इस भाव को लेकर भारत को खड़ा होना पड़ेगा। ऐसे रणनीतिकार भारत के चाहिए। इस भाव को प्रबल करने वाले लोग सत्ता में बैठने चाहिए। किसी भी प्रकार की देशहित के साथ समझौता करने वाली राजनीतिक शक्तियों को समाज में जागृत होकर पराभूत करने की आवश्यकता है। उनके सारे षड्यंत्रों का पर्दाफाश करने की आवश्यकता है।

वर्तमान में कई प्रश्नों के बारे में उदासीनता का वातावरण है। ऐसे प्रश्नों के निवारण के लिए समाज को कुछ करना चाहिए, इसके प्रति उदासीनता है। उदासीनता तो है ही, अज्ञानता भी है, हम कई बातों को जानते ही नहीं। इसके बारे में समाज को जागृत करना चाहिए, इसकी आवश्यकता है। यह जो कश्मीर का प्रश्न है, हिंदुस्तान, पाकिस्तान का प्रश्न है, ऐसा जो माना जाता है। ठीक है पाकिस्तान सारी समस्याओं की जड़ में है, लेकिन क्या यह प्रश्न हमारा नहीं है, देश का नहीं है, देश के रणनीतिकारों का नहीं है। देश के अंदर राष्ट्रभाव को जागृत करते हुए, उदासीनता को दूर करते हुए प्रश्नों को दूर करने के लिए, प्रश्नों का हल ढंढने के लिए समाज के अंदर शक्ति का जागरण करना पड़ेगा। यह काम एक चुनौती है, एक आह्वान है। इसको लेकर हम जायेंगे, हम खड़े हैं। कभी-कभी लोग कहते हैं कि हो गया, अब बहुत हो गया, कितने बार कश्मीर को लेकर आंदोलन करेंगे। इस प्रश्न का भी सरल शब्दों में यही उत्तर है कि जब तक कश्मीर समस्या हल नहीं होगी, यह प्रश्न बार-बार उठता रहेगा। इसके लिए हम निरंतर प्रयास करेंगे।

लोग बड़ी सहजता से कह देते हैं कि जो नियंत्रण रेखा है, एलओसी है, उसको अंतरराष्ट्रीय सीमा मान लो। क्यों झगड़ा करना। पड़ोसी देश है। बड़ा गरीब है। बड़े पिछड़ा हुआ है। भारत से ज्यादा पाकिस्तान में दर्दनाक घटनाएं होती हैं। क्या ऐसी सामान्य बुद्धि को लेकर विदेशी शक्ति की उदण्डता को देखते रहेंगे? देश के प्रश्नों के बारे में कठोरता से कहना पड़ता है, कदम उठाने पड़ते हैं। ऐसी सरकार चाहिए। अपने अस्मिता और सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं। इस प्रकार की शक्ति का भाव का जागरण निरंतर करेंगे। प्रश्नों को लंबित करते जाओ, प्रश्नों की उपेक्षा करते रहो, ऐसे आत्मविश्वास से शून्य, इस प्रकार का परिचायक जो व्यवहार होता है, इससे सब लोगों को मुक्त करना, यह संकल्प हम लोगों ने लिया है।

हम कश्मीर के प्रश्न को लेकर जाएंगे। लोकतंत्र में शासन जनशक्ति को ही समझता है। ऐसे प्रश्नों पर शासन जनशक्ति को ही समझता है। हमारा भी दायित्व बनता है कि हम जनशक्ति का प्रकटीकरण करें, जनशक्ति को खड़ा करें। और आवश्यकता पड़ती है तो शक्ति का लोकतांत्रिक प्रदर्शन करने की भी तैयारी करें।

(उपरोक्त आलेख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश जोशी उपाख्य भैयाजी द्वारा ‘जम्मू-कश्मीर : तथ्य समस्याएं एवं समाधान’ नामक कार्यशाला में व्यक्त विचारों का मूलरूप है। इसका आयोजन 19 व 20 नवम्बर 2011 को ‘जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र’ के तत्वावधान में नागपुर स्थित रेशिमबाग में किया गया था।)

सोमवार, दिसंबर 12, 2011

साम्प्रदायिक हिंसा बिल के खिलाफ होगा देशव्यापी आंदोलन

पवन कुमार अरविंद, नई दिल्ली

भारतीय संस्कृति सभा के तत्वावधान में दिल्ली स्थित ज्वालामुखी मंदिर में आयोजित दो दिवसीय ‘अखिल भारतीय शीर्ष संत समागम’ ने एक स्वर से “साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा विधेयक - 2011” का विरोध करते हुए राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) को तत्काल भंग किये जाने की मांग की।

समागम में पारित प्रस्ताव में विधेयक को देश को तोड़ने वाला, असंवैधानिक, हिंदू एवं मुस्लिमों को बांटने वाला, देश के हिंदुओं को गुनहगार मानकर विश्व में सहिष्णु हिंदु संस्कृति को बदनाम करने वाला, दंगाई, जेहादी, व्यवहार को प्रोत्साहन एवं हिंसा करने के बाद संरक्षण देने वाला, देश के प्रशासन के ऊपर इस कानून के द्वारा नई असंवैधानिक व्यवस्था खड़ी करने वाला बताया गया।

इस दौरान विशेष रूप से आमंत्रित किये गये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव मधुकर भागवत ने कहा कि विश्व में धर्म की एकमात्र शक्ति भारत बची है, जो अन्य मजहबों के लोगों को अपने मार्ग का रोड़ा लगता है, उनकी मंशा पूरी हो सके इसके लिए वे भारत को तोड़ने में लगे हुए हैं।

उन्होंने कहा कि प्रस्तावित विधेयक देखने से स्पष्ट हो जाता है कि यह अन्याय को न्याय बनाने वाला, प्रशासन को पंगु और पंचमहापातक को नियम बनाने वाला विधेयक है। संघ प्रमुख ने कहा कि संत समाज के विरोध के कारण वे विधेयक में कुछ परिवर्तन की बात करने लगे हैं किंतु यह ऐसा ही है मानो ताड़का को पूतना के रूप में प्रस्तुत किया जाए।

डॉ. भागवत ने उपस्थित संत समुदाय से अपील की कि इस विधेयक को खारिज करवाने के लिए बड़ा शक्ति प्रदर्शन करना होगा जिसके लिए पूरी तैयारी रखनी है। इसके लिए आवश्यक जनजागरण की विस्तृत योजना संत समाज तय करे जिसमें संघ पूरी तरह सहभागी होगा।

कार्यक्रम के उपरांत संवाददाताओं से बातचीत करते हुए विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अशोक सिंहल ने कहा कि परिषद इस विधेयक सहित देश में तुष्टीकरण के प्रत्येक प्रयास का कड़ा विरोध करेगी।

उन्होंने कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में प्रधानमंत्री से मिलने गये 25 कांग्रेसी सांसदों के प्रतिनिधिमंडल द्वारा 12वीं पंचवर्षीय योजना में मुस्लिम समुदाय के लिए 15 प्रतिशत बजट आवंटन का विशेष प्रावधान किये जाने को तुष्टीकरण की पराकाष्ठा करार दिया।

प्रस्ताव में कहा गया है, “इस विधेयक से देश के मंदिर, संत, रामलीला, गणेशोत्सव तथा हिंदुओं के अन्य धार्मिक कार्यक्रम, हिंदुओं की सामाजिक धार्मिक संस्थाएं, हिंदुओं के व्यापार, जेहादियों के दया पर निर्भर हो जायेंगे। संतों की यह सभा देश के सभी संत, सभी सामाजिक-धार्मिक बिरादरी की संस्थाओं का आह्वान करती है कि इस विधेयक के खिलाफ देशव्यापी जनजागरण एवं आदोलन हो और दिल्ली में भी प्रदर्शन की तैयारी हो।”

समागम में संतों ने संकल्प व्यक्त किया और कहा कि इस विधेयक को किसी भी कीमत पर कानून का रूप नहीं लेने देंगे। इसके लिए देश की जनता किसी भी प्रकार के बलिदान के लिए तैयार है। संतों के इस प्रस्ताव को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद सहित देश के लगभग सभी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक संगठनों ने अपना खुला समर्थन व्यक्त किया।

शुक्रवार, नवंबर 18, 2011

पुस्तक समीक्षा

राष्ट्र निर्माण में संन्यासियों की महती भूमिका है

पवन कुमार अरविंद

इस धरा पर भारत ही एक ऐसा देश है जिसका नेतृत्व राजसत्ता ने कभी नहीं किया। हमारा समाज सदैव धर्म के आधार पर ही टिका रहा। राजाओं के युद्ध चलते रहते थे। कोई क्षेत्र कभी इधर, कभी उधर आता-जाता रहा होगा; परंतु समाज इन सब बातों से अलिप्त रहता था। गांव की व्यवस्था, कुलधर्म, व्यक्तित्व सब यथावत चलते रहते थे। देश में अनेक आततायी राज्यकर्ता आये और चले गये। समाज ने कष्ट भोगा; पर समाप्त नहीं हुआ। परम्पराओं में, संस्कारों में कुछ विरलता आई होगी; परन्तु पूर्णत: लुप्त नहीं हुई। साधु-संतों ने अत्याचारी शासक को समाप्त कर, उसी कुल के एक सात्विक वृत्ति के व्यक्ति को राज्य का भार सौंपा।

आचार्य चाणक्य, समर्थ गुरु रामदास, गुरुनानक, देव जी महाराज, सूरदास, तुलसीदास, संत रविदास... ये तो कुछ चिर-परिचित नाम हैं जिन्होंने अपने-अपने काल में समाज के मनोबल को बनाये रखा। ये सभी भारत की महान विभूतियां हैं। इसके अलावा और भी विभूतियां हैं लेकिन उनका नाम ज्यादा प्रकाश में नहीं आ पाता। इन प्रचलित विभूतियों के साथ ही ‘लुप्त विभूतियों’ को भी प्रकाश में लाने का कार्य वरिष्ठ पत्रकार व सुपरिचित लेखक श्री विजय कुमार ने अपनी नई पुस्तक ‘सेवा पथ पर संन्यासी’ में बखूबी किया है।

पुस्तक में कुल 152 पृष्ठ हैं। इसमें स्वामी रामसुखदास, स्वामी विवेकानंद, महेश योगी, स्वामी रामभद्राचार्य, दादा लेखराज, रघुवीर समर्थ, स्वामी प्रणवानंद, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, महात्मा रामचंद्र वीर, तुड़को जी महाराज, तुलसीराम प्रभु, भगत पूर्ण सिंह और स्वामी निगमानंद, दंडी स्वामी विरजानंद, हरिवंश महाप्रभु, बाबा बुड्ढा, स्वामी हरिदास, रमण महर्षि, पंडित श्रद्धाराम फिल्लौर, महानामव्रत जी और स्वामी विद्यागिरि सहित कुल 71 साधु-संतों की जीवनी व राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान का संकलन है।

पुस्तक का नाम : सेवा पथ पर संन्यासी
लेखक : विजय कुमार
प्रकाशक : साहित्य एवं दृक् श्राव्य सेवा न्यास, नई दिल्ली।
पृष्ठ : 152, मूल्य : 75/-

शुक्रवार, अक्तूबर 14, 2011

'ज्यादा स्वायत्तता' का अर्थ है, कल की स्वतंत्रता

पवन कुमार अरविंद

कश्मीर मसले पर वार्ताकार पैनल ने अपनी रिपोर्ट भले ही केंद्रीय गृह मंत्रालय को सौंप दी है, लेकिन इसकी सिफारिशों पर अमल सर्वदलीय बैठक के बाद ही होगा। क्योंकि सरकार किसी भी विवाद का जिम्मा अकेले अपने ऊपर क्यों लेना चाहेगी? हालांकि, पिछले वर्ष 20 सितम्बर को हालात का जायजा लेने दो दिवसीय दौरे पर जम्मू-कश्मीर गये 39 सदस्यीय सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल की सिफारिश पर ही वार्ताकार पैनल के गठन का फैसला किया गया था। इस कारण भी इसकी संभावना बनती है कि केंद्र सरकार इसके लिए सर्वदलीय बैठक बुलाएगी। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम कर रहे थे, जिसमें संसद के दोनों सदनों- लोकसभा व राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष क्रमश: सुषमा स्वराज व अरुण जेटली, लोजपा प्रमुख रामबिलास पासवान सहित अन्य पार्टियों के नेता शामिल थे।

केंद्र ने 12 अक्टूबर 2010 को वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर के नेतृत्व में तीन सदस्यीय वार्ताकार पैनल का गठन किया था। इसके दो अन्य सदस्य शिक्षाविद् प्रो. राधा कुमार और पूर्व सूचना आयुक्त एम.एम. अंसारी थे। गृह मंत्रालय ने वार्ताकारों को कश्मीर समस्या का विस्तृत अध्ययन कर इसके समाधान का रास्ता सुझाने के लिए कहा था। पैनल ने अपने एक वर्षीय कार्यकाल के अंतिम दिन यानी 12 अक्टूबर 2011 को अपनी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को सौंप दी।

रिपोर्ट सौंपने के बाद वार्ताकारों में से एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि राज्य को और अधिक स्वायत्तता देने की सिफारिश की गयी है, पर यह 1953 के पहले जैसी नहीं होगी। हालांकि, तीनों वार्ताकारों- पडगांवकर, अंसारी और राधा कुमार ने रिपोर्ट के तथ्यों के बारे में अधिकृत रूप से कुछ भी बताने से इन्कार किया।

इस संदर्भ में जम्मू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. हरिओम का कहना है कि अगर रिपोर्ट स्वायत्तता की पैरवी करती है तो इसके नतीजे भयानक होंगे। जम्मू, लद्दाख के लिए अलग रीजनल काउंसिल बने तो यह ठीक रहेगा, लेकिन इसका स्वरूप क्या होगा, कहा नहीं जा सकता है।

हालांकि, कश्मीर समस्या के समाधान के निमित्त विगत दस वर्षों में केंद्र का यह कोई प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने श्रीनगर में 24 व 25 मई 2006 को आयोजित राउंड टेबिल कान्फ्रेंस में कश्मीर समस्या पर गहन विचार विमर्श के लिए पांच कार्यदल गठित किये थे। ‘बेहतर प्रशासन’ पर गठित कार्यदल के प्रमुख एन.सी. सक्सेना, ‘आर्थिक विकास’ पर सी. रंगाराजन, ‘नियंत्रण रेखा के आर-पार सम्बंध विकसित करने’ एम.के. रसगोत्रा तथा ‘विश्वसनीयता बढ़ाने के प्रश्न’ पर मोहम्मद हामिद अंसारी (अब उप-राष्ट्रपति) के नेतृत्व वाले कार्यदलों ने अपनी-अपनी रिपोर्ट 24 अप्रैल 2007 को केंद्र को सौंपी थी।

पांचवे कार्यदल के प्रमुख थे- जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सगीर अहमद। न्यायमूर्ति अहमद ने अपनी रिपोर्ट में स्वायत्तता को अलगाववादी मांग नहीं माना और लिखा कि स्वायत्तता को बहाल करने के सम्बंध में प्रधानमंत्री स्वयं अपना तरीका व उपाय तय करें। उन्होंने अनुच्छेद 370 के अस्थाई दर्जे पर अंतिम फैसले की भी पैरवी की थी और कहा कि केन्द्र राज्य के बेहतर सम्बन्धों के लिये अनुच्छेद 370 पर अंतिम फैसला जरूरी है।

10 जनवरी 2010 को जम्मू में हुई बैठक में राज्य विधानसभा के सदस्यों- हर्षदेव, डॉ. अजय, अश्विनी कुमार, शेख अब्दुल रहमान और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने रिपोर्ट को फर्जी और नेशनल कांफ्रेंस का एजेण्डा करार दिया था। इस पर जेटली ने सवाल उठाते हुए कहा था कि सितम्बर 2006 के बाद कार्यदल की कोई बैठक नहीं हुई तो यह रिपोर्ट कहां से आ गयी?

दरअसल, जेटली का तर्क उचित ही था क्योंकि न्यायमूर्ति सगीर लम्बे समय से बीमार थे और कार्यदल की बैठकों में शामिल नहीं हो पाये थे। इस रिपोर्ट में नेशनल कांफ्रेंस की मांगों की शब्दावली है। उस समय यह चर्चा जोरों पर थी कि क्या इस रिपोर्ट को नेशनल कान्फ्रेंस के राजनैतिक इस्तेमाल के लिए ही कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार ने तैयार करवाया है?

जम्मू-कश्मीर मामले के अध्ययन के लिए पूर्व केंद्रीय विधि मंत्री राम जेठमालानी की समिति भी कार्य कर चुकी है। राज्य के वर्तमान राज्यपाल एन.एन. वोहरा भी कश्मीर पर केंद्र के वार्ताकार रह चुके हैं। सभी रिपोर्टों में कश्मीर समस्या की जटिलता की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वैसे मौजूदा वार्ताकारों की रिपोर्ट में क्या है, इसकी जानकारी इसके सार्वजनिक होने के बाद ही पता चलेगी, लेकिन चर्चा इस बात की भी है कि वार्ताकारों की रिपोर्ट विगत वर्षों में आयी न्यायमूर्ति सगीर सहित विभिन्न समितियों की रिपोर्टों से भिन्न नहीं होगी। यानी आज की ‘ज्यादा स्वायत्तता’ का मतलब है, कल की स्वतंत्रता।

बुधवार, अक्तूबर 12, 2011

कश्मीर पर निरर्थक बातें

पवन कुमार अरविंद

जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग और देश का सीमावर्ती राज्य है। इस राज्य पर पड़ोसी देशों- पाकिस्तान और चीन ने 15 अगस्त 1947 के बाद पांच हमले किये हैं। इसमें चीन का एक हमला शामिल है। पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी समूह जम्मू-कश्मीर में अब भी घुसपैठ की फिराक में सदैव रहते हैं। पाकिस्तान से सटे जम्मू-कश्मीर की सीमा पर तैनात भारतीय सैन्य बलों द्वारा आतंकियों से निपटना अब उनकी नियमित दिनचर्या का एक हिस्सा बन गया है।

सुरक्षा की दृष्टि से जम्मू-कश्मीर ही नहीं बल्कि देश के किसी भी सीमावर्ती राज्य को सेना से मुक्त करना घातक है, साथ ही अव्यवहारिक भी। चाहे कश्मीर में पूरी तरह सामान्य स्थिति ही बहाल क्यों न हो जाये, अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए जम्मू-कश्मीर में सैन्य बल को सदैव तैनात रहना ही चाहिए। सामान्य स्थिति बहाल होने के बाद सेना अपनी बैरकों में वापस जा सकती है, लेकिन इस अवस्था को विसैन्यीकरण नहीं कहा जा सकता। जो लोग जम्मू-कश्मीर के विसैन्यीकरण की मांग कर रहे हैं, वे देश का अहित कर रहे हैं। ऐसे लोग देश विरोधी और पाकिस्तान समर्थक हैं।

पाकिस्तान क्यों नहीं चाहेगा कि उसके अधिकार क्षेत्र में भारतीय राज्य जम्मू-कश्मीर भी आ जाए। इसमें उसकी हानि क्या है? मुफ्त का चंदन घिस मेरे नन्दन। पंडित जवाहर लाल नेहरू की गलती के कारण जम्मू-कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में पहले से ही है। उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर के जम्मू क्षेत्र का लगभग 10 हजार वर्ग किमी. और कश्मीर क्षेत्र का लगभग 06 हजार वर्ग किमी. पाकिस्तान के कब्जे में है। चीन ने 1962 में आक्रमण करके लद्दाख के लगभग 36,500 वर्ग किमी. पर अवैध कब्जा कर लिया। बाद में पाकिस्तान ने भी चीन को 5500 वर्ग किमी. जमीन भेंटस्वरूप दे दी, ताकि बीजिंग उसका सदैव रक्षक बना रहे।

विगत दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान के स्थायी मिशन के काउंसलर ताहिर हुसैन अंदराबी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक बहस के दौरान कहा, "जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है और न ही यह कभी रहा है।" इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के उप स्थायी प्रतिनिधि रजा बशीर तरार ने कहा, “दक्षिण एशिया में जम्मू-कश्मीर के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को सुरक्षा परिषद के कई प्रस्तावों में मंजूर किया गया है।”

यह सर्वविदित है कि जम्मू-कश्मीर, पाकिस्तान के पैदा होने पूर्व से ही भारत का अभिन्न अंग है। यह महाराजा हरि सिंह द्वारा 26 अक्टूबर 1947 को किये गये विलय-पत्र पर हस्ताक्षर से ही भारत का अंग नहीं बना, इस्लामी आक्रांताओं के हमलों के पूर्व भी यह भारत का ही अभिन्न अंग था। यहीं उत्तरवैदिक काल में देश के कोने कोने से आए 6 दार्शनिकों ने पिप्पलाद ऋषि से सृष्टि रहस्यों पर तर्क किये थे। इन्हीं प्रश्नों-प्रतिप्रश्नों का संग्रह विश्वख्यात दर्शन ग्रन्थ ‘प्रश्नोपनिषद्’ है। कल्हड़ की राजतरंगिणी भी इसी मिट्टी की पैदाइश है। जम्मू कश्मीर भारतीय संस्कृति और दर्शन की प्राचीन भूमि है। जबकि 15 अगस्त 1947 के पहले पाकिस्तान का कहीं कोई अस्तित्व नहीं था। ऐसे में पाकिस्तानी अधिकारियों- हुसैन अंदराबी और रजा बशीर का कथन भ्रामक और झूठ का पुलिंदा तो है ही, हास्यास्पद भी है।

कश्मीर के संदर्भ में जहां तक जनमत-संग्रह का प्रश्न है, तो देश और विदेश में बहुत लोग ऐसे हैं जो यह मानते हैं कि कश्मीर समस्या के समाधान के रूप में जनतम-संग्रह की मांग एकदम व्यर्थ है। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र के दो महासचिवों ने भी कहा था कि जनमत-संग्रह की मांग अब अप्रासंगिक हो गया है। पाकिस्तान के तत्कालीन तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ ने भी जनमत-संग्रह की बात को खारिज करते हुए कश्मीर समस्या के समाधान के लिए एक अलग ही फॉर्मूला पेश किया था। हालांकि उनका फॉर्मूला भी विवादित ही था। लेकिन पाकिस्तानी खर्चे पर पलने वाले कश्मीरी अलगाववादी व उनके समर्थक अब भी जनमत-संग्रह और आत्म-निर्णय का राग अलाप रहे हैं, यह हास्यास्पद है।

सवाल कश्मीर में जनमत-संग्रह या आत्म-निर्णय का नहीं, बल्कि यह है कि क्या पाकिस्तान का निर्माण आत्मनिर्णय या जनमत-संग्रह के आधार पर हुआ था? यदि ऐसा हो तो कश्मीर में भी होना चाहिए। लेकिन यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि आज यदि पाकिस्तान में जनमत-संग्रह कराया जाये तो शांति के पक्षधर अधिकांश पाकिस्तानी भारत में मिलने के लिए अपना मत प्रकट करेंगे। यदि अखंड भारत में जनमत-संग्रह या आत्म-निर्णय के आधार पर पाकिस्तान निर्माण का फैसला हुआ होता तो आज पाकिस्तान का अस्तित्व ही नहीं होता। तो फिर कश्मीर के संदर्भ में जनमत-संग्रह या आत्म-निर्णय का प्रश्न कहां से खड़ा किया जा रहा है?

सोमवार, अक्तूबर 10, 2011

नक्सली ही हैं विनायक सेन

पवन कुमार अरविंद

मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. विनायक सेन नक्सली ही हैं। उनको निकट से जानने वाले के लिए इसमें कोई किंतु-परंतु की बात ही नहीं है। भले ही इस देश की सर्वोच्च अदालत ने पिछले दिनों उनको जमानत पर रिहा कर दिया हो, लेकिन मात्र जमानत के कारण ही कोई आरोपी दूध का धुला नहीं कहा जा सकता है। हालांकि मामले में अंतिम फैसला आना शेष है। जमानत का आधार तर्क और सबूत होते हैं; लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा कि अभियोजन पक्ष के हाथ वे सबूत नहीं लग सके जो विनायक सेन को उचित और कठोर दण्ड दिलवाने में मदद करते। क्या छत्तीसगढ़ सरकार की डॉ. सेन से कोई जातीय दुश्मनी थी, जो उनके खिलाफ उठ खड़ी हुई? वहां की सरकार तो पिछले कई वर्षों से हिंसक नक्सली गतिविधियों के खिलाफ जूझ रही है और राज्य में शांति व्यवस्था की स्थापना के लिए कटिबद्ध है।

सबसे दु:खद है कि शीर्ष अदालत से जमानत मिलने के बाद केंद्र की कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार ने उनको योजना आयोग की स्वास्थ्य संबंधी सलाहकार समिति का सदस्य नामित कर दिया। केंद्र का यह रवैया घातक ही साबित हो रहा है। क्योंकि रिहाई के बाद सेन पुन: नक्सली गतिविधियों में प्राण-पण से लग गये हैं। सेन की नक्सल गतिविधियों के संदर्भ में खुफिया ब्यूरो (आईबी) ने अभी हाल में एक रिपोर्ट केंद्रीय गृह मंत्रालय को सौंपी है। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि रिहाई के बाद सेन नक्सली गतिविधियों में पूरी तरह सक्रिय हैं और सरकार के खिलाफ रणनीति बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि इस रिपोर्ट के पहले आईबी ने पिछले पांच महीने में कई बार विनायक सेन की हर गतिविधि के बारे में गृह मंत्रालय को लगातार सूचित किया था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गयी।

आईबी के अनुसार, सेन ने 10 सितंबर को डेमोक्रेटिक राइट आर्गनाइजेशन की बैठक में भी हिस्सा लिया था। यह नक्सलियों के 20 संगठनों का शीर्ष संगठन है। कोलकाता में हुई इस बैठक में सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून और गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम कानूनों को हटाने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू करने का फैसला किया गया। हैरानी की बात यह है कि आईबी की रिपोर्ट के बावजूद अभी तक विनायक सेन की योजना आयोग की सलाहकार समिति की सदस्यता को रद्द करने की कोई पहल नहीं की गई है।

उल्लेखनीय है कि रायपुर की अदालत ने 24 दिसम्बर 2010 को सेन को देशद्रोह का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। न्यायालय ने सेन के साथ दो अन्य लोगों को भी देशद्रोह का दोषी करार दिया था, जिसमें प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) से जुड़े नारायण सान्याल और कोलकाता के तेंदू पत्ता व्यवसायी पीयूष गुहा शामिल हैं। सेन ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में अपील की थी, जिसको न्यायालय ने ठुकरा दी थी। इसके बाद उन्होंने शीर्ष न्यायालय में अपील की, जहां उनको 15 अप्रैल 2011 को जमानत मिल गयी। सेन पर आरोप था कि उन्होंने प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) का शहरों में नेटवर्क ख़डा करने में अहम भूमिका अदा की है। इसके अलावा उन पर बिलासपुर जेल में बंद माओवादी नेता नारायण सान्‍याल की चिट्ठियां अन्‍य माओवादियों तक पहुंचाने के भी आरोप लगे थे। वहीं गुहा पर भी सान्याल का संदेश चोरी-छिपे माओवादियों तक पहुंचाने के आरोप लगे थे।

विनायक सेन को समिति का सदस्य नामित करने पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने गहरी नाराजगी जताते हुए योजना आयोग के पदेन अध्यक्ष प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को पत्र लिखा था। मुख्यमंत्री ने कहा था- “डॉ. विनायक सेन को अदालत ने राजद्रोह का दोषी पाते हुए सजा दी है। वे इसके सहित कुछ और कानूनों के तहत सजा काट रहे हैं। उनकी अपील हाईकोर्ट में लंबित है लेकिन उनकी सजा पर रोक नहीं लगाई गई है। योजना आयोग की साख बहुत महत्वपूर्ण है और इस नाते ऐसी संस्था में डॉ. विनायक सेन को रखा जाना बहुत ही सदमे का मुद्दा है। यह तमाम तौर-तरीकों के खिलाफ भी है क्योंकि उन्हें राज्य के खिलाफ युद्ध छेडऩे के आरोप में सजा मिली हुई है।”

यह एक मान्य सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति जो उम्र कैद की सजा काट रहा है, उसे राष्ट्रीय स्तर की किसी समिति में या ऐसे किसी मंच पर कभी सदस्य नहीं बनाया जाता। देश में ऐसी कोई दूसरी मिसाल भी नहीं है। यह भी कम हैरानी की बाद नहीं है कि इस समिति में रखने के लिए देशभर में योजना आयोग को विनायक सेन से ज्यादा योग्य कोई और व्यक्ति नहीं मिला। पत्र में डॉ. रमन सिंह ने यह भी कहा था कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में डॉ. सेन के योगदान को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है, जबकि हकीकत में ऐसी किसी बात के सुबूत नहीं हैं।

डॉ. रमन सिंह ने प्रधानमंत्री से इस मनोनयन पर पुनर्विचार करने का भी अनुरोध किया था और घोषणा करते हुए कहा- “मैं बहुत भारी मन के साथ यह फैसला ले रहा हूँ कि जब तक विनायक सेन के मनोनयन पर पुनर्विचार नहीं किया जाता, मैं योजना आयोग की बैठकों में हिस्सा नहीं लूंगा।”

अब प्रश्न उठता है कि एक तरफ प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह स्वयं ही कई अवसरों पर नक्सलवाद को इस देश की आंतरिक सुरक्षा और लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बता चुके हैं। ऐसे में एक ऐसी समिति जिसके पदेन अध्यक्ष स्वयं प्रधानमंत्री हैं, में संदिग्ध व्यक्ति को शामिल करना केंद्र द्वारा नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई के सारे दावे को खोखला ही साबित करता है। हालांकि केंद्र नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में छत्तीसगढ़ सरकार की मदद करने की बार-बार दुहाई देता है, लेकिन प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के पत्र पर पुनर्विचार करने को कतई गंभीर नहीं था। फिलहाल चाहे जो कुछ भी हो लेकिन केंद्र की खुफिया एजेंसी आईबी की रिपोर्ट ने मुख्यमंत्री के दावे को और मजबूती प्रदान की है। अत: यह कहा जा सकता है कि आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार का रवैया कांग्रेस की अधोगति का शोकगीत बनेगी। इस कारण कांग्रेस को इतिहास के काले अध्याय में जगह मिलेगी।

शनिवार, सितंबर 17, 2011

कुरसी तू बड़भागिनी

पवन कुमार अरविंद

पुस्तक समीक्षा
व्यंग्य की विधा साहित्य में कुछ विशेष प्रकार की है। जैसे क्रिकेट में सफल गेंदबाज वही है, जिसकी गेंद की गति, दिशा और उछाल का बल्लेबाज को अंतिम समय तक अनुमान न हो पाये। सफल फिल्म और उपन्यास भी वही होता है, जिसका रहस्य और निष्कर्ष, अंत में जाकर ही पता लगता है। इसी प्रकार व्यंग्यकार जो संदेश देना चाहता है, वह प्राय: अंतिम दो तीन वाक्यों में ही स्पष्ट हो पाता है और पाठक को यात्रा करते-करते अचानक अपने लक्ष्य पर पहुंचने जैसी संतुष्टि प्राप्त होती है।

हँसने-हँसाने का रुझान भी अपने में अनूठा होता है। कुछ लोग चुटकुले पढ़ना और उन्हें याद कर ठीक समय पर सुनाने के शौकीन होते हैं। इससे सभा या बैठक का माहौल खुशनुमा होता ही है साथ ही उपस्थित लोगों की थकान भी क्षण भर के लिए छू-मंतर हो जाती है। समाज में कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो बातचीत में कुछ व्यंग्यात्मक बातें प्राय: बोल देते हैं। भले ही वे साफ मन से बोली जायें; पर सुनने वाले बुरा मान जाते हैं। इससे लोगों को कभी-कभार हानि भी उठानी पड़ जाती है। हालांकि, व्यंग्य में थोड़ा सा हास्य भोजन की थाली में, चटनी और अचार जैसा मजा देता है। “मारो कहीं, लगे कहीं” और “कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना” की तरह इन विशेषताओं को ‘कुरसी तू बड़भागिनी’ नामक हास्य-व्यंग्य पुस्तक में बखूबी शामिल किया गया है। इसके लेखक हैं वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार विजय कुमार।

इस पुस्तक की एक दूसरी विशेषता यह है कि इसमें विदेशी भाषाओं का घालमेल नहीं है। हालांकि आजकल हिंदी में विदेशी भाषाओं के घालमेल की एक भेड़चाल सी चल पड़ी है। फिलहाल, लेखक ने इससे यथा संभव बचने का प्रयास किया है। पुस्तक में शामिल लेखों के सामयिक होने के कारण इनकी मार के दायरे में; पुलिस, प्रशासन, पत्रकार, लेखक और व्यापारी, कर्मचारी, चिकित्सक, वकील सब आये हैं।

पुस्तक में छोटे-छोट कुल 48 अध्याय हैं। ये सभी; मोबाइल मीटिंग, कूड़ा जनता के सौजन्य से, राजू उठ, बैट पकड़, मेरे घर के सामने, हम भी मोबाइल हुए, कविता वायरस, डार्विन का विकासवाद, सेक्यूलर चश्मा, राहुल बाथ सोप, विकास का मूल्य, कोड नंबर का जंजाल, डॉक्टर का सेक्यूलर एजेंडा, करोड़ रुपये का इतना अपमान, कहानी नई पुरानी, हनुमान जी के आँसू, बड़े भाइयो सावधान, मैं और मोबाइल चोर, नाई से न नाई लेत..., यह भी कोई चोरी है? और हे भगवान, मैं बच गया; आदि शीर्षकों के अंतर्गत लिखे गये हैं। यह बहुत ही रोचक और हास्य-व्यंग्य की उच्च स्तरीय पुस्तक है। हालांकि पुस्तक में शामिल इन व्यंग्य लेखों की मार और धार कैसी है, इसका वास्तविक निर्णय तो पाठकों को ही करना है।

पुस्तक : कुरसी तू बड़भागिनी

लेखक : विजय कुमार

पृष्ठ 136, मूल्य रु. 175/-

प्रकाशक : सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली

मंगलवार, अगस्त 30, 2011

अलगाववाद को बढ़ाने वाला कदम

पवन कुमार अरविंद

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 28 अगस्त को पत्थरबाजों को ईद का तोहफा देते हुए उनकी माफी का ऐलान तो कर दिया, लेकिन श्रीनगर की ऐतिहासिक जामिया मस्जिद से सटे नौहट्टा पुलिस थाने पर कश्मीर की आजादी के पक्ष में नारेबाजी करते हुए 300 से ज्यादा मोटरसाइकिल सवार पत्थरबाज युवकों ने 27 अगस्त को जिस तरह पेट्रोल बम से हमला कर छह पुलिसकर्मियों को घायल किया; वह दुर्भाग्यपूर्ण है। कश्मीर की आजादी के पक्ष में लगाये गये नारों से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह सब अलगाववादियों के इशारे पर किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में सरकार को पत्थरबाजों को ईद पर रिहा करने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।

यदि 12 सौ के करीब पत्थरबाजों को रिहा कर भी दिया जाता है, तो इसकी क्या गारंटी है कि वह दोबारा अलगाववादियों के बहकावे में आकर कश्मीर की शांति में रोड़ा नहीं बनेंगे। पुलिस स्टेशन या सुरक्षाबलों पर पत्थर से हमले की घटनाएं बीते एक सप्ताह के दौरान कई बार हुई हैं। घाटी के खराब हो रहे हालात के मद्देनजर सरकार को चाहिए कि वह हिरासत में लिए गए पत्थरबाजों को न छोड़े।

विदित हो कि पिछले साल गर्मी के मौसम में इन्हीं पत्थरबाजों के कारण घाटी अशांत रही। इस दौरान करीब 1300 युवकों के खिलाफ पत्थरबाजी, आगजनी और लूटमार के मामले दर्ज किए गए थे। इसमें से कई अब भी फरार हैं। उमर सरकार के नये फरमान के अनुसार, इन युवकों को माफी देते हुए इनके खिलाफ सभी आपराधिक मामले वापस ले लिए जाएंगे। बकौल उमर अब्दुल्ला, यह माफी उन पत्थरबाजों के लिए नहीं है, जो आगजनी और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने व लूटमार करने में शामिल रहे हैं। ऐसे में करीब 100 युवक माफी से वंचित रहेंगे।

इस सदंर्भ में सरकार को कश्मीरी जनता के हित में भी सोचना चाहिए, क्योंकि वह लगातार घाटी बंद और पत्थरबाजों की गतिविधियों से तंग आ चुकी है। वे इस बात से भली भांति परिचित हैं कि उनकी रोजी-रोटी पर्यटन उद्योग पर टिकी हुई है। घाटी में अगर हालात बिगड़ते हैं तो पर्यटकों की संख्या पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। श्री अमरनाथ यात्रा के शांतिपूर्ण ढंग से बीत जाने पर लोगों को लग रहा था कि हालात सामान्य हैं, लेकिन अलगाववादी नेता स्थानीय युवाओं को भड़का कर अपने मंसूबों को हवा देने से बाज नहीं आ रहे हैं। ऐसे में अब्दुल्ला सरकार को पत्थरबाजों के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए, नहीं तो सरकार का ऐसा रवैया उनको अलगाववादी गतिविधियों के लिए और प्रोत्साहित ही करेगा।

रविवार, अगस्त 28, 2011

‘अलगाववाद का पुलिंदा’ होगी वार्ताकारों की रिपोर्ट !

पवन कुमार अरविंद

कश्मीर मसले पर केंद्र सरकार के त्रि-सदस्यीय वार्ताकार पैनल की रिपोर्ट सितम्बर में आने की संभावना है। इस रिपोर्ट के राजनीतिक या कूटनीतिक निहितार्थ क्या होंगे, यह तो समय ही बताएगा; लेकिन पैनल में शामिल दिलीप पडगांवकर और प्रो. राधा कुमार की गतिविधियों के प्रकाश में आने तथा हाल के बयानों ने इस रिपोर्ट को आने से पूर्व ही विवादित बना दिया है। वार्ताकार पैनल के तीसरे सदस्य पूर्व सूचना आयुक्त एम.एम. अंसारी हैं।

वार्ताकार पैनल के प्रमुख दिलीप पडगांवकर ने अफजल गुरू पर चौंकाने वाला बयान दिया था। अफजल संसद पर 13 दिसम्बर 2011 को हुए हमले का मास्टरमाइंड है। इस हमले में 5 आतंकियों और 6 सुरक्षाकर्मियों समेत 12 लोगों की मौत हो गई थी। अफजल की दया याचिका को नामंजूर करने की सिफारिश करने वाली फाइल को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राष्ट्रपति के पास भेज दिया है। इस बात की पुष्टि करते हुए गृह राज्यमंत्री एम. रामचंद्रन ने विगत दिनों राज्यसभा में बताया कि अफजल की दया याचिका से संबंधित फाइल को 27 जुलाई 2011 को राष्ट्रपति के सचिवालय को भेजा जा चुका है। इसके तत्काल बाद पडगांवकर ने कहा कि अफजल की फांसी के संदर्भ में केंद्र सरकार ने गलत समय पर निर्णय लिया है। इसका सीधा असर कश्मीर के शांतिपूर्ण माहौल पर पड़ेगा। जबकि वार्ताकार पैनल की अन्य सदस्य प्रो. कुमार ने कहा कि वे अपनी निजी राय में अफजल की फांसी की सजा से सहमत नहीं हैं। उनका मानना है अफजल को फांसी देने से कश्मीर पर पड़ने वाले असर को इतनी जल्दी समझना मुमकिन नहीं है। इसके लिए इंतजार करना होगा।

वहीं, पैनल के तीसरे सदस्य अंसारी ने पडगांवकर और प्रो. कुमार के बयानों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि अफजल की फांसी का कश्मीर मामले से कोई संबंध नहीं है। ये सीधे तौर पर आतंकवाद से जुड़ा मसला है। अंसारी के मुताबिक, इस तरह की घटनाएं देश के दूसरे हिस्सों में भी घट रही हैं। इन आतंकी घटनाओं को कश्मीर मसले से जोड़ा जाना कतई सही नहीं होगा। विदित हो कि अफजल जम्मू-कश्मीर के सोपोर का रहने वाला है।

हालांकि इससे पहले कश्मीरी अलगाववादी गुलाम नबी फई प्रकरण के प्रकाश में आने के बाद उसके निमंत्रण पर जाने वाले वार्ताकारों की काफी किरकिरी हो चुकी है। इस कारण त्रि-सदस्यीय पैनल की देश के प्रति निष्ठा भी संदिग्ध मानी जाने लगी है। फई वॉशिंगटन स्थित कश्मीरी अमेरिकन कौंसिल (केएसी) का प्रमुख है। वह 1990 से अमेरिका में रह रहा है। उसको कश्मीर मसले पर लाबिंग और पाकिस्तान सरकार व उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए काम करने के आरोप में एफबीआई ने 19 जुलाई को वर्जीनिया में गिरफ्तार किया था। फिलहाल अमेरिकी अदालत ने फई को गहन निगरानी में रखने का आदेश सुनाते हुए 27 जुलाई को जमानत दे दी।

पडगांवकर और प्रो. कुमार पर आरोप लगा था कि उन्होंने फई द्वारा विदेशों में कश्मीर मसले पर आयोजित कई सम्मेलनों में हिस्सा लिया और पाकिस्तान के पक्ष में अपने विचार व्यक्त किये। हालांकि पडगांवकर और प्रो. कुमार के अलावा इस श्रेणी में कई और भारतीय बुद्धिजीवी भी हैं, जिन्होंने समय-समय पर भारत की कश्मीर नीति के खिलाफ बोला। कश्मीर मसले पर फई के सम्मेलनों में भागीदारी पर अंसारी ने पडगांवकर की तीखी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था- “अगर पडगांवकर की जगह मैं होता तो वार्ताकार पैनल से इस्तीफा दे देता।” अंसारी ने प्रो. कुमार पर भी काफी तीखी टिप्पणी की थी। अंसारी की टिप्पणी से नाराज कुमार ने गृह मंत्रालय को अपना इस्तीफा सौंपते हुए दो टूक कह दिया था कि अंसारी के साथ काम करना उनके लिए आसान नहीं होगा। हालांकि उन्होंने मंत्रालय के काफी मान-मनौव्वल के बाद अपना इस्तीफा वापस ले लिया।

ध्यान देने वाली बात है कि अफजल मसले पर नेशनल कान्फ्रेंस, पीडीपी और अलगाववादी संगठन हुर्रियत कान्फ्रेंस ने भी पडगांवकर व प्रो. कुमार के सुर में सुर मिलाया है। पडगांवकर और कुमार का अफजल के संदर्भ में दिया गया यह बयान देश-विरोधी तो है ही; साथ ही आतंकियों के मनोबल को बढ़ाने वाला भी है। उनका बयान प्रत्येक भारतीय को यह सोचने के लिये मजबूर करता है कि क्या वे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के एजेंट तो नहीं हैं?

अब प्रश्न उठता है कि क्या देश का जनमानस कश्मीरी अलगाववादी फई की मेहमाननवाजी का लुफ्त उठाने, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में कश्मीर मसले पर कथित रूप से पाकिस्तान के पक्ष में बोलने, अलगाववादी संगठनों के सुर में सुर मिलाने और पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी अफजल पर बयान देने वाले पडगांवकर और राधा कुमार पर क्या विश्वास किया जा सकता है? कश्मीर समस्या का संभावित हल तलाशने के निमित्त सितम्बर में आने वाली उनकी रिपोर्ट पर क्या सहज ही विश्वास किया जा सकेगा? पडगांवकर व कुमार की गतिविधियों और बयानों से अभी से स्पष्ट होने लगा है कि उनकी कश्मीर मसले पर संभावित रिपोर्ट ‘अलगाववाद का पुलिंदा’ ही होगी!

मंगलवार, अगस्त 23, 2011

आईएसआई के एजेंट भी हो सकते हैं कश्मीर लौटने वाले युवा

वर्ष 1989 के बाद हथियारों का प्रशिक्षण लेने के लिए जम्मू-कश्मीर के कुछ युवा पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) या पाकिस्तान चले गये थे। इस समय उनके वापस लौटने की चर्चाएं जोरों पर हैं। हालांकि केंद्र और राज्य सरकारों का कहना है कि इन युवाओं की वापसी और उनको मुख्य धारा में लाने के लिए गंभीरता से प्रयास करने की जरूरत है। लेकिन यहां प्रश्न यह उठता है कि क्या वापस लौटने वाले युवा भारत के ही हैं, या उनके भेस में कोई दूसरा आंतकी या आईएसआई का एजेंट तो नहीं घुस रहा है। यह सुनिश्चित करना अति आवश्यक है। क्योंकि जो युवा पीओके या पाकिस्तान गये थे, उनका भारत सरकार के पास कहीं कोई रिकॉर्ड नहीं है।

उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर सरकार को आवास एवं पुनर्वास नीति के तहत कई आवेदन मिले हैं और सरकार ने इन युवाओं की वापसी के लिए 28 नामों की सूची भी बनायी है। इनके परिवार वालों ने राज्य सरकार से आग्रह किया था कि उनके संबंधी वापस कश्मीर लौटना चाहते हैं। इन परिवारों को परामर्श दिया गया है कि उनके संबंधी इस्लामाबाद स्थित भारतीय दूतावास से सम्पर्क कर सकते हैं। यहां उन्हें एक अस्थायी दस्तावेज दिया जायेगा। इसके माध्यम से वे बाघा या किसी और बिंदु से सीमा पार कर सकते हैं। उनको नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पार अर्थात् भारत की तरफ लौटने के लिए यात्रा दस्तावेजों का लाभ दिया जा सकता है। इससे संबंधित कुछ प्रमुख बिंदुओं पर पवन कुमार अरविंद ने जम्मू-कश्मीर से जुड़े विद्वानों, वुद्धिजीवियों और पत्रकारों से दूरभाष पर बातचीत की है। प्रस्तुत है अंश-

जम्मू-कश्मीर मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार श्री जवाहर लाल कौल का कहना है- “कश्मीर से जो लोग 1990 के दशक के बाद गये हैं, सबसे मुख्य बात है कि वे एक साथ नहीं गये। अलग-अलग गये हैं। ये पता करना बहुत ही कठिन है कि जो गये, वही लोग वापस आ रहे हैं। क्योंकि जो गये उनके संदर्भ में राज्य और केंद्र सरकारों के पास कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। यदि सही लोग वापस भी आ रहे हैं तो कैसे पता चलेगा कि उनका मन परिवर्तित हो गया है और वे अब आतंकवाद की तरफ कभी नहीं लौटेंगे। वे सामान्य जीवन जीना चाहते हैं। पिछले वर्षों में यह देखा गया है कि पाकिस्तान से वापस लौटने वाले कुछ युवक फिर से आतंकी गतिविधियों में लिप्त पाये गये। प्रबल संभावना इस बात की भी है कि वापस लौटने वालों की आड़ में पाकिस्तान और अलगाववादी तत्व अपने जासूस भी भेज सकते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार क्या कर सकेगी? इसलिए इस मसले पर सोच समझकर निर्णय लिए जाने की आवश्यकता है।”

जम्मू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. हरिओम का कहना है- “युवाओं की कश्मीर वापसी पाकिस्तान की एक चाल है। ये युवा यहां आकर कश्मीरी अलगाववादियों को मजबूती ही प्रदान करेंगे। यह देश के हित में नहीं है।”

जम्मू में पंजाब केसरी से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार श्री गोपाल सच्चर का कहना है- “यह एक बहुत लंबा और टेढ़ा विषय है। क्योंकि यह स्पष्ट नहीं है कि कितने लोग कश्मीर से पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) या आजाद कश्मीर गये हैं। वहां क्या करते हैं? क्यों वापस आना चाहते हैं? बड़ा प्रश्न यह है कि इन युवाओं को जिन लोगों या आतंकी समूहों ने आतंकवाद का प्रशिक्षण दिया, वे उन लोगों को पुन: कश्मीर लौटने देंगे। यदि लौटने देंगे तो किन शर्तों पर, इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? इसके साथ ही बहुत से युवा ऐसे भी हैं, जिन्होंने शादी कर ली है, उनके बच्चे भी हैं। उनके बच्चे कैसे आ सकते हैं यहां? यदि वे आते हैं तो कहां के नागरिक कहे जायेंगे? दूसरी बड़ी बात यह है कि लौटने वालों को सरकार नौकरी देने की बात कर रही है। जबकि राज्य में लाखों बेरोजगार युवा पहले से ही मौजूद हैं। बेरोजगार युवा सोचेंगे कि जो वापस आये उनको तो नौकरी मिल गयी लेकिन हम पढ़े-लिखे सीधे-साधे लोगों के प्रति सरकार गंभीर नहीं है। इससे तो इन बेरोजगार युवाओं को आतंकी रास्ता अख्तियार करने का प्रोत्साहन ही मिलेगा।”

जम्मू में हिंद उर्दू दैनिक के संवाददाता श्री नरेश ठाकुर ने कहा- “जो आतंकी शिविर चल रहे हैं, वो पाकिस्तान की धरती पर चल रहे हैं। ये शिविर भारत-पाकिस्तान सीमा के अत्यंत निकट हैं। लेकिन इस्लामाबाद इसको मानने को तैयार नहीं है। इन शिविरों के सीमा के अत्यंत निकट होने के कारण आतंकी गतिविधियों में वृद्धि होगी, क्योंकि जो लोग वापस आ रहे हैं उनका उन शिविरों से जान-पहचान होगा ही, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है।”

म्मू-कश्मीर विचार मंच, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अध्यक्ष श्री अजय भारती का कहना है- “यह देश की अखण्डता के लिए खतरा तो है ही विशेषकर कश्मीर घाटी की भोली-भाली गरीब जनता के विरुद्ध किया जानेवाला निर्णय होगा। याद रखना चाहिए कि ये युवक जबरदश्ती पाकिस्तान नहीं गये बल्कि अपनी मर्जी से गये, बंदूक के आकर्षण व आतंकवाद के नशे में दूसरों पर अपना प्रभुत्व जमाने के उद्देश्य से हथियार और अलगाववाद का प्रशिक्षण लेने के लिए गये। आईएसआई जैसी बदनाम संस्था जब भारतीय दूतावास के अधिकारियों तथा पढ़े-लिखे भारतीयों का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों में कर सकती है तो समझना चाहिए कि ये नौजवान जो 20 साल से उनकी गोद में बैंठे हैं, उनका कैसे ‘ब्रेन वाश’ किया होगा। इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। अत: इस देश विरोधी कदम को कभी नहीं उठाना चाहिए।”

‘हिंदुस्थान समाचार’ न्यूज एजेंसी के जम्मू ब्यूरो प्रमुख श्री बलवान सिंह का कहना है- “इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वापस लौटने वाले युवा पुन: सामान्य जीवन जीयेंगे। क्योंकि जो लोग पहले वापस आये उनमें से अधिकांश आतंकी गतिविधियों में लिप्त पाये गये। उनको यहां लाकर बसाना सुरक्षा की दृष्टि से उचित नहीं होगा।”

गुरुवार, अगस्त 18, 2011

सौ प्याज और सौ जूते भी ...

पवन कुमार अरविंद

कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार के नीति नियंताओं को अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रति अपार जन-समर्थन का शायद अंदाजा नहीं था, नहीं तो एक ही सरकार, एक ही मुद्दे पर, एक ही व्यक्ति के समक्ष दो बार शाष्टांग डंडवत् क्यों करती। पहली बार जंतर-मंतर प्रकरण में तो केवल घुटने टेकने से ही काम चल सकता था लेकिन राज्य विधानसभा चुनावों के कारण केंद्र ने शाष्टांग डंडवत् कर मामले को जल्दबाजी में रफा-दफा करना ही उचित समझा।

सरकार के इस रवैये ने अन्ना टीम को प्रोत्साहित ही किया, नहीं तो अन्ना की क्या मजाल जो फिर अनशन करने की सोचते। यह तो केंद्र सरकार के नीति नियंताओं की ही गलती है जिसने सरकार को लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए दस सदस्यीय संयुक्त समिति के गठन पर राजी किया और फिर समिति की कुछ बैठकों के बाद अन्ना टीम को ठेंगा भी दिखा दिया। हालांकि सरकार के ये ‘चौमुखी प्रतिभा के धनी’ नीति नियंता सत्ता के नशे में अपने को ‘बहुमुखी प्रतिभा का धनी’ समझने लगे थे, इसलिए दूसरा अनशन अवश्यंभावी ही था।

अन्ना हजारे ने जब 16 अगस्त के अपने दूसरे चरण के अनशन की घोषणा की तो कांग्रेस के नेता और कुछ मंत्री उनके ऊपर भिन्न-भिन्न कोणों से अमर्यादित हमला बोलने लगे। उनको भ्रष्टाचार में लिप्त भी बताया गया। अपने आरोपों के समर्थन में कांग्रेस नेताओं ने न्यायमूर्ति पी.बी. सावंत आयोग की रिपोर्ट का भी हवाला दिया। पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी तो अपना आपा ही खो बैठे। उन्होंने हमला बोलते हुए कहा था, "अन्ना तुम तो खुद ही भ्रष्ट हो। यह हम नहीं कह रहे हैं बल्कि अदालत की ओर से नियुक्त किये गये जांच आयोग ने ऐसा कहा है।” हालांकि अन्ना पर किये गये इस व्यक्तिगत हमले की चारों तरफ कड़ी आलोचना हुई थी और पार्टी को अपने सुर बदलने पड़े।

इस मसले पर सरकार की जो किरकिरी हुई, उसका प्रत्यक्ष कारण पार्टी और सरकार में शामिल वे लोग हैं जिनको न तो समाज का व्यावहारिक ज्ञान है और न ही जनता के नब्ज का। इसी कारण केंद्र सरकार को वही करना पड़ा जो वह नहीं चाहती थी। अर्थात्- अन्ना के समक्ष एक बार फिर शाष्टांग डंडवत्। इस संदर्भ में यदि यह कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि सरकार ने अन्ना प्रकरण पर ‘सौ प्याज और सौ जूते भी’ वाली कहानी को हूबहू चरितार्थ किया है।

गुरुवार, अगस्त 11, 2011

‘अलगाववाद का पुलिंदा’ होगी पडगांवकर की रिपोर्ट !

पवन कुमार अरविंद

कश्मीर मसले पर केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त त्रि-सदस्यीय वार्ताकार दल के प्रमुख दिलीप पडगांवकर का अफजल गुरू के संदर्भ में दिया गया बयान देश-विरोधी तो है ही; साथ ही आतंकियों के मनोबल को बढ़ाने वाला भी है। उनका बयान प्रत्येक भारतीय को यह सोचने के लिये मजबूर करता है कि क्या वे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के एजेंट तो नहीं हैं? पडगांवकर ने कहा है कि संसद हमले के दोषी अफजल की फांसी के संदर्भ में केंद्र सरकार ने गलत समय पर निर्णय लिया है। इसका सीधा असर कश्मीर के शांतिपूर्ण माहौल पर पड़ेगा।

ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों गृह मंत्रालय ने संसद पर हमले के दोषी अफजल की दया याचिका को नामंजूर करने की सिफारिश करने वाली फाइल को राष्ट्रपति के पास भेज दिया है। इस बात की पुष्टि गृह राज्यमंत्री एम. रामचंद्रन ने राज्यसभा में की। उन्होंने बताया कि अफजल की दया याचिका से संबंधित फाइल को 27 जुलाई 2011 को राष्ट्रपति के सचिवालय को भेजा जा चुका है। विदित हो कि 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हुए आतंकी हमले में 5 आतंकियों और 6 सुरक्षाकर्मियों समेत 12 लोगों की मौत हो गई थी। अफजल इस हमले का मास्टर माइंड है।

यह दूसरा ऐसा अवसर है जब पडगांवकर इस तरह के विवादों में घिरे हैं और उनकी देश के प्रति निष्ठा संदिग्ध हो गयी है। इससे पहले कश्मीरी अलगाववादी डॉ. गुलाम नबी फई प्रकरण पर उनकी काफी किरकिरी हुई थी। पडगांवकर पर आरोप है कि उन्होंने फई द्वारा विदेशों में कश्मीर मसले पर आयोजित कई सम्मेलनों में हिस्सा लिया और पाकिस्तान के पक्ष में अपने विचार व्यक्त किये। हालांकि पडगांवकर के अलाव इस श्रेणी में कई और भारतीय बुद्धिजीवी भी हैं, जिन्होंने समय-समय पर भारत की कश्मीर नीति के खिलाफ बोला।

विदित हो कि फई वॉशिंगटन स्थित कश्मीरी अमेरिकन कौंसिल (केएसी) का प्रमुख है। वह 1990 से अमेरिका में रह रहा है। उसको कश्मीर मसले पर लाबिंग और पाकिस्तान सरकार व उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए काम करने के आरोप में संघीय जांच ब्यूरो (एफबीआई) ने 19 जुलाई को वर्जीनिया में गिरफ्तार किया था। फिलहाल अमेरिकी अदालत ने फई को गहन निगरानी में रखने का आदेश सुनाते हुए 27 जुलाई को जमानत दे दी।

अब प्रश्न उठता है कि कश्मीरी अलगाववादी फई की मेहमाननवाजी का लुफ्त उठाने, सम्मेलनों में कश्मीर मसले पर कथित रूप से पाकिस्तान के पक्ष में बोलने और अब पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी अफजल पर बयान देने वाले पडगांवकर पर क्या विश्वास किया जा सकता है? कश्मीर समस्या का संभावित हल तलाशने के निमित्त सितम्बर में आने वाली उनकी रिपोर्ट पर क्या सहज ही विश्वास किया जा सकेगा? पडगांवकर की गतिविधियों और बयानों से अभी से स्पष्ट होने लगा है कि उनकी कश्मीर मसले पर संभावित रिपोर्ट ‘अलगाववाद का पुलिंदा’ ही होगी !

गुरुवार, जुलाई 28, 2011

फई के बयान से फिर बेनकाब हुआ पाक

उजागर हुआ आईएसआई का अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र

पवन कुमार अरविंद, नई दिल्ली
कश्मीरी अलगाववादी नेता डॉ. गुलाम नबी फई की गिरफ्तारी के बाद से पाकिस्तान भले ही यह कहता रहा हो कि अमेरिका ने फई की गिरफ्तारी इस्लामाबाद को बदनाम करने के उद्देश्य से की है तथा फई से उसका व उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई का कोई लेन-देन नहीं हुआ है, लेकिन अमेरिकी अदालत के बुधवार के फैसले के बाद फई द्वारा जारी लिखित बयान ने स्वयं ही इस्लामाबाद की वास्तविक मनसा स्पष्ट कर दी है। इस बयान में फई ने कहा है कि कश्मीर के लोगों को अमेरिका से डरना नहीं चाहिए। उसने कहा, "मैं कहता हूं कि कश्मीर के लोगों को यह सोच कर डरने की जरूरत नहीं है कि विश्व शक्तियां और खास कर अमेरिका उन्हें निराश करेगा।” अदालत के फैसले के बाद फई के वकील खुर्रम वाहिद ने उसके लिखित बयान की प्रतियां वितरित की। वाहिद ने कहा कि यह बयान अदालत के फैसले के बाद तैयार किया गया है।

फई ने कहा, "जम्मू-कश्मीर राज्य के लोगों के प्रति मेरी आजीवन प्रतिबद्धता रही है चाहे वह किसी भी धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के हों। मेरी प्रतिबद्धता उन्हें अपने भविष्य का फैसला करने के लिए आत्मनिर्णय का अधिकार हासिल करने में मदद करने की है। ईश्वर चाहता है कि मैं आने वाले समय में ऐसा करता रहूं।” इस पत्र में अलगाववादी नेता फई ने अमेरिका के परंपरागत समर्थन तथा दक्षिण एशिया क्षेत्र के प्रति राष्ट्रपति बराक ओबामा के विचारों की सराहना भी की है।

अमेरिकी अटार्नी ने बताया कि 19 जुलाई को गिरफ्तारी के बाद पूछताछ के दौरान फई ने आईएसआई के साथ अपने संबंध और धन मिलने की बात स्वीकार कर ली थी। एफबीआई ने अपने शपथ-पत्र में भी इस बात का जिक्र किया है। फई के उपर्युक्त दोनों बयान यह स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं कि वह कश्मीरी अलगाववाद का न केवल प्रबल समर्थक है, बल्कि उसने अमेरिका में कश्मीर मसले पर पाकिस्तान से धन लेकर उसके पक्ष में माहौल बनाने के लिए सक्रिय रूप से प्रयासरत था।

कश्मीरी मूल के अमेरिकी नागरिक फई को संघीय जांच ब्यूरो (एफबीआई) ने कश्मीर मसले पर लाबिंग और पाकिस्तान सरकार व उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए काम करने के आरोप में 19 जुलाई को वर्जीनिया में गिरफ्तार किया था। वॉशिंगटन स्थित कश्मीर सेंटर या कश्मीर अमेरिकी परिषद (केएसी) के कार्यकारी निदेशक 62 वर्षीय फई पर अमेरिका में भारत के खिलाफ अभियान चलाने और कश्मीर पर पाकिस्तान के लिए लाबिंग करने का आरोप है। संगठन का दावा रहा है कि यह ग़ैर-सरकारी है और अमेरिकियों से ही इसे धन मिलता है। लेकिन एफ़बीआई का कहना था कि 1990 के दशक से लेकर अब तक इस संगठन को पाकिस्तान सरकार और उसकी खुफिया एजेंसी से गैर-कानूनी रूप से 40 लाख डॉलर मिले हैं। इस धन का इस्तेमाल उसने अमेरिका की कश्मीर नीति को प्रभावित करने के लिए किया। केएसी के माध्यम से उसने कश्मीर के लिए लॉबिंग की, सेमिनार आयोजित कराए, अखबारों में लेख लिखे और अमेरिकी नेताओं के साथ बैठकें कीं।

फई की गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तान ने एफबीआई के आरोप को ही खारिज कर दिया और कहा था कि अमेरिकी एजेंसी के आरोप निराधार व मनगढ़ंत हैं। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने अमेरिका पर उसके खिलाफ अपमानजनक अभियान चलाने का आरोप लगाया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि हमने इस्लामाबाद स्थित अमेरिकी दूतावास में अपनी आपत्ति दर्ज करायी है, खासकर पाकिस्तान के खिलाफ अपमानजनक अभियान पर।

ध्यातव्य है कि अमेरिकी अदालत ने बुधवार को फई को ज़मानत देते हुए उसे घर में ही नज़रबंद रखने का आदेश दिया। अदालन ने कहा कि वह अमेरिका से बाहर नहीं जा सकता। उसको इलेक्ट्रॉनिक निगरानी में रखने का भी आदेश सुनाया गया है। इसके लिये उसके पैर में रेडियो टैग बांधा जायेगा। वर्जीनिया प्रांत के एलेक्जेंड्रिया जिला अदालत के मजिस्ट्रेट जॉन एंडरसन ने बुधवार को फई को एक लाख डॉलर के निजी मुचलके पर जमानत का फैसला किया। साथ ही इस मामले में गिरफ्तार उसके दूसरे साथी ज़हीर अहमद से भी मिलने की इजाजत नहीं होगी। अदालत ने फई दम्पति से अपने-अपने पासपोर्ट भी जमा करने के लिये कहा है।

ब्राइलक्रीम और 30 प्लस कोड से फई को मिलता था पैसा
एफबीआई का आरोप था कि फई ने एक विदेशी एजेंट की तरह अमेरिका में काम किया। उसने विदेशी एजेंट रजिस्ट्रेशन एक्ट का उल्लंघन किया है। किसी अन्य देश के लिए छिपे तौर पर एजेंट के रूप में काम करना एक अपराध है। यहां तक कि वह आईएसआई से कोड वर्ड में बात करता था। 'ब्राइलक्रीम' और '30 प्लस' कुछ ऐसे गुप्त कोड थे जिसके माध्यम से आईएसआई और फई के बीच पैसे का लेनदेन होता था। एफबीआइ के मुताबिक, फई का पाकिस्तानी सूत्रधार जावेद अजीद खान ने उससे पूछा था कि क्या तुम्हें सारा सामान मिल गया? इसके जवाब में फई ने कहा था कि 75 मिलीग्राम ब्राइलक्रीम के अलावा उसे सबकुछ मिल गया है।

एफबीआई को संदेह है कि केएसी के माध्यम से अमेरिका कश्मीर को लेकर दुष्प्रचार जारी रखने के लिए फई द्वारा मांगे गए 75 हजार डॉलर के लिए यह कूट भाषा थी। उसी बातचीत में फई ने उससे दो-तीन पीस ब्राइलक्रीम (बालों में लगाने वाला क्रीम) लंदन लेते आने को कहा था। इसके बारे में एफबीआइ को संदेह है कि उसने अपने पाकिस्तानी आकाओं से 20-30 हजार डॉलर की मांग की थी। अगले वर्ष फई ने अपने एक अन्य पाकिस्तानी आका अहमद से पैसे के लिए कूट शब्द शक्तिवर्धक कैप्सूल '30 प्लस' की मांग की। एफबीआइ के मुताबिक, फई ने अपने लिए 30 हजार डॉलर की मांग की थी। इस बातचीत के बाद केएसी के खाते में 10 जनवरी से 28 मार्च के बीच तीन चेक के जरिए 23 हजार डॉलर जमा किए गए। फई के साथ अमेरिकी नागरिक जहीर अहमद को भी इस मामले में अभियुक्त बनाया गया है। दोषी पाए जाने पर दोनों को पांच साल तक कारावास की सजा हो सकती है।

हालांकि, अमेरिका व अन्य देशों में कश्मीर मसले पर लॉबिंग करने वालों में केवल फई व जहीर ही नहीं हैं, इसके अलावा भी कई लोग हैं। एफबीआई के मुताबिक, अमेरिका में आईएसआई के एजेंट पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी नागरिकों की जासूसी कर रहे हैं और ये लोग इन नागरिकों को धमका भी रहे हैं। इस अभियान में मेजर जनरल मुमताज अहमद बाजवा शामिल है जो आईएसआई के सुरक्षा निदेशालय में काम करता है और विदेशों में कश्मीर पर आतंकी संगठनों का कामकाज देखता है। साथ ही न्यूयॉर्क स्थित पाकिस्तानी वाणिज्य दूतावास में काम करने वाला अधिकारी मोहम्मद तस्लीम को आईएसआई का एजेंट बताया गया है। तस्लीम आईएसआई के विचारों से सहमत नहीं होने वाले लोगों की जासूसी करता है और पाकिस्तानी सेना का विरोध करने वालों को धमका रहा है। वह खुद को एफबीआई का एजेंट बताता था। इस पर सीआईए के निदेशक लियोन पैनेटा और आईएसआई प्रमुख अहमद शुजा पाशा के बीच काफी गरम बहस हुई थी। इसके साथ ही पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों के लिए लंदन स्थित नाज़िर अहमद शॉल का जस्टिस फाउंडेशन कश्मीर सेंटर, ब्रुसेल्स व बेल्जियम में अब्दुल मजीद ट्रेंबू का कश्मीर सेंटर यूरोपियन यूनियन प्रमुख रूप से शामिल हैं।

फई की गिरफ्तारी में अमेरिका ने जानबूझकर की देरी
इस संदर्भ में एफबीआई का कहना है कि वह इस साल की शुरुआत में ही फई को गिरफ्तार कर सकता था, लेकिन कुछ राजनैतिक मजबूरियों की वजह से ऐसा संभव नहीं हो सका। इसका अंदाजा स्वत: ही लगाया जा सकता है कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय और सीआईए ने उसे ऐसा करने से रोका होगा। क्योंकि अमेरिका को उस समय अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन के पाकिस्‍तान में होने की जानकारी थी। शायद इसी कारण से अमेरिका पाकिस्‍तान से अपने संबंध खराब करना नहीं चाहता था। इसीलिए एफबीआई को फई को गिरफ्तार करने से रोका गया था। जब अमेरिकी सेना ने आतंकी ओसामा बिन लादेन को पाकिस्‍तान से खोजकर मार डाला उसके बाद से फई की गिरफ्तारी की इजाजत एफबीआई को मिल गई थी। फिलहाल अमेरिका की इस कार्रवाई से इतना साफ हो गया है कि वह सब कुछ अपने हिसाब से करता है। उसे पता था कि फई काफी समय से आईएसआई के लिए काम कर रहा था। उसके बाद भी उसने उसकी गिरफ्तारी में देरी की।

भारतीय एजेंसियों के रेडार पर भी था फई
फई पर भारतीय खुफिया एजेंसियों की नजर काफी पहले से थी। जानकारी के मुताबिक, आईबी 2007 से ही घाटी में जारी उसकी गतिविधियों नजर रखे हुआ था। कश्मीर के डीजीपी ने स्वीकार किया है कि घाटी में कई मामलों में फई का नाम आता रहा है। खासतौर पर भारत विरोधी गतिविधियों के लिए आर्थिक मदद मुहैया कराने के मामले में उसकी अहम भूमिका रही है। उनका कहना है कि फई के खिलाफ बहुत सारी जानकारियां हैं। फिलहाल अमेरिकी जांच एजेंसी की रिपोर्ट की प्रतीक्षा की जा रही है। गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, सैयद अली शाह गिलानी और अन्य अलगाववादी नेताओं ने फई की गिरफ्तारी पर जो प्रतिक्रिया दी, उससे साफ जाहिर है कि वह कश्मीरी अलगाववादियों के बीच में कितना लोकप्रिय था।

शुक्रवार, जुलाई 01, 2011

‘छवि निखार’ के निरर्थक प्रयास

पवन कुमार अरविंद
किसी व्यक्ति, संस्था या सरकार की छवि उसके कर्मों से स्वयं ही निर्मित होती है। इसके लिए कोई अतिरिक्त प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होती। छवि के आकलन का कार्य तो देश और समाज के लोगों का विशेषाधिकार है। लेकिन यदि आप अपनी और सरकार की छवि निखारने का अभियान चला रहे हैं तो इस संदर्भ में यही कहा जायेगा कि आप देश व समाज के लोगों का यह विशेषाधिकार भी छीन लेना चाहते हैं?

व्यक्ति, संस्था या सरकार; जैसा कर्म करेगी, समाज के लोग उसका वैसा ही आकलन करेंगे। लेकिन यदि आप गलत कार्य करते हैं और फिर इसकी सफाई देते हैं कि मैं ईमानदार हूं, मेरी सरकार देशहित में कार्य कर रही है। तो आपके तर्कों को कौन मानेगा ? एक नामी चोर भी स्वयं को ईमानदार ही कहता है, तो क्या पुलिस उसका पीछा करना छोड़ देती है, कदापि नहीं। हालांकि, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह निहायत ही ईमानदार हैं, इस बात से देश के लोग भी सहमत हैं। उनकी ईमानदारी पर किसी को शक नहीं है। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि यदि डॉ. सिंह ईमानदार हैं तो उनकी सरकार अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार क्यों साबित हो रही है ? और यदि सरकार भ्रष्ट है तो उनकी ईमानदारी पर शक क्यों नहीं किया जाना चाहिए ?

जनाब, आप स्वयं और अपनी सरकार को कर्मठ व वगैर-वगैरह कहकर क्या साबित करना चाहते हैं ? आप जैसा कहेंगे उसके अनुसार देश और समाज के लोग आपके संदर्भ में आकलन कतई नहीं करेंगे। मीडिया प्रबंधन से किसी व्यक्ति, संस्था या सरकार की असलियत पर पर्दा कैसे डाला जा सकता है? क्या देश की जनता मूर्ख है कि जो आप कहेंगे वही हूबहू मान लेगी? यदि ऐसा नहीं है तो छवि निखारने का यह प्रयास समय की बर्बाद के सिवाय और कुछ नहीं है ?
मीडिया प्रबंधन के माध्यम से क्या आप एक भ्रष्टाचारी और अत्याचारी सरकार की छवि में चार चांद लगाना चाहते हैं? यह तो सम्भव ही नहीं है। क्या आपके कहने का अभिप्राय यह तो नहीं कि कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार में आज तक का सबसे बड़ा घोटाला हुआ ही नहीं है? यदि यह गलत है तो तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा व उनके कुछ सहयोगी अधिकारी और डीएमके सांसद कनिमोझी तिहाड़ जेल की रोटी क्यों तोड़ रहे हैं? उन सभी आरोपियों की जमानत अर्जी विशेष न्यायालय से लेकर उच्चतम न्यायालय ने क्यों खारिज कर दी है? आपके मौजूदा कार्यकाल में जितने भी घोटाले हुए हैं उसकी जिम्मेदारी से आप कैसे बच सकते हैं?

आप यदि कहेंगे कि “मैं कठपुतली प्रधानमंत्री नहीं हूं।” तो आपकी बात को क्या कोई व्यक्ति सहर्ष स्वीकार लेगा? आखिर आपको मीडिया के कुछ चुनिंदा संपादकों के समक्ष बार-बार यह कहना क्यों पड़ रहा है कि “मेरी सरकार ठीक से कार्य कर रही है, देशहित में कदम उठा रही है।”

यदि कोई व्यक्ति, संस्था या सरकार जनहित के कार्य कर रही है तो कोई ईमानदार सम्पादक अपने लेखों और सम्पादकीय में उसकी चर्चा किये बिना कैसे रह सकता है? यदि वह सम्पादक ईमानदार है तो उसकी चर्चा स्वयं की प्रेरणा से करेगा। इसके लिये किसी प्रबंधन की आवश्यकता नहीं होती। कोई कितना भी बड़ा सम्पादक क्यों न हो वह अपने लाख पृष्ठों की आलेख से भी किसी व्यक्ति की छवि को न तो परिवर्तित कर सकता है और न ही उसमें चार चांद लगा सकता है।

मीडिया प्रबंधन स्वयं में श्रेष्ठ उद्देश्य से किया गया एक श्रेष्ठ कार्य होता है। आप जो कहना चाहते हैं वो बातें उसी अर्थ में समाचार-पत्रों में प्रकाशित हों, उसका उचित कवरेज हो, आपकी कही गयी बातों का कहीं दूसरा अर्थ न निकाल लिया जाये, इसलिए प्रबंधन की आवश्यक होती है। बजाय इसके कि मीडिया प्रबंधन छवि निखार का जरिया बने, यह तो निरर्थक प्रयास है। मीडिया जगत के अधिकांश लोग यह मानने को कतई तैयार नहीं है कि सम्पादकों के साथ डॉ. मनमोहन सिंह की बातचीत से केंद्र सरकार की छवि पर रत्ती भर भी कोई असर पड़ने वाला है।

सोमवार, जून 27, 2011

अनशन की लोकतांत्रिक मर्यादा

पवन कुमार अरविंद

लोकपाल के शीघ्र निर्माण को लेकर अन्ना हजारे सहित सभी सत्पुरुष समाज की बेचैनी स्वाभाविक ही है। लेकिन जो लोकपाल इन भ्रष्ट नेताओं के कारण पिछले 43 वर्षों से कानून का रूप नहीं ले सका है, क्या वह उनकी जिद से मात्र एक या दो सप्ताह में ही कानून का रूप ले सकता है? भ्रष्टाचारमुक्त भारत का निर्माण सभी सत्पुरुष समाज की इच्छा है, लेकिन इसको लेकर चलाये जा रहे आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं को थोड़ा धैर्य रखना चाहिए। धैर्य खो देने से स्थितियां बनती नहीं बल्कि और बिगड़ जाती हैं। सरकार को बार-बार अनशन करने की धमकी देकर अपने को महत्वहीन नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र में अनशन एक हथियार जरूर है लेकिन विधेयक निर्माण की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लगने वाले समय के संदर्भ में अनशन रूपी यह हथियार क्या कर सकेगा ? लोकपाल का इंतजार करते-करते जैसे 43 वर्ष बीत गये वैसे ही केवल एक या दो महीने और रुक जाने में कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा ?

अन्ना ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन करके केंद्र सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। इस चार दिवसीय अनशन ने उनको और देश को बहुत कुछ दिया है। उन्होंने मात्र इतने दिन में ही अपने लिए वह दर्जा हासिल कर लिया है जो लोग जीवन भर संघर्ष करके भी नहीं पाते। फिर भी अन्ना को किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए। उनको यह सोचना चाहिए कि अनशन की एक सीमा व मर्यादा है और देशवासियों की मर्यादित इच्छा ही लोकतंत्र है।

अन्ना जैसे लोगों को देश के लिए मरने से बेहतर विकल्प जीवित रहकर देश की सेवा करना है। क्योंकि ऐसे लोग बिरले ही होते हैं। अनशन की जिद में अपना प्राणोत्सर्ग कर देना कहीं की बुद्धिमानी नहीं कही जायेगी। यह चर्चा इसलिए आवश्यक प्रतीत हो रही है क्योंकि अन्ना ने 16 अगस्त से पुन: अनशन करने की घोषणा की है। लेकिन लोकपाल पर सरकार के रूख को देखते हुए अन्ना को यह समझना चाहिए कि इस बार केंद्र सरकार के कर्ता-धर्ता; उनको पहले अनशन जैसा महत्व नहीं देंगे। सरकार का इस प्रकार का संभावित रुख; लोकपाल विधेयक मसौदा समिति के सरकारी सदस्य तथा केंद्रीय जल संसाधन विकास मंत्री सलमान खर्शीद के जमशेदपुर में सोमवार को दिये उस बयान से भी स्पष्ट हो जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था- “अन्ना हजारे अगर 16 अगस्त से अनशन करते हैं तो यह सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था (संसद) का विरोध होगा। और इसके बाद उनका क्या हश्र होगा, यह नहीं कहा जा सकता।”

कहीं ऐसा न हो कि अपने दूसरे अनशन के दौरान अन्ना की हालत ज्यादा बिगड़ जाये और सरकार की नाक पर जूँ तक न रेंगे। ऐसी स्थिति में अन्ना को अपना अनशन तोड़ने के लिए कहीं बीच का रास्ता न अख्तियार करना पड़ जाये। यदि ऐसा होगा तो अन्ना अपनी जिद के कारण कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ इस अभियान को ही चोट पहुंचायेंगे। जैसे योग गुरू स्वामी रामदेव रामलीला मैदान में दिल्ली पुलिस के दमनात्मक कार्रवाई को देखकर महिलाओं की लिबास पहनकर अपनी जान बचाने के लिए भाग खड़े हुए थे। नेतृत्वकर्ताओं का ऐसा आचरण किसी भी आंदोलन की धार को कमजोर करता है, साथ ही उनके प्रति जनता के विश्वास को भी कम करता है। जो लोग नेतृत्वकर्ता हैं उनको अपनी जान की परवाह किये बगैर अपने पीछे खड़ी जनता और आंदोलन की दीर्घकालिक रणनीति; पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

वैसे आजादी के बाद से अनशन करते कई लोगों की मौत हो चुकी है। सरकार में शामिल कुछ लोग चाहेंगे कि अनशन करते अन्ना अपनी मौत मर जायें, साथ ही यह आंदोलन भी अधमरा हो जाये ! उनका मरना कतई देशहित में नहीं कहा जा सकता। बार-बार अनशन की धमकी देने से बेहतर लोकतांत्रिक विकल्प नगर, ग्राम, डगर-डगर जाकर जनता को जागृत करना हो सकता है। उनके इस कदम से सरकार ज्यादा भयभीत होगी।

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि देश की 121 करोड़ की आबादी में से मात्र पांच सदस्यों वाली कथित सिविल सोसायटी के सदस्य देश की किस संस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं? उनका देश की जनता के प्रति उत्तरदायित्व क्या है? हालांकि जब कोई व्यक्ति देश और समाज के हित में श्रेष्ठ उद्देश्यों को लेकर संघर्ष करता है तो समाज के ही लोग कई प्रकार की बातें करने लगते हैं, लेकिन ध्येय-पथ के अनुगामी को इन सब बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। इस प्रकार की बातों में कोई दम नहीं होता है।

माना कि अन्ना और उनके द्वारा उठाये गये कालेधन व भ्रष्टाचार के मुद्दों में दम है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होता कि आप संसदीय परम्पराओं की इज्जत मत करिये। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने जीवन काल में अंग्रेजों के विरुद्ध सैकड़ों आंदोलन चलाये और जेल की यातनायें सहीं, लेकिन उन्होंने इस संदर्भ में हर प्रकार की मर्यादा का ध्यान रखा, जबकि वह भलीभांति जानते थे कि अंग्रेज हर तरह से अमर्यादित आचरण कर रहे हैं। इस संदर्भ में महात्मा गांधी के अनुयायी अन्ना; गांधी से क्यों नहीं सीखते हैं ? यदि गांधी से प्रेरणा लें तो कालेधन और भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए चलाये जा रहे इस अभियान को और बल ही मिलेगा, जो इस भ्रष्टाचारी व अत्याचारी केंद्र सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर देगा।

शुक्रवार, मई 20, 2011

गैर-लोकतांत्रिक है सुरक्षा परिषद का ‘वीटो’ अधिकार

पवन कुमार अरविंद

सत्ता के संचालन की लोकतांत्रिक प्रणाली; इस सृष्टि की सर्वोच्च शासन व्यवस्था मानी गई है। क्योंकि अब तक शासन के संचालन की जितनी भी पद्धतियां ज्ञात हैं उनमें लोकतांत्रिक प्रणाली सर्वाधिक मानवीय होने के कारण सर्वोत्कृष्ट है। यह एक ऐसा तंत्र है जिसमें इकाई राज्य के सभी जन की सहभागिता अपेक्षित है। इस तंत्र में न तो कोई आम है और न ही कोई खास, बल्कि लोकतांत्रिक सत्ता की निगाह में सभी समान हैं। लोकतांत्रिक देश यानी सभी जन की सहभागिता से निर्मित तंत्र।

भारत इस सर्वोत्कृष्ट शासन प्रणाली का जन्मदाता है। कुछ लोग ब्रिटेन को भी मानते हैं; पर यह सत्य नहीं है, भले ही भारत को आजादी मिलने तक देश के सभी रियासतों में राजतंत्र रहा हो और इस राजतांत्रिक पद्धति से सत्ता संचालन का सिलसिला अयोध्या के राजा दशरथ के शासनकाल के बहुत पहले से चलता रहा हो, फिर भी जनता के प्रति सत्ता की जवाबदेही के परिप्रेक्ष्य में भारत ही लोकतांत्रिक प्रणाली का जन्मदाता कहा जाएगा।

दशरथ पुत्र मर्यादापुरुषोत्तम राम का शासन राजतांत्रिक होते हुए भी लोकतांत्रिक था। क्योंकि उनके राज्य की सत्ता जनता के प्रति पूर्ण-रूपेण जवाबदेह थी। उनकी पत्नी सीता पर अयोध्या के मात्र एक व्यक्ति ने आलोचना की थी, राजा राम ने इसको गंभीरता से लिया और राजधर्म का पालन करते हुए सीता को जंगल में भेज दिया। यहां सवाल यह नहीं है कि राम ने सीता के प्रति अपने पति धर्म का पालन किया या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि आलोचना करने वाले की संख्या मात्र एक थी, फिर भी कार्रवाई कठोर हुई। उनके जैसा संवेदनशील राजतंत्र अब तक देखने या सुनने को नहीं मिला है। वह एक ऐसा तंत्र था जो लोकतंत्र से भी बढ़कर था। हांलाकि, राज्य के राजा का चयन सत्ता उत्तराधिकार की अग्रजाधिकार विधि के तहत होता था। यानी राजा का ज्येष्ठ पुत्र सत्ता का उत्तराधिकारी। उस समय मतदान प्रक्रिया की कहीं कोई चर्चा भी नहीं थी।

अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने कहा था कि यदि किसी इकाई राज्य की सत्ता, उस इकाई राज्य की जनता द्वारा चुनी गई हो, जनता के हित में कार्य करती हो और जनता के लिए समर्पित हो; तो ऐसी सरकार को लोकतांत्रिक कह सकते हैं। लिंकन के कहने का अर्थ यह भी है कि सरकार के निर्माण या चयन में लोकतांत्रिक इकाई के सभी लोगों की समान सहभागिता होनी चाहिए।

कहने को तो अमेरिका लोकतंत्र का सबसे बड़ा पैरोकार है लेकिन वह भी वैश्विक संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) के महत्पूर्ण घटक सुरक्षा परिषद में लोकतंत्र की पूर्ण स्थापना के लिए कुछ भी नहीं कर रहा है। यूएनओ को वैश्विक सत्ता कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। हालांकि भारत सहित दुनिया के मात्र 192 देशों को ही यूएनओ की सदस्यता प्राप्त है, फिर भी इसकी सत्ता को वैश्विक सत्ता कहना ज्यादा समीचीन होगा।

वर्तमान में सुरक्षा परिषद के सदस्यों की संख्या 15 है। इनमें से पांच- अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और ब्रिटेन; स्थाई सदस्य हैं, जबकि 10 देशों की सदस्यता अस्थाई है। इन अस्थाई सदस्यों में भारत भी शामिल है। अस्थाई सदस्यों का कार्यकाल दो वर्ष का होता है। स्थाई सदस्यों को वीटो का अधिकार प्राप्त है। यह वीटो अधिकार ही सुरक्षा परिषद में लोकतंत्र की स्थापना की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। क्या आप कुछ सदस्यों को कुछ विशेष अधिकार देकर लोकतांत्रिक सत्ता स्थापित कर सकते हैं, यह कदापि संभव नहीं है।

आखिर सुरक्षा परिषद में लोकतंत्र की पूर्ण-रूपेण स्थापना के लिए अमेरिका कोई पहल क्यों नहीं करता? क्या वह सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्य देशों को मिले वीटो के अधिकार को बनाए रखना चाहता है और शेष अस्थाई सदस्य देशों को अस्थाई के नाम पर इस अधिकार से दूर रखना चाहता है? क्या यही अमेरिका की लोकतंत्रिक सोच है। हालांकि यह पहल चीन से करना बेमानी है क्योंकि उसकी सोच गैर-लोकतांत्रिक है। अमेरिका को यह महत्वपूर्ण पहल इसलिए भी करना चाहिए क्योंकि वह सोवियत संघ के विघटन के बाद एक-ध्रुवीय विश्व का इकलौता नेता है।

भारत भी सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के लिए अभियान चलाए हुए है। इससे उसको क्या हासिल होगा। कुछ विशेष सहूलियत मिल सकती है। महासभा के सदस्य देशों या विश्व के अन्य देशों के लिए वैश्विक नीति-निर्माण की दिशा में मत देने का अधिकार मिल सकता है, लेकिन इससे क्या वह संयुक्त राष्ट्र महासभा के 192 सदस्यों में से पांच देशों- अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और ब्रिटेन, को छोड़कर शेष 187 देशों का स्वाभाविक नेता बना रह सकता है। सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के बजाए भारत को परिषद के मानक को पूरा करने वाले सभी सदस्य देशों के लिए समान अधिकार की सदस्यता के निमित्त अभियान चलाना चाहिए। भारत का यह प्रयास यूएनओ की सुरक्षा परिषद सहित विश्व के सभी देशों में लोकतंत्र की जड़ें गहरी करने की दिशा में अहम सिद्ध होगी।

बुधवार, मई 18, 2011

राहुल गांधी का हवा-हवाई ‘दिग्विजयी दावा’

पवन कुमार अरविंद

सचिव वैद्य, गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राजधर्म तनु तीनि कर होईं बेगहिं नास॥


अर्थात-‘जिस राजा के सचिव, वैद्य और गुरू राजा के भयवश या उसे खुश रखने के लिए उसके सम्मुख उसके मन की और चिकनी-चुपड़ी बातें बोलते हों, उस राजा के राज्य, शरीर और धर्म का सर्वनाश हो जाता है।’ (रामचरितमानस)

ठीक इसी प्रकार, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी राहुल गांधी के एक ऐसे सचिव प्रतीत हो रहे हैं; जो केवल अपने नेता को प्रसन्न रखने के लिए ही बोलता है। दिग्विजय जैसे अपने सचिव सदृश व्यक्ति के बचनों में राहुल को सत्य दिखता है। यदि ऐसा नहीं होता तो राहुल दिग्विजय के तर्कों के आधार पर ग्रेटर नोएडा के भट्टा व पारसौल गांव के संदर्भ में 74 लोगों को मारे जाने का दावा क्यों करते ? भट्टा व पारसौल गांव में जो कुछ भी दिग्विजय ने पत्रकारों से कहा था, वही बातें राहुल ने प्रधानमंत्री के समक्ष दुहरायी।

दरअसल, इस मामले को लेकर राहुल सोमवार को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से मिलने पहुंचे। इस दौरान उन्होंने दिग्विजय की बातों को ही दुहराया। उन्होंने डॉ. सिंह से कहा कि भट्टा व पारसौल में कम से कम 74 शवों की राख बिखरी पड़ी है। उन्होंने दावा किया कि इसके बारे में गांव के सभी लोगों को जानकारी है। राहुल ने पुलिस कार्रवाई में कथित रूप से जले हुए शव और किसानों एवं उनके परिवार के लोगों के खिलाफ हिंसा की तस्वीरें भी दिखाई थी। उन्होंने कई स्थानीय महिलाओं के साथ बलात्कार होने की बात भी दुहरायी और यह भी कहा था कि स्थानीय लोगों की निर्ममता से पिटाई की गयी है।

लेकिन राहुल के इन दावों की हवा निकलती दिख रही है। दोनों गांवों में से एक भी व्यक्ति राहुल के दावों की पुष्टि करने को तैयार नहीं है। भट्टा व पारसौल गांव के लोगों का कहना है कि उन्होंने महिलाओं से बलात्कार संबंधी खबरें सुनी है लेकिन वे इसका दावा नहीं कर सकते। इस संदर्भ में ग्रामीण सिर्फ इतना ही बता रहे हैं कि पुलिस ने उनकी पिटाई की थी।

विदित हो कि 11 मई को राहुल गांधी प्रशासन को धता बताते हुए बाइक पर सवार होकर भट्टा व पारसौल पहुंचे थे। इस दौरान काफी राजनीतिक ड्रामा हुआ था। उनका साथ देने दिग्विजय सिंह भी उपस्थित थे। कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारी भी हुई थी। वहां से लौटने के बाद सोमवार को राहुल ने 8 स्थानीय लोगों के साथ प्रधानमंत्री डॉ. सिंह से मुलाकात की। इन 8 स्थानीय लोगों में वीरेन्द्री देवी भी शामिल थी। वीरेन्द्री का कहना है कि उसे ऐसी किसी महिला के बारे में जानकारी नहीं है जिसके साथ दुष्कर्म हुआ हो। वीरेन्द्री ने बताया कि पुलिस ने कुछ महिलाओं की पिटाई जरूर की थी। पुलिस ने उसकी बेटी खुशबू की भी पिटाई की थी। वीरेन्द्री ने बताया कि उसने प्रधानमंत्री को यह नहीं बताया था कि भट्टा व पारसौल गांव से मिली राख में हडि्डयां मिली थी। वीरेन्द्री ने यह भी कहा कि वह प्रधानमंत्री के साथ अंग्रेजी में हो रही बातचीत को समझ नहीं पाई। आश्चर्य की बात यह है कि राहुल के साथ प्रधानमंत्री से मिलने वाले 8 किसानों में से 7 भूमिगत हो गये हैं।

राहुल के इन दावों के बाद गौतमबुद्ध नगर जिला प्रशासन भी हरकत में आ गया और भट्टा व परसौल गांवों से मंगलवार को राख के कुछ सैंपल एकत्रित कर जांच के लिए आगरा भेजे गये। मेरठ के कमिश्नर भुवनेश्वर कुमार ने बताया कि गांव के पांच स्थानों से राख का सैंपल केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला इसलिए भेजा गया है; ताकि उसमें विस्फोटकों की जांच हो सके। हालांकि, उन्होंने इस जांच के पहले ही कह दिया कि राख में मानव कंकाल मिलने से संबंधित आरोप बेबुनियाद हैं। हालांकि सत्यता क्या है, जांच रिपोर्ट आने के बाद स्वतः स्पष्ट हो जाएगा। मेरठ के पुलिस महानिरीक्षक ने कहा कि गांव का कोई भी सदस्य गायब नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि 23 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, 17 घायल हैं और दो की मौत हो गई है। इसके अलावा सभी लोग गांव में ही हैं।

वहीं, कांग्रेस राहुल के समर्थन में खड़ी हो गई है। पार्टी का कहना है कि किसानों पर पुलिस फायरिंग मामले की न्यायिक जांच होनी चाहिए। किसानों को जब तक न्याय नहीं मिलेगा, कांग्रेस अपना आंदोलन बंद नहीं करेगी। विदित हो कि ग्रेटर नोएडा के किसान अपनी जमीनों की मुआवजा राशि बढ़ाने की मांग को लेकर पिछले करीब 4 महीने से गांव में धरने पर बैठे थे। धरनारत किसानों ने रोडवेज के कुछ कर्मचारियों को बंधक बना लिया था। प्रशासन बंधकों को मुक्त कराने के लिए 7 मई को भट्टा पारसौल गांव पहुंचा था, इसी दौरान किसानों व सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। इसमें पीएसी के 2 जवानों सहित चार लोगों की मौत हो गयी थी।

अब प्रश्न उठता है कि “कांग्रेस का भविष्य” और देश के भावी प्रधानमंत्री कहे जाने वाले राहुल गांधी क्या अपनी पार्टी के विनाश तक दिग्विजय जैसे लोगों के कर्णप्रिय लगने वाले वचनों को सुनते रहेंगे; या फिर कुछ अपनी भी बुद्धि लगायेंगे। क्योंकि निराधार और “तोतारटंत” बातें व्यक्ति की छवि तो बिगाड़ती ही हैं, विनाश की ओर भी उन्मुख करती हैं।

रविवार, मई 15, 2011

डॉ. वेद प्रकाश नन्दा को ‘छठा भारतवंशी गौरव सम्मान’

पवन कुमार अरविंद, नई दिल्ली।

अमेरिका के डेन्वेर विश्वविद्यालय में विधि विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक एवं वर्ल्ड ज्यूरिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. वेद प्रकाश नन्दा को “छठा भारतवंशी गौरव सम्मान” से सम्मानित किया गया। डॉ. नन्दा को यह सम्मान दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित मालवीय भवन के सभागार में शनिवार को आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान बिहार के मुख्यमंत्री श्री सुशील कुमार मोदी ने प्रदान किया।

कार्यक्रम का आयोजन अंतरराष्ट्रीय सहयोग न्यास के तत्वावधान में किया गया था। इस दौरान मुख्य रूप से पूर्व राज्यपाल केदारनाथ साहनी, पूर्व पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्यमंत्री संतोष गंगवार, वरिष्ठ पत्रकार अशोक टण्डन, दिल्ली की मेयर प्रो. रजनी अब्बी, मृदुला सिन्हा, मीडिया नैपुण्य संस्थान के निदेशक आशुतोष भटनागर, भाजपा नेता विजय जौली, पी.एन. पाठक सहित कई गण्यमान्य उपस्थित थे।

डॉ. नन्दा ने अमेरिका में प्रवासी भारतीयों के बीच भारत की संस्कृति व सभ्यता के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वह विदेशों में कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किये जा चुके हैं। इसके अलावा अभी हाल ही में वह इण्डियन लॉ टीचर्स एसोसिएशन के द्वारा सर्वश्रेष्ठ शिक्षक सम्मान से सम्मानित किये जा चुके हैं।

डॉ. नन्दा ‘लॉ जर्नल’ व ‘नेशनल मैगजीन’ का प्रकाशन भी करते हैं और अंतरराष्ट्रीय कानून पर उनकी 23 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वह अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर ‘डेन्वेर पोस्ट’ के नियमित स्तम्भकार हैं। उन्होंने बीबीसी व वॉयस ऑफ अमेरिका सहित विश्व के विभिन्न रेडियो व टीवी चैनलों पर समीक्षक के नाते भी अपनी विशेष पहचान बनायी है।

यह पुरस्कार अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के द्वारा प्रदान किया जाता है। यह देश की पहली ऐसी संस्था है जो विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के लोगों से संबंध स्थापित करने और भारत की संस्कृति व सभ्यता के प्रचार-प्रसार का कार्य करती है। इसकी स्थापना वर्ष 1960 में वरिष्ठ पत्रकार एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ श्री बालेश्वर अग्रवाल ने की। 94 वर्षीय श्री अग्रवाल परिषद के संस्थापक अध्यक्ष और जे.सी. शर्मा अध्यक्ष हैं। संस्था का केंद्रीय कार्यालय दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित प्रवासी भवन में है।

इस पुरस्कार का चयन उच्चस्तरीय समिति के द्वारा किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से मॉरीशस के राष्ट्रपति अनिरुद्ध जगन्नाथ, फिजी के पूर्व प्रधानमंत्री महेंद्र चौधरी, त्रिनिडाड के पूर्व प्रधानमंत्री बासुदेव पाण्डेय, पूर्व केंद्रीय विधि मंत्री एवं जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी, दैनिक जागरण के प्रधान सम्पादक संजय गुप्ता, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के संस्थापक अध्यक्ष बालेश्वर अग्रवाल, जी टेलीफिल्म्स लिमिटेड के एमडी सुभाष चन्द्रा, वरिष्ठ पत्रकार मनोहर पुरी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग न्यास के सचिव विजेंद्र मित्तल और नरेश गुप्ता शामिल हैं।

विदित हो कि संस्था के द्वारा ‘पहला भारतवंशी गौरव सम्मान’ 25 अक्टूबर 2005 को दक्षिण अफ्रीका निवासी श्री रणजीत रामनारायण को प्रदान किया गया था। उनको यह पुरस्कार मॉरीशस के प्रधानमंत्री श्री नवीनचंद्र रामगुलाम ने प्रदान किया था। ‘दूसरा भारतवंशी गौरव सम्मान’ त्रिनिदाद व टोबैगो निवासी श्री सत्यनारायण महाराज को 23 दिसम्बर 2006 को पूर्व प्रधानमंत्री श्री इंदर कुमार गुजराल ने प्रदान किया था। ‘तीसरा भारतवंशी गौरव सम्मान’ ग्लोबल ऑर्गनाइजेशन ऑफ पीपुल्स ऑफ इण्डिया (जीओपीआईओ) के चेयरमैन डॉ. थामस अब्राहम को 4 जनवरी 2008 को तत्कालीन उप-राष्ट्रपति श्री भैरोंसिंह शेखावत ने प्रदान किया था।

‘चौथा भारतवंशी गौरव सम्मान’ मॉरीशस के ह्यूमन सर्विस ट्रस्ट (एचएसटी) नामक गैर-सरकारी संगठन को 11 जनवरी 2009 को पूर्व उप-प्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी ने प्रदान किया था और ‘5वां भारतवंशी गौरव सम्मान’ थाईलैंड के श्री शिवनाथ राय बजाज को 10 जनवरी 2010 को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमती सुषमा स्वराज ने प्रदान किया था।

गुरुवार, मई 12, 2011

'कुरूक्षेत्र' बना ग्रेटर नोयडा का भट्टा पारसौल गांव

ग्रेटर नोयडा का भट्टा पारसौल गांव इन दिनों उत्तर प्रदेश के राजनीतिक महाभारत का कुरूक्षेत्र बना हुआ है। इस महाभारत में कौरवों का पक्ष कौन है, यह पहचानना बड़ा ही कठिन है, क्योंकि सभी अपने को पाण्डव होने का ही दावा कर रहे हैं। सभी राजनीतिक दलों के नेता इस कुरूक्षेत्र में पहुंचकर केवल ‘अग्निबाण’ चलाने पर आमादा हैं। इस मामले के हल से उनका कुछ भी लेना देना नहीं। केवल अगले चुनाव में वोट का जुगाड़ हो जाय, इस महाभारत का एकमेव लक्ष्य है।

असली महाभारत तो कौरवों और पाण्डवों के बीच हुआ था, लेकिन वर्तमान का यह राजनीतिक महाभारत केवल कौरवों के बीच ही होता दिख रहा है। क्योंकि जिस प्रकार इस आंदोलन के सहारे पार्टियों में राजनीतिक बढ़त पाने की होड़ मची हुई है, उससे केवल यही उपमा समीचीन है। यहां न कोई पाण्डव है और न ही कोई कृष्ण, जो अर्जुन को गीता का उपदेश देकर धर्मपथ पर चलते हुए कर्मक्षेत्र में डटे रहने के लिए प्रेरित करे। सबको ऐन-केन-प्रकारेण ‘हस्तिनापुर’ की सत्ता ही दिख रही है। बस, वही लक्ष्य है। किसानों का दुःख-दर्द जाये भाड़ में।

मंगलवार, मई 10, 2011

‘जो मांगा नहीं गया, वो दिया भी नहीं जा सकता’

पवन कुमार अरविंद

विश्व हिंदू परिषद के संयुक्त महामंत्री श्री चम्पत राय ने श्रीराम-जन्मभूमि के स्वामित्व विवाद मामले में उच्चतम न्यायालय के सोमवार के आदेश पर संतोष व्यक्त किया है। उन्होंने एक बाचतीत के दौरान यह उम्मीद जतायी कि स्वामित्व विवाद मामले की सुनवाई शीघ्र पूरी होगी।

उच्चतम न्यायालय में श्रीराम-जन्मभूमि के स्वामित्व विवाद मामले में 30 सितम्बर 2010 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के निर्णय के विरुद्ध दायर सभी अपीलों की सोमवार को सुनवाई हुई। ध्यातव्य है कि स्वामित्व विवाद संबंधी निर्णय के विरुद्ध शीर्ष न्यायालय में यह प्रथम अपील है।

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति आर.एम. लोढ़ा की दो सदस्यीय पीठ कर रही है। सोमवार को सुनवाई प्रारम्भ होते ही पीठ ने स्वतःस्फूर्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह अत्यंत चौंकाने वाला मामला है कि उच्च न्यायालय की त्रि-सदस्यीय पूर्ण पीठ ने भूमि का तीन भागों में बंटवारा कर दिया, जबकि मूलवाद में किसी भी पक्ष ने बंटवारे की बात कही ही नहीं थी और न इसकी मांग की थी।

न्यायालय ने कहा, "जो मांगा नहीं गया वह दिया भी नहीं जा सकता।" यह टिप्पणी करते हुए न्यायालय ने सभी अपीलें सुनवाई के लिए स्वीकार लीं और भूमि के बंटवारे संबंधी उच्च न्यायालय के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी।

न्यायालय ने श्रीरामलला की पूजा-अर्चना यथावत चलते रहने का आदेश भी दिया। हालांकि, इस मामले में जो अभी तक पक्षकार नहीं थे; परन्तु उन्होंने शीर्ष न्यायालय में प्रार्थना पत्र दिये थे, उनकी अपील पर न्यायालय ने आज की सुनवाई के दौरान संज्ञान नहीं लिया।

ध्यातव्य है कि 30 सितम्बर 2010 का निर्णय यद्यपि उच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों का निर्णय था, तथापि मुकदमों की मौलिक सुनवाई होने के कारण उच्च न्यायालय की वह पीठ ट्रायल कोर्ट की तरह व्यवहार कर रही थी।

बुधवार, अप्रैल 27, 2011

अकेला अन्ना बेचारा क्या कर सकेगा?

भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए अकेला बेचारा बूढ़ा अन्ना क्या कर सकेगा। क्योंकि यह भ्रष्टाचार अत्र, तत्र, अन्यत्र और सर्वत्र विराजमान है, यानी दसों दिशाओं में व्याप्त है। इसका दायरा बहुत व्यापक है। यह केवल नेताओं तक ही सीमित नहीं है। जहां देखो वहीं भ्रष्ट लोग और भ्रष्टाचार दिखायी व सुनाई देता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल भी क्या कर सकेगा। किसी व्यक्ति के भ्रष्ट आचरण को आप केवल कानून बनाकर कैसे बदल देंगे। क्या यह संभंव है? कदापि नहीं। भ्रष्टाचार मन का विषय है और कहते हैं कि मन बड़ा चंचल होता है। इसके प्रादुर्भाव का कारण मनोमालिन्यता, मनोवाद, मनोविकार, मनोव्याधि, मनोभ्रंश, मनोदशा और मनोग्रंथि है। आप कानून बनायेंगे तो यह मानव मन उसकी भी काट ढूंढ लेगा। तब आप क्या कर सकेंगे?

अन्ना ने जब अनशन किया तो हजारों लोग दिल्ली के जंतर मंतर पर उनके समर्थन में पहुंच गये। देशभर में उनके समर्थन में लोग अनशन करने लगे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि ये सभी महानुभाव लोग दूध के धुले हैं और इन सभी ने अपने जीवन में कभी भी भ्रष्टाचार नहीं किया है, या अब से नहीं करने की ठान ली है। इस भीड़ में कई ऐसे लोग भी शामिल थे जिनको बिजली के मीटर को सुस्त करने में महारत हासिल है, ताकि बिजली बिल कम देना पड़े।

भ्रष्टाचार के कितने प्रकार हैं, आप इसका अंदाजा नहीं लगा सकते हैं। हर घंटे एक भिन्न प्रकार का भ्रष्टाचार और उसको अंजाम तक पहुंचाने का तरीका पनप रहा है। यात्रा के दौरान ट्रेन की सीट कन्फर्म न होने या टिकट वेटिंग में होने पर हम प्रयास करने लगते हैं कि टिकट परीक्षक किसी भी प्रकार से ले-देकर एक सीट का जुगाड़ कर दे, ताकि रात को हम चैन की नींद ले सकें। इसके लिए हम दूसरे का हक भी मारने को तैयार हो जाते हैं। यह भी तो एक प्रकार का भ्रष्टाचार ही है। यात्रा के दौरान ट्रेन में यह हर रोज और हर क्षण होता है।

गेहूँ की कम्बाईन से कटाई के कारण मवेशियों के लिये भूसे की पर्याप्त कमी हो जा रही है। इसके कारण भूसा गेहूँ से भी महंगे दामों पर बिक रहा है। भूसे की उपलब्धता बाजार में भी नहीं है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में यह बात चायखाने की चर्चा का विषय है कि गेंहूँ की कम्बाइन से कटाई पर जिलाधिकारी (डीएम) ने रोक लगा दी है, ताकि भूसे की उपलब्धता बढ़ाई जा सके। जिलाधिकारी के इस आदेश के पालन के लिए उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) और तहसीलदार साहब गांव-गांव का दौरा कर रहे हैं। इस नये आदेश के बाद एक और भ्रष्टाचार उत्पन्न हो गया है। ‘सरकारी साहब’ लोग गेहूँ की कटाई कम्बाइन से होने देने के लिए कम्बाइन मालिकों से मोटी रकम वसूल रहे हैं और जो कम्बाइन मालिक रकम देने से इन्कार कर रहे हैं उनको डीएम का फरमान सुना दे रहे हैं। हालांकि, इन सब बातों में कितनी सत्यता है, यह जांच का विषय है। लेकिन यह भी एक भ्रष्टाचार ही है।

इस भ्रष्टाचार के कारण ही ‘शुद्ध’ शब्द ज्यादा प्रचलित हुआ है। आप जहां कहीं भी जायें; लिखा रहता है- “यहां हर सामान शुद्ध मिलता है; यथा- शुद्ध दूध, शुद्ध घी, शुद्ध मिठाई इत्यादि।” प्रश्न यह उठता है कि दूध, दही, घी, मिठाई और भी अन्य सामग्रियां क्या स्वयं में शुद्ध नहीं होतीं कि इसको प्रमाणित करने के लिए शुद्ध लिखना पड़ रहा है, या कुछ मिलावट के बाद ही ये सामग्रियां शुद्ध होती हैं। बात साफ है- ‘मिलावट रूपी भ्रष्टाचार’ का प्रमाणन ही शुद्ध शब्द लिख कर किया जाने लगा है।

ग्वाला डंके की चोट पर एक ही दूध को कई दामों पर बेचता है। पूछने पर वह कहता है कि कम दाम वाले दूध में अधिक पानी और अधिक दाम वाले में कम पानी मिलाया गया है। यदि आप पूछेंगे कि बिना पानी वाला दूध कौन सा है, तो वह दूध का एक दूसरा डिब्बा आपको थमा देगा और कहेगा- “बाबूजी, इसमें तनिक भी पानी नहीं मिलाया गया है, इसीलिये इसका दाम ऊंचा है।” ये ‘मिलावटी भ्रष्टाचार’ हम लोग रोज देखते व सुनते हैं और सहन भी करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि भ्रष्टाचार का दीमक सर्वत्र विराजमान है।

इसके बावजूद भी इस सृष्टि में कभी भी असत् की सत्ता नहीं रही है और सत् का कभी अभाव नहीं रहा है। इसका प्रत्यक्ष अनुभव तत्वदर्शियों ने किया है। (श्रीमद्भगवद्गीता)। फिलहाल, चाहे जो हो लेकिन हर युग में भ्रष्टाचार की व्याप्ति रही है। कभी कम तो कभी कुछ ज्यादा। लेकिन वर्तमान भारत में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। इसलिए सत्पुरूष समाज घबराया हुआ है। हालांकि, इसका समूल उन्मूलन कभी भी नहीं किया जा सका है। फिर भी सत्पुरूष समाज सदैव इसके उन्मूलन के लिए कटिबद्ध रहा है।

सवाल यह है कि यदि हम सदैव अच्छे की कामना करें तो इसमें बुरा क्या है? करना भी चाहिए। हालांकि भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए वर्तमान का जो संघर्ष है उसका लक्ष्य कानून बनाकर भ्रष्टाचारियों में भय पैदा करने की है। यह भी एक अच्छी सोच है। भय बिनु होय न प्रीति...। यह भय तब और प्रभावी होगा जब इसके समर्थन में सहस्रों हाथ उठेंगे। अतः भ्रष्टाचार उन्मूलन के इस अभियान में हम सबको आत्मपरिष्कार के मार्ग का वरण करते हुए सक्रिय होकर प्राण-प्रण से लगना चाहिए, तभी भ्रष्टाचार का उन्मूलन संभव है।

सोमवार, अप्रैल 18, 2011

लोकपाल बिल बनाम लोक व तंत्र की मर्यादा

पवन कुमार अरविंद

सत्ता के संचालन की लोकतांत्रिक प्रणाली; इस सृष्टि की सर्वोच्च शासन व्यवस्था मानी गई है। क्योंकि अब तक शासन के संचालन की जितनी भी पद्धतियां ज्ञात हैं, उनमें लोकतांत्रिक प्रणाली सर्वाधिक मानवीय है। यह एक ऐसा तंत्र है जिसमें इकाई राज्य के सभी जन की सहभागिता अपेक्षित है। इस तंत्र में न तो कोई आम है और न ही कोई खास, बल्कि लोकतांत्रिक सत्ता की दृष्टि में सभी समान हैं। लोकतांत्रिक देश यानी सभी जन की सहभागिता से निर्मित तंत्र।

भारत इस सर्वोत्कृष्ट शासन प्रणाली का जन्मदाता है। कुछ लोग ब्रिटेन को भी मानते हैं; पर यह सत्य नहीं है, भले ही भारत को आजादी मिलने तक देश के सभी रियासतों में राजतंत्र रहा हो और इस राजतांत्रिक पद्धति से सत्ता संचालन का सिलसिला अयोध्या के राजा दशरथ के शासनकाल के बहुत पहले से चलता रहा हो, फिर भी जनता के प्रति सत्ता की जवाबदेही के परिप्रेक्ष्य में भारत ही लोकतांत्रिक प्रणाली का जन्मदाता कहा जाएगा।

दशरथ पुत्र मर्यादापुरुषोत्तम राम का शासन राजतांत्रिक होते हुए भी लोकतांत्रिक था। क्योंकि उनके राज्य की सत्ता जनता के प्रति पूर्ण-रूपेण जवाबदेह थी। उनकी पत्नी सीता की आलोचना अयोध्या के मात्र एक व्यक्ति ने की थी, राजा राम ने इसको गंभीरता से लिया और राजधर्म का पालन करते हुए सीता को जंगल में भेज दिया। यहां सवाल यह नहीं है कि राम ने सीता के प्रति अपने पति धर्म का पालन किया या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि आलोचना करने वाले की संख्या मात्र एक थी, फिर भी कार्रवाई कठोर हुई। उनके जैसा संवेदनशील राजतंत्र अब तक देखने या सुनने को नहीं मिला है। वह एक ऐसा तंत्र था जो लोकतंत्र से भी बढ़कर था। हांलाकि, राज्य के राजा का चयन सत्ता उत्तराधिकार की अग्रजाधिकार विधि के तहत होता था। यानी राजा का ज्येष्ठ पुत्र सत्ता का उत्तराधिकारी।

वर्तमान लोकतांत्रिक पद्धति में सैद्धांतिक रूप से सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह होती है लेकिन व्यवहारतः ऐसा नहीं है। पूरा विपक्ष यहां तक कि देश की आधी जनता भी यदि सरकार से इस्तीफा मांगे, तो भी बड़ी साफगोई से इन्कार कर दिया जाता है, और अपने पक्ष में ढेर सारे तर्क गढ़ दिये जाते हैं।

अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने कहा था कि यदि किसी देश की सत्ता, उस देश की जनता के द्वारा चुनी गई हो, जनता के हित में कार्य करती हो और जनता के लिए समर्पित हो; तो ऐसी सरकार को लोकतांत्रिक कह सकते हैं (By the people, of the people and for the people.)। यानी उनके कहने का अर्थ यह भी है कि सरकार के निर्माण या चयन में लोकतांत्रिक इकाई के सभी लोगों की समान सहभागिता होनी चाहिए।

अब प्रश्न उठता है कि क्या वर्तमान सत्ता का चाल, चरित्र, चेहरा व मोहरा; जनता व देश के लिए हितकारी है? यदि ऐसा होता तो प्रख्यात गांधीवादी 73 वर्षीय अन्ना हजारे अनशन पर क्यों बैठते? क्या अन्ना का अनशन किसी शौक की अभिव्यक्ति था? दुनिया का कोई भी तंत्र हो, वह लोक की व्यवस्थाओं को सुव्यवस्थित व सुगम बनाने में सहयोग करने के लिए होता है। लोक का कार्य तंत्र पर निगरानी रखते हुए उसको अमर्यादित और भटकाव की दिशा में जाने से रोकना है। तंत्र की लगाम लोक के हाथों में होनी चाहिए। इसके बावजूद दोनों की अपनी-अपनी मर्यादाएं हैं। इस तंत्र को संचालित करने के लिए कुछ परम्पराएं भी स्थापित करनी पड़ती हैं, या निर्मित हो जाती हैं।


तो क्या यह मान लिया जाय की इन परम्पराओं के समक्ष लोक को हमेशा नतमस्तक रहना चाहिए। कुछ राजनेताओं व बुद्धिजीवियों का कहना है अन्ना ने अनशन को हथियार बनाकर सत्ता के साथ ब्लैकमेंलिंग की है। वर्षों से चली आ रही देश की स्थापित संसदीय परम्परा को तोड़ा है। अन्ना के कारण संसदीय तंत्र की संप्रभुता को झटका लगा है। लिहाजा उनका अनशन किसी भी दृष्टि से लोकतंत्र के हित में नहीं कहा जा सकता। हालांकि ये सब बेकार की बातें हैं। आखिर परम्पराएं क्यों बनायी जाती हैं? परम्पराएं टूटने के लिए भी होती हैं। क्या ये परम्पराएं लोक और लोकहित से भी बड़ी हैं? परम्पराएं लोक के लिए बनायी जाती हैं, परम्पराओं के लिए लोक नहीं बनता। कभी-कभी ऐसी भी स्थितियां आ जाती हैं कि परम्पराएं जीवित रहती हैं और उन परम्पराओं के कारण ‘लोक’ मरता रहता है। क्या हम लोगों को ‘मरते रहना’ ही पसंद है?

अन्ना के अनशन की सफलता का श्रेय पूरी तरह से भ्रष्टाचारी कांग्रेस को है। क्योंकि उसके ‘शूरमाओं’ द्वारा लगातार किये जा रहे बड़े-बड़े घोटालों से जनता बौखला उठी थी और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में किसी ईमानदार नेतृत्व की तलाश में थी। कहते हैं कि डूबते को तिनके का सहारा चाहिए। अतः जनता ने भ्रष्टाचार के खिलाफ हथियार के रूप में अन्ना रूपी उस तिनके का सहारा लिया। जनता के समर्थन के कारण यह तिनका सरकार पर भारी पड़ गया। फलतः सरकार को झुकना पड़ा। हालांकि, इस अनशन को केवल इतने से ही सफल नहीं मान लेना चाहिए। अभी तो सरकार और सिविल सोसायटी के बीच क्रिकेट का टी-20 जैसा खेल ही हो रहा था और पूरे 50-50 ओवरों की कई श्रृंखलाएं खेला जाना शेष है।

जो कानून पिछले 43 वर्षों से अधर में लटका हो, या जानबूझकर लटकाया गया हो, के लिए अब तक की सरकारें क्या करती रहीं। क्या इन सरकारों में शामिल कुछ लोगों द्वारा अपनी गर्दन फंस जाने के खतरे से इस कानून के बनने के खिलाफ कई प्रकार के तर्क पेश किये जाते रहे और किये जा रहे हैं? हालांकि, ‘जन-लोकपाल बनाम लोकपाल का संघर्ष’ को कितनी सफलता मिलती है, यह भविष्य के गर्भ में है। लेकिन यह गंभीर मसला है कि लोकपाल का मसौदा तैयार हो जाने के बाद संसद में पेश किया जाएगा, तो ठीक उसी रूप में पारित हो सकेगा? संसद के दोनों सदनों के 795 सदस्य क्या आंख मूदकर इस विधेयक के पक्ष में हाथ उठा देंगे? एक आंकड़े के मुताबिक, संसद के 35 प्रतिशत सदस्य किसी न किसी प्रकार से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। यदि यह विधेयक पारित हो जाता है तो सबसे बड़ा पहाड़ इन माननीय सदस्यों के ऊपर ही टूट पड़ेगा। इस कारण लोकपाल विधेयक संसद में पारित करा लेना उससे भी ज्यादा कठिन है जितना अन्ना समझते हैं।


शायद इसी कारण अन्ना ने संयुक्त समिति की पहली बैठक के एक दिन बाद लोकपाल विधेयक पर अपने रुख में नरमी का संकेत दिया और कहा कि संसद सर्वोच्च है, यदि वह विधेयक को खारिज कर देती है तो वह इसे स्वीकार करेंगे। अन्ना ने संसद द्वारा लोकपाल विधेयक पारित करने के संबंध में अपनी ओर से निर्धारित 15 अगस्त की समयसीमा पर भी लचीला रुख अपना लिया है। उन्होंने कहा- “अगर मुझे लगेगा कि सरकार सही मार्ग पर आगे बढ़ रही है तो इस विषय पर मैं सहयोग करने को तैयार हूँ।”

प्रश्न यह है कि आप अपने ही खिलाफ कितना कठोर कानून बनाएंगे? शायद इसी कारण लोकपाल विधेयक 1968 से अधर में लटका पड़ा है। इस बात पर कोई ईमानदार और निष्कलंक अन्ना क्या कर सकेगा? सिविल सोसायटी के पांच महानुभाव लोग क्या कर सकेंगे? इन सभी वास्तविकताओं को अन्ना बखूबी समझते हैं। इसीलिए अन्ना को अपनी व इस संसदीय प्रणाली की मर्यादा का ध्यान रखना पड़ रहा है।
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