बुधवार, अप्रैल 27, 2011

अकेला अन्ना बेचारा क्या कर सकेगा?

भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए अकेला बेचारा बूढ़ा अन्ना क्या कर सकेगा। क्योंकि यह भ्रष्टाचार अत्र, तत्र, अन्यत्र और सर्वत्र विराजमान है, यानी दसों दिशाओं में व्याप्त है। इसका दायरा बहुत व्यापक है। यह केवल नेताओं तक ही सीमित नहीं है। जहां देखो वहीं भ्रष्ट लोग और भ्रष्टाचार दिखायी व सुनाई देता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल भी क्या कर सकेगा। किसी व्यक्ति के भ्रष्ट आचरण को आप केवल कानून बनाकर कैसे बदल देंगे। क्या यह संभंव है? कदापि नहीं। भ्रष्टाचार मन का विषय है और कहते हैं कि मन बड़ा चंचल होता है। इसके प्रादुर्भाव का कारण मनोमालिन्यता, मनोवाद, मनोविकार, मनोव्याधि, मनोभ्रंश, मनोदशा और मनोग्रंथि है। आप कानून बनायेंगे तो यह मानव मन उसकी भी काट ढूंढ लेगा। तब आप क्या कर सकेंगे?

अन्ना ने जब अनशन किया तो हजारों लोग दिल्ली के जंतर मंतर पर उनके समर्थन में पहुंच गये। देशभर में उनके समर्थन में लोग अनशन करने लगे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि ये सभी महानुभाव लोग दूध के धुले हैं और इन सभी ने अपने जीवन में कभी भी भ्रष्टाचार नहीं किया है, या अब से नहीं करने की ठान ली है। इस भीड़ में कई ऐसे लोग भी शामिल थे जिनको बिजली के मीटर को सुस्त करने में महारत हासिल है, ताकि बिजली बिल कम देना पड़े।

भ्रष्टाचार के कितने प्रकार हैं, आप इसका अंदाजा नहीं लगा सकते हैं। हर घंटे एक भिन्न प्रकार का भ्रष्टाचार और उसको अंजाम तक पहुंचाने का तरीका पनप रहा है। यात्रा के दौरान ट्रेन की सीट कन्फर्म न होने या टिकट वेटिंग में होने पर हम प्रयास करने लगते हैं कि टिकट परीक्षक किसी भी प्रकार से ले-देकर एक सीट का जुगाड़ कर दे, ताकि रात को हम चैन की नींद ले सकें। इसके लिए हम दूसरे का हक भी मारने को तैयार हो जाते हैं। यह भी तो एक प्रकार का भ्रष्टाचार ही है। यात्रा के दौरान ट्रेन में यह हर रोज और हर क्षण होता है।

गेहूँ की कम्बाईन से कटाई के कारण मवेशियों के लिये भूसे की पर्याप्त कमी हो जा रही है। इसके कारण भूसा गेहूँ से भी महंगे दामों पर बिक रहा है। भूसे की उपलब्धता बाजार में भी नहीं है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में यह बात चायखाने की चर्चा का विषय है कि गेंहूँ की कम्बाइन से कटाई पर जिलाधिकारी (डीएम) ने रोक लगा दी है, ताकि भूसे की उपलब्धता बढ़ाई जा सके। जिलाधिकारी के इस आदेश के पालन के लिए उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) और तहसीलदार साहब गांव-गांव का दौरा कर रहे हैं। इस नये आदेश के बाद एक और भ्रष्टाचार उत्पन्न हो गया है। ‘सरकारी साहब’ लोग गेहूँ की कटाई कम्बाइन से होने देने के लिए कम्बाइन मालिकों से मोटी रकम वसूल रहे हैं और जो कम्बाइन मालिक रकम देने से इन्कार कर रहे हैं उनको डीएम का फरमान सुना दे रहे हैं। हालांकि, इन सब बातों में कितनी सत्यता है, यह जांच का विषय है। लेकिन यह भी एक भ्रष्टाचार ही है।

इस भ्रष्टाचार के कारण ही ‘शुद्ध’ शब्द ज्यादा प्रचलित हुआ है। आप जहां कहीं भी जायें; लिखा रहता है- “यहां हर सामान शुद्ध मिलता है; यथा- शुद्ध दूध, शुद्ध घी, शुद्ध मिठाई इत्यादि।” प्रश्न यह उठता है कि दूध, दही, घी, मिठाई और भी अन्य सामग्रियां क्या स्वयं में शुद्ध नहीं होतीं कि इसको प्रमाणित करने के लिए शुद्ध लिखना पड़ रहा है, या कुछ मिलावट के बाद ही ये सामग्रियां शुद्ध होती हैं। बात साफ है- ‘मिलावट रूपी भ्रष्टाचार’ का प्रमाणन ही शुद्ध शब्द लिख कर किया जाने लगा है।

ग्वाला डंके की चोट पर एक ही दूध को कई दामों पर बेचता है। पूछने पर वह कहता है कि कम दाम वाले दूध में अधिक पानी और अधिक दाम वाले में कम पानी मिलाया गया है। यदि आप पूछेंगे कि बिना पानी वाला दूध कौन सा है, तो वह दूध का एक दूसरा डिब्बा आपको थमा देगा और कहेगा- “बाबूजी, इसमें तनिक भी पानी नहीं मिलाया गया है, इसीलिये इसका दाम ऊंचा है।” ये ‘मिलावटी भ्रष्टाचार’ हम लोग रोज देखते व सुनते हैं और सहन भी करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि भ्रष्टाचार का दीमक सर्वत्र विराजमान है।

इसके बावजूद भी इस सृष्टि में कभी भी असत् की सत्ता नहीं रही है और सत् का कभी अभाव नहीं रहा है। इसका प्रत्यक्ष अनुभव तत्वदर्शियों ने किया है। (श्रीमद्भगवद्गीता)। फिलहाल, चाहे जो हो लेकिन हर युग में भ्रष्टाचार की व्याप्ति रही है। कभी कम तो कभी कुछ ज्यादा। लेकिन वर्तमान भारत में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। इसलिए सत्पुरूष समाज घबराया हुआ है। हालांकि, इसका समूल उन्मूलन कभी भी नहीं किया जा सका है। फिर भी सत्पुरूष समाज सदैव इसके उन्मूलन के लिए कटिबद्ध रहा है।

सवाल यह है कि यदि हम सदैव अच्छे की कामना करें तो इसमें बुरा क्या है? करना भी चाहिए। हालांकि भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए वर्तमान का जो संघर्ष है उसका लक्ष्य कानून बनाकर भ्रष्टाचारियों में भय पैदा करने की है। यह भी एक अच्छी सोच है। भय बिनु होय न प्रीति...। यह भय तब और प्रभावी होगा जब इसके समर्थन में सहस्रों हाथ उठेंगे। अतः भ्रष्टाचार उन्मूलन के इस अभियान में हम सबको आत्मपरिष्कार के मार्ग का वरण करते हुए सक्रिय होकर प्राण-प्रण से लगना चाहिए, तभी भ्रष्टाचार का उन्मूलन संभव है।
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