शनिवार, मार्च 13, 2010

महिलाओं पर अपनी तुच्छ सोच से बाज आएं मुस्लिम धर्मगुरू


ये मुस्लिम धर्मगुरू महिलाओं को केवल बच्चे पैदा करने की मशीन समझते हैं। इसको लेकर धर्मगुरूओं का अनर्गल बयान जारी है। एक तरफ जहां महिला आरक्षण बिल में मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण की मांग की जा रही है तो वहीं दूसरी तरफ देश के कुछ कठमुल्ले महिलाओं को उनकी हदें बताने में लग गए हैं। पहले एक मौलवी ने औरतों को पर्दे में घर पर रहने की सलाह दी थी, अब शिया धर्म गुरू कल्‍बे जव्‍वाद ने कहा है कि महिलाओं का काम बच्चे पैदा करना है, राजनीति करना नहीं।

इलाहाबाद में आयोजित धर्मगुरूओं के एक सम्‍मेलन में कल्‍बे जव्‍वाद ने कहा कि खुदा ने महिलाओं को अच्‍छे नस्‍ल के बच्‍चे पैदा करने के लिए बनाया है, इसलिए अच्छा रहेगा कि वे वही करें, इसी में सबका भला है। यदि वे घर छोड़कर राजनीति में आ जाएंगी तो घर के बच्‍चे अच्‍छे नेता कैसे बन पाएंगे।

इससे पहले शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े मदरसे नदवा-उल-उलेमा के प्रमुख मौलाना सर्रदुर रहमान आजमी नदवी ने कहा था कि महिलाएं अपनी हदों से आगे न जाएं तो ही अच्छा होगा। उन्होंने कहा कि अगर मुस्लिम महिलाओं को राजनीति में आना है तो वे सबसे पहले पर्दा उतार दें। क्योंकि इस्लाम पर्दा उतारकर कहीं भी भाषण देने का अधिकार नहीं देता।

नदवी ने कहा कि इस्लाम में महिलाओं को घर-परिवार और बच्चों के देखभाल करने के लिए बनाया गया है। उन्हें पढ़ाई और देश सेवा का अधिकार जरूर दिया गया है लेकिन इस्लाम महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर भाषण देने की इजाजद नहीं देता है।

इस बयान के बाद एक बार फिर से महिलाओं की आजादी को लेकर बहस शुरू हो गई है। अधिकांश लोग महिलाओं को पुरुषों के बराबर मानते हैं, लेकिन कुछ मुस्लिम उलेमा और मौलवी इन दिनों सठिया गए हैं। कोई औरतों को बच्‍चे पैदा करने की मशीन बता रहा है तो कोई राजनीति में आने की मंशा रखने वाली महिलाओं को मर्द बनने की सलाह दे रहा है।

गुरुवार, मार्च 11, 2010

महिला आरक्षण: दिल्ली अभी बहुत दूर है

महिला आरक्षण विधेयक ने अपने 14 वर्ष के लम्बे सफर में तमाम बाधाओं की वजह से लटकने के बाद पहली विधायी चरण तो पार कर लिया लेकिन लोकसभा और देश की आधी राज्य विधानसभाओं से मंजूरी मिलने और इसे अमल में आने में काफी समय लग सकता है।

यह विधेयक राज्यसभा में पास हुआ है। इसे अभी लोकसभा और कम से कम 15 राज्यों की विधानसभाओं की मंजूरी लेनी होगी। इसलिए अभी इस विधेयक को कई बाधाओं को पार करना है। इसके बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद भी तब तक लागू नहीं किया जा सकता जब तक इसकी प्रक्रियाओं को तय नहीं किया जाता।

उल्लेखनीय है कि अभी विधेयक में 15 साल के लिए महिलाओं को संसद और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण और हर पांच साल के बाद सीटों में क्रमवार बदलाव का विवरण है।

इसे लागू करने की प्रक्रिया तय करनी होगी। यह निर्धारित करना होगा कि पहले पांच वर्षो के लिए किन-किन सीटों को एक तिहाई आरक्षण के तहत आरक्षित किया जाएगा। इसे लागू करने के लिए कोई निश्चित समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है।

दरअसल, महिला आरक्षण विधेयक वास्तव में संविधान संशोधन है जिसका प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत किया गया है, लेकिन इस बात को ध्यान में रखने पर जोर दिया गया है कि इससे संसद के अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़े।

यह ध्यातव्य है कि संविधान संशोधन की प्रक्रिया काफी जटिल है और महिला आरक्षण विधेयक के संबंध में जो प्रक्रिया अपनाई गई है वह संसद के विशेष बहुमत की पद्धति पर आधारित है।

इससे पहले, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की जद्दोजहद इस विधेयक पर आमराय नहीं बन पाने की वजह से बेकार साबित हुई। ज्ञातव्य हो कि 1996 से अलग-अलग सरकारें महिला आरक्षण विधेयक को सदन में पारित कराने की भरपूर कोशिश करती रहीं लेकिन हर बार नाकामी हाथ लगी।
कई बाधाओं के बाद राज्यसभा में ऐतिहासिक रूप से हरी झंडी पाए इस विधेयक को पहली बार 12 सितम्बर 1996 को एच. डी. देवेगौड़ा सरकार ने लोकसभा में पेश किया था।

महिला आरक्षण विधेयक को कानून का रूप लेने के बाद लोकसभा की 543 सीटों में से लगभग आधी (48 प्रतिशत) यानी 263 सीटें आरक्षित हो जाएंगी और केवल 280 सीटें ही सामान्य रह जाएंगी, जिन पर पुरूष या महिला कोई भी चुनाव लड़ सकेगा।

आरक्षण लागू नहीं होने से पहले लोकसभा की 545 सीटों में से 122 अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं। आरक्षण लागू हो जाने पर इनमें से 40 सीटें महिलाओं के हिस्से जाएंगी और केवल 82 आरक्षित सीटों पर पुरूष या महिला कोई भी चुनाव लड़ सकेगा।

महिलाओं के लिए आरक्षित होने वाली लोकसभा की 181 सीटों में से वे 141 बिना आरक्षण वाली और 40 आरक्षित सीटों पर चुनाव लड सकेंगी।

इसी तरह आरक्षण लागू होने पर राज्यों की विधानसभाओं की कुल 4109 सीटों में से 1167 अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए और 1370 महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी और 2942 सीटें सामान्य वर्ग के लिए होंगी।

बुधवार, मार्च 10, 2010

नानाजी देशमुख की स्मृति में














































(प्रख्यात समाजसेवी और पूर्व सांसद चंडीकादास अमृतराव उपाख्य नानाजी देशमुख का गत् 27 फरवरी, 2010 को चित्रकूट में 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया)

रविवार, मार्च 07, 2010

केवल मनरेगा से बदहाली दूर नहीं होगीः प्रो.महाजन


दिल्ली विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के आचार्य एवं राष्ट्रवादी चिंतक प्रो. अश्वनि महाजन ने कहा है कि वित्तीय संकटों के संदर्भ में यह बजट निराशाजनक है। बजट में नये रोजगार उपलब्ध कराने के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। जबकि रोजगार के साधनों का कम होना मुख्य समस्या है।

प्रो. महाजन ने दूरभाष पर बातचीत में कहा कि “लगता है कि सरकार ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ (मनरेगा) को देश के सम्पूर्ण युवकों के लिए रोजगार देने का माध्यम मान बैठी है। जबकि इस योजना से केवल मजदूर स्तर के रोजगार की ही संभावना रहती है।”

प्रो. महाजन ने कहा कि मनरेगा के माध्यम से सरकार वर्ष के 365 में से 100 दिनों के रोजगार देने के नाम पर शेष 265 दिनों की बेरोजगारी की गारंटी लेती है। यह देश की जनता के साथ धोखा है।

उन्होंने कहा कि बेरोजगारी दूर करने के लिए केवल मनरेगा से काम नहीं चलेगा बल्कि स्थाई उपाय करने होंगे औऱ इसके लिए सरकार तैयार नहीं है। यह बजट के प्रति निराशा का प्रमुख कारण है।

कृषि पर चर्चा करते हुए प्रो. महाजन ने कहा कि उत्पादन लगातार अस्थिर बना हुआ है। गन्ने, तेल, चीनी, दलहन सहित अन्य फसलों का उत्पादन घट रहा है। इसका प्रभाव पूरे देश पर पड़ रहा है। बजट में इन सब समस्याओं की अनदेखी की गई है। यह बजट के निराशाजनक होने का दूसरा बड़ा कारण है।

उन्होंने कहा कि सरकार खेती में आधुनिक भंडारण सुविधाओं के लिए विदेश से पैसा लाने का दरवाजा जरूर खोलती है लेकिन खेती में उपज बढ़ाने की चर्चा करना भी मुनासिब नहीं समझती।

उन्होंने कहा कि सरकार यह अच्छी तरह जानती है कि खेती की बदहाली औऱ कालाबाजारी ही महंगाई का प्रमुख कारण है। इसके बावजूद भी महंगाई घटाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है।

उन्होंने कृषि ऋण को पांच प्रतिशत किए जाने पर कहा, ‘यह फैसला काबिले तारीफ है, लेकिन ब्याज दर यदि शूऩ्य प्रतिशत कर दी जाए तो भारत का किसान खुशहाल हो जाएगा और कर्ज के बोझ के कारण आत्महत्याएं करने पर मजबूर नहीं होगा।’

उन्होंने कहा कि किसानों की समस्याएं तभी दूर होंगी जव कृषि को मौलिक स्वरूप देने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाए। केवल बजट में बढ़ोत्तरी कर देना समस्याओं के समाधान के लिए नाकाफी है।

उन्होंने कहा कि सरकार राष्ट्रमण्डल खेलों के लिए हजारों करोड़ रुपए खर्च करने की घोषणा करती है जबकि देश के पूर्वी क्षेत्रों में हरित क्रांति के लिए सिर्फ 400 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार का यह कदम एक छलावा भर है।
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