शुक्रवार, जुलाई 01, 2011

‘छवि निखार’ के निरर्थक प्रयास

पवन कुमार अरविंद
किसी व्यक्ति, संस्था या सरकार की छवि उसके कर्मों से स्वयं ही निर्मित होती है। इसके लिए कोई अतिरिक्त प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होती। छवि के आकलन का कार्य तो देश और समाज के लोगों का विशेषाधिकार है। लेकिन यदि आप अपनी और सरकार की छवि निखारने का अभियान चला रहे हैं तो इस संदर्भ में यही कहा जायेगा कि आप देश व समाज के लोगों का यह विशेषाधिकार भी छीन लेना चाहते हैं?

व्यक्ति, संस्था या सरकार; जैसा कर्म करेगी, समाज के लोग उसका वैसा ही आकलन करेंगे। लेकिन यदि आप गलत कार्य करते हैं और फिर इसकी सफाई देते हैं कि मैं ईमानदार हूं, मेरी सरकार देशहित में कार्य कर रही है। तो आपके तर्कों को कौन मानेगा ? एक नामी चोर भी स्वयं को ईमानदार ही कहता है, तो क्या पुलिस उसका पीछा करना छोड़ देती है, कदापि नहीं। हालांकि, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह निहायत ही ईमानदार हैं, इस बात से देश के लोग भी सहमत हैं। उनकी ईमानदारी पर किसी को शक नहीं है। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि यदि डॉ. सिंह ईमानदार हैं तो उनकी सरकार अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार क्यों साबित हो रही है ? और यदि सरकार भ्रष्ट है तो उनकी ईमानदारी पर शक क्यों नहीं किया जाना चाहिए ?

जनाब, आप स्वयं और अपनी सरकार को कर्मठ व वगैर-वगैरह कहकर क्या साबित करना चाहते हैं ? आप जैसा कहेंगे उसके अनुसार देश और समाज के लोग आपके संदर्भ में आकलन कतई नहीं करेंगे। मीडिया प्रबंधन से किसी व्यक्ति, संस्था या सरकार की असलियत पर पर्दा कैसे डाला जा सकता है? क्या देश की जनता मूर्ख है कि जो आप कहेंगे वही हूबहू मान लेगी? यदि ऐसा नहीं है तो छवि निखारने का यह प्रयास समय की बर्बाद के सिवाय और कुछ नहीं है ?
मीडिया प्रबंधन के माध्यम से क्या आप एक भ्रष्टाचारी और अत्याचारी सरकार की छवि में चार चांद लगाना चाहते हैं? यह तो सम्भव ही नहीं है। क्या आपके कहने का अभिप्राय यह तो नहीं कि कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार में आज तक का सबसे बड़ा घोटाला हुआ ही नहीं है? यदि यह गलत है तो तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा व उनके कुछ सहयोगी अधिकारी और डीएमके सांसद कनिमोझी तिहाड़ जेल की रोटी क्यों तोड़ रहे हैं? उन सभी आरोपियों की जमानत अर्जी विशेष न्यायालय से लेकर उच्चतम न्यायालय ने क्यों खारिज कर दी है? आपके मौजूदा कार्यकाल में जितने भी घोटाले हुए हैं उसकी जिम्मेदारी से आप कैसे बच सकते हैं?

आप यदि कहेंगे कि “मैं कठपुतली प्रधानमंत्री नहीं हूं।” तो आपकी बात को क्या कोई व्यक्ति सहर्ष स्वीकार लेगा? आखिर आपको मीडिया के कुछ चुनिंदा संपादकों के समक्ष बार-बार यह कहना क्यों पड़ रहा है कि “मेरी सरकार ठीक से कार्य कर रही है, देशहित में कदम उठा रही है।”

यदि कोई व्यक्ति, संस्था या सरकार जनहित के कार्य कर रही है तो कोई ईमानदार सम्पादक अपने लेखों और सम्पादकीय में उसकी चर्चा किये बिना कैसे रह सकता है? यदि वह सम्पादक ईमानदार है तो उसकी चर्चा स्वयं की प्रेरणा से करेगा। इसके लिये किसी प्रबंधन की आवश्यकता नहीं होती। कोई कितना भी बड़ा सम्पादक क्यों न हो वह अपने लाख पृष्ठों की आलेख से भी किसी व्यक्ति की छवि को न तो परिवर्तित कर सकता है और न ही उसमें चार चांद लगा सकता है।

मीडिया प्रबंधन स्वयं में श्रेष्ठ उद्देश्य से किया गया एक श्रेष्ठ कार्य होता है। आप जो कहना चाहते हैं वो बातें उसी अर्थ में समाचार-पत्रों में प्रकाशित हों, उसका उचित कवरेज हो, आपकी कही गयी बातों का कहीं दूसरा अर्थ न निकाल लिया जाये, इसलिए प्रबंधन की आवश्यक होती है। बजाय इसके कि मीडिया प्रबंधन छवि निखार का जरिया बने, यह तो निरर्थक प्रयास है। मीडिया जगत के अधिकांश लोग यह मानने को कतई तैयार नहीं है कि सम्पादकों के साथ डॉ. मनमोहन सिंह की बातचीत से केंद्र सरकार की छवि पर रत्ती भर भी कोई असर पड़ने वाला है।

सोमवार, जून 27, 2011

अनशन की लोकतांत्रिक मर्यादा

पवन कुमार अरविंद

लोकपाल के शीघ्र निर्माण को लेकर अन्ना हजारे सहित सभी सत्पुरुष समाज की बेचैनी स्वाभाविक ही है। लेकिन जो लोकपाल इन भ्रष्ट नेताओं के कारण पिछले 43 वर्षों से कानून का रूप नहीं ले सका है, क्या वह उनकी जिद से मात्र एक या दो सप्ताह में ही कानून का रूप ले सकता है? भ्रष्टाचारमुक्त भारत का निर्माण सभी सत्पुरुष समाज की इच्छा है, लेकिन इसको लेकर चलाये जा रहे आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं को थोड़ा धैर्य रखना चाहिए। धैर्य खो देने से स्थितियां बनती नहीं बल्कि और बिगड़ जाती हैं। सरकार को बार-बार अनशन करने की धमकी देकर अपने को महत्वहीन नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र में अनशन एक हथियार जरूर है लेकिन विधेयक निर्माण की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लगने वाले समय के संदर्भ में अनशन रूपी यह हथियार क्या कर सकेगा ? लोकपाल का इंतजार करते-करते जैसे 43 वर्ष बीत गये वैसे ही केवल एक या दो महीने और रुक जाने में कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा ?

अन्ना ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन करके केंद्र सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। इस चार दिवसीय अनशन ने उनको और देश को बहुत कुछ दिया है। उन्होंने मात्र इतने दिन में ही अपने लिए वह दर्जा हासिल कर लिया है जो लोग जीवन भर संघर्ष करके भी नहीं पाते। फिर भी अन्ना को किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए। उनको यह सोचना चाहिए कि अनशन की एक सीमा व मर्यादा है और देशवासियों की मर्यादित इच्छा ही लोकतंत्र है।

अन्ना जैसे लोगों को देश के लिए मरने से बेहतर विकल्प जीवित रहकर देश की सेवा करना है। क्योंकि ऐसे लोग बिरले ही होते हैं। अनशन की जिद में अपना प्राणोत्सर्ग कर देना कहीं की बुद्धिमानी नहीं कही जायेगी। यह चर्चा इसलिए आवश्यक प्रतीत हो रही है क्योंकि अन्ना ने 16 अगस्त से पुन: अनशन करने की घोषणा की है। लेकिन लोकपाल पर सरकार के रूख को देखते हुए अन्ना को यह समझना चाहिए कि इस बार केंद्र सरकार के कर्ता-धर्ता; उनको पहले अनशन जैसा महत्व नहीं देंगे। सरकार का इस प्रकार का संभावित रुख; लोकपाल विधेयक मसौदा समिति के सरकारी सदस्य तथा केंद्रीय जल संसाधन विकास मंत्री सलमान खर्शीद के जमशेदपुर में सोमवार को दिये उस बयान से भी स्पष्ट हो जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था- “अन्ना हजारे अगर 16 अगस्त से अनशन करते हैं तो यह सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था (संसद) का विरोध होगा। और इसके बाद उनका क्या हश्र होगा, यह नहीं कहा जा सकता।”

कहीं ऐसा न हो कि अपने दूसरे अनशन के दौरान अन्ना की हालत ज्यादा बिगड़ जाये और सरकार की नाक पर जूँ तक न रेंगे। ऐसी स्थिति में अन्ना को अपना अनशन तोड़ने के लिए कहीं बीच का रास्ता न अख्तियार करना पड़ जाये। यदि ऐसा होगा तो अन्ना अपनी जिद के कारण कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ इस अभियान को ही चोट पहुंचायेंगे। जैसे योग गुरू स्वामी रामदेव रामलीला मैदान में दिल्ली पुलिस के दमनात्मक कार्रवाई को देखकर महिलाओं की लिबास पहनकर अपनी जान बचाने के लिए भाग खड़े हुए थे। नेतृत्वकर्ताओं का ऐसा आचरण किसी भी आंदोलन की धार को कमजोर करता है, साथ ही उनके प्रति जनता के विश्वास को भी कम करता है। जो लोग नेतृत्वकर्ता हैं उनको अपनी जान की परवाह किये बगैर अपने पीछे खड़ी जनता और आंदोलन की दीर्घकालिक रणनीति; पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

वैसे आजादी के बाद से अनशन करते कई लोगों की मौत हो चुकी है। सरकार में शामिल कुछ लोग चाहेंगे कि अनशन करते अन्ना अपनी मौत मर जायें, साथ ही यह आंदोलन भी अधमरा हो जाये ! उनका मरना कतई देशहित में नहीं कहा जा सकता। बार-बार अनशन की धमकी देने से बेहतर लोकतांत्रिक विकल्प नगर, ग्राम, डगर-डगर जाकर जनता को जागृत करना हो सकता है। उनके इस कदम से सरकार ज्यादा भयभीत होगी।

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि देश की 121 करोड़ की आबादी में से मात्र पांच सदस्यों वाली कथित सिविल सोसायटी के सदस्य देश की किस संस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं? उनका देश की जनता के प्रति उत्तरदायित्व क्या है? हालांकि जब कोई व्यक्ति देश और समाज के हित में श्रेष्ठ उद्देश्यों को लेकर संघर्ष करता है तो समाज के ही लोग कई प्रकार की बातें करने लगते हैं, लेकिन ध्येय-पथ के अनुगामी को इन सब बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। इस प्रकार की बातों में कोई दम नहीं होता है।

माना कि अन्ना और उनके द्वारा उठाये गये कालेधन व भ्रष्टाचार के मुद्दों में दम है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होता कि आप संसदीय परम्पराओं की इज्जत मत करिये। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने जीवन काल में अंग्रेजों के विरुद्ध सैकड़ों आंदोलन चलाये और जेल की यातनायें सहीं, लेकिन उन्होंने इस संदर्भ में हर प्रकार की मर्यादा का ध्यान रखा, जबकि वह भलीभांति जानते थे कि अंग्रेज हर तरह से अमर्यादित आचरण कर रहे हैं। इस संदर्भ में महात्मा गांधी के अनुयायी अन्ना; गांधी से क्यों नहीं सीखते हैं ? यदि गांधी से प्रेरणा लें तो कालेधन और भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए चलाये जा रहे इस अभियान को और बल ही मिलेगा, जो इस भ्रष्टाचारी व अत्याचारी केंद्र सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर देगा।

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