शुक्रवार, नवंबर 18, 2011

पुस्तक समीक्षा

राष्ट्र निर्माण में संन्यासियों की महती भूमिका है

पवन कुमार अरविंद

इस धरा पर भारत ही एक ऐसा देश है जिसका नेतृत्व राजसत्ता ने कभी नहीं किया। हमारा समाज सदैव धर्म के आधार पर ही टिका रहा। राजाओं के युद्ध चलते रहते थे। कोई क्षेत्र कभी इधर, कभी उधर आता-जाता रहा होगा; परंतु समाज इन सब बातों से अलिप्त रहता था। गांव की व्यवस्था, कुलधर्म, व्यक्तित्व सब यथावत चलते रहते थे। देश में अनेक आततायी राज्यकर्ता आये और चले गये। समाज ने कष्ट भोगा; पर समाप्त नहीं हुआ। परम्पराओं में, संस्कारों में कुछ विरलता आई होगी; परन्तु पूर्णत: लुप्त नहीं हुई। साधु-संतों ने अत्याचारी शासक को समाप्त कर, उसी कुल के एक सात्विक वृत्ति के व्यक्ति को राज्य का भार सौंपा।

आचार्य चाणक्य, समर्थ गुरु रामदास, गुरुनानक, देव जी महाराज, सूरदास, तुलसीदास, संत रविदास... ये तो कुछ चिर-परिचित नाम हैं जिन्होंने अपने-अपने काल में समाज के मनोबल को बनाये रखा। ये सभी भारत की महान विभूतियां हैं। इसके अलावा और भी विभूतियां हैं लेकिन उनका नाम ज्यादा प्रकाश में नहीं आ पाता। इन प्रचलित विभूतियों के साथ ही ‘लुप्त विभूतियों’ को भी प्रकाश में लाने का कार्य वरिष्ठ पत्रकार व सुपरिचित लेखक श्री विजय कुमार ने अपनी नई पुस्तक ‘सेवा पथ पर संन्यासी’ में बखूबी किया है।

पुस्तक में कुल 152 पृष्ठ हैं। इसमें स्वामी रामसुखदास, स्वामी विवेकानंद, महेश योगी, स्वामी रामभद्राचार्य, दादा लेखराज, रघुवीर समर्थ, स्वामी प्रणवानंद, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, महात्मा रामचंद्र वीर, तुड़को जी महाराज, तुलसीराम प्रभु, भगत पूर्ण सिंह और स्वामी निगमानंद, दंडी स्वामी विरजानंद, हरिवंश महाप्रभु, बाबा बुड्ढा, स्वामी हरिदास, रमण महर्षि, पंडित श्रद्धाराम फिल्लौर, महानामव्रत जी और स्वामी विद्यागिरि सहित कुल 71 साधु-संतों की जीवनी व राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान का संकलन है।

पुस्तक का नाम : सेवा पथ पर संन्यासी
लेखक : विजय कुमार
प्रकाशक : साहित्य एवं दृक् श्राव्य सेवा न्यास, नई दिल्ली।
पृष्ठ : 152, मूल्य : 75/-

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