रविवार, अगस्त 01, 2010

'राम को नकारना कठिन ही नहीं असंभव भी’


राजधानी के दरियागंज स्थित प्रकाशन संस्थान द्वारा हाल ही में प्रकाशित एक पुस्तक में भगवान राम के अस्तित्व को नकारने की प्रवृत्ति का कड़ा प्रतिवाद किया गया है और दलील दी गई है कि इसका सीधा अर्थ तो यह हुआ कि बाकायदा आज भी मौजूद अयोध्या तथा सरयू समेत श्रीराम से जुडे़ तमाम स्थान एवं प्रतीक भी काल्पनिक हैं।

प्रसिद्ध लेखक डॉ. भगवती शरण मिश्र ने अपनी पुस्तक ‘मैं राम बोल रहा हूँ’ में लिखा है- ‘राम को नकारने वालों को सरयू, अयोध्या, चित्रकूट, कनक भवन, लक्ष्मण किला, हनुमान गढ़ी, रामेश्वरम, जनकपुर आदि को भी नकारना होगा।’

इस पुस्तक में राम को उत्तम पुरुष एक वचन की भूमिका में पाठकों को प्रत्यक्ष रूप से संबोधित करते हुये दर्शाया गया है। लेखक वर्तमान परिस्थितियों पर भगवान राम के ही मुंह से बेबाक टिप्पणियां करता है और कहता है कि राम को नकारना तो बहुत आसान है पर उनके प्रतीकों को मिटाना दुष्कर ही नहीं असम्भव भी है।

डॉ. मिश्र ने भगवान राम के माध्यम से जो दलीलें दी हैं, वे उन्हीं के शब्दों में इस प्रकार हैं- 'राम को नकारोगे तो अयोध्या को भी नकारना पडे़गा। इस पूरे नगर और इसमें गली-गली में स्थित मंदिरों, मठों के अस्तित्व को भी झुठलाना होगा। इसकी विभिन्न छोटी, बडी इमारतों को भी क्योंकि तब ये सभी एक कल्पना प्रसूत नगर के अंश हो जाएंगे। अयोध्या को नकारो तो कनक भवन के सदृश करोड़ो रुपयों से निर्मित विशाल मंदिर को भी नकारना होगा क्योंकि उसमें राम-सीता अवस्थित हैं और सरयूतीर स्थित वह भव्य लक्ष्मण किला इसे तो लक्ष्मण द्वारा ही निर्मित किया गया था। उसके अस्तित्व को भी नकारना होगा। एक मिथ्या को मिटाना होगा।'

डॉ. मिश्र कहते हैं- 'और देखा है वह हनुमान गढ़ी, किलानुमा यह भव्य उच्च प्रासाद जिसमें हनुमान और उनकी माता अंजना की मूर्तियां स्थापित हैं। लक्ष्मण और सीता के भी विग्रह हैं इसमें। अयोध्या की पहचान ही है यह। दूर से ही इसका शिखर दृष्टिगोचर होता है। तो उसे भी नकारोगे या एक मिथ्या को ढोये चलेगी यह सरकार। जब ये सब नहीं रहेंगे तो अयोध्या एक श्मशान ही तो बन जाएगा। यहां के श्रद्धालु, साधक, संत और साधु कहीं और पलायन को बाध्य होंगे। पर इस पर भी ध्यान दिया है कि यह तीर्थ नगरी एक पर्यटन स्थल भी है। हजारों लोग यहां की आय पर पलते हैं। अयोध्या को नकारोगे तो जिस नदी के तट पर यह बसा है, उस सरयू को भी नकारने में क्यों पीछे रहो। यह कल्पित न भी हो पर कल्पितों द्वारा यह अपवित्र कर दी गयी है। पवित्रता और अपवित्रता पर तुम विश्वास नहीं भी करोगे तो यह सलिल वाहिनी अपनी अर्थवत्ता तो खो ही चुकी है। रामबंधुओं ने इसकी पूजा-अर्चना की। इसमें स्नान करके अपने को धन्य किया। वसिष्ठ, विश्वामित्र के सदृश कल्पित ऋषि-मुनियों ने इसमें सांध्य वन्दन किया। इसके किनारे यज्ञ जाप हुए। राम के श्रद्धालुओं ने इसके जल में डुबकियां लगायीं, आज भी लगाते हैं।'

उन्होंने लिखा है- 'इस सरयू का क्या करोग, इसे सुखा दोगे, यह तुम्हारे वश की बात नहीं। फिर इसके उद्गम पर ही रोक लगा दो। कुछ कोसों तक भूमि ही जलमग्न होगी न, कुछ लोग ही तो विस्थापित होंगे। तुम्हें इसकी चिन्ता नहीं। नर्मदा-परियोजना में तुमने यह सब देखा-झेला है। तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ा है, अब भी नहीं बिगड़ेगा। एक अर्थहीन नदी से तो मुक्ति मिलेगी। पर ध्यान देना, तुम्हारे देश की नदियां ही तुम्हारी जीवन रेखा हैं। इसके किनारे ही नगर-गांव आबाद हुये हैं। सभ्यता-संस्कृति पनपी है। तुम्हारा देश कृषि प्रधान है। कृषि के लिये जल चाहिए। सरयू को मिटाओगे तो इसके तीर बसे नगर-गांव उजड़ जायेंगे। सहस्त्रों की संख्या में इन उजड़े लोगों का क्या करोगे, भारी समस्या है। कुछ बोलने, कुछ करने से पहले सोचना आवश्यक है।’

संस्कृत के एक कथन के माध्यम से डॉ. मिश्र लिखते हैं- 'सहसा अभिहितं कार्य न कर्त्तव्यम, अर्थात सहसा कोई कार्य मस्तिष्क में आये तो न करो। इसे तर्क की कसौटी पर कसो। सोचो-विचारो। करणीय हो तो करो। न करणीय हो तो नहीं करो। सरयू और अयोध्या को नकराने से ही राम का नकारना पूरा नहीं होता बल्कि इसके लिए बहुत कुछ नकारना होगा।'

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