शुक्रवार, अप्रैल 13, 2012

किस ‘गणित’ का उत्सव?

प्रो. चंद्रकांत राजू

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 2012 को ‘राष्ट्रीय मैथमेटिक्स वर्ष’ घोषित किया है। इसमें एक ऐसी गंभीर विडंबना छुपी है, जो सभी को जाननी चाहिए। इसे समझने के लिए पहले थोड़ा इतिहास में झांककर देखते हैं। यूरोप ने सामान्य गणित भारत से ही सीखा।

इससे पहले यूरोपीय आदिम अंकगणक (अबाकस) का प्रयोग करते थे। भारतीय गणित अपनी दक्षता के लिए विश्व प्रसिद्ध था। यहां से वह बगदाद गया, जहां अल ख्वारिज्मी ने नौवीं सदी में ‘हिसाब अल हिंद’ नामक किताब लिखी, जो अल ख्वारिज्मी के लातिनी नाम अल्गोरिस्मस से प्रसिद्ध हुई। फ्लोरेंस के व्यापारियों ने झट समझा कि बेहतर गणित से लेन-देन में फायदा है। उन्होंने अल्गोरिस्मस सीखा और अबाकस ठुकराया।

यूरोपीय कैलेंडर यूरोपियनों के गणित के अज्ञान की कहानी बताता है। चंद्र और सौर चक्र दोनों ही आंशिक दिनों में पूरे होते हैं, लेकिन यूरोपीय स्फुट भिन्न नहीं जानते थे। वे माह को चंद्र चक्र के साथ न जोड़ सके। इसके बजाय रोमन तानाशाहों की स्तुति के लिए जुलाई और अगस्त का नाम जूलियस और ऑगस्तस के नाम पर किया और उनके सम्मान में उन महीनों में एक-एक दिन और जोड़ दिए। यह दो दिन फरवरी से चुराए गए।

परिणाम एक पूरी तरह से अवैज्ञानिक कैलेंडर है, जिसमें महीने कभी 28, 29 या फिर 30 अथवा 31 दिनों के होते हैं। इसी कैलेंडर को पश्चिम ने अपना धार्मिक कैलेंडर बनाया, लेकिन भारत में तीसरी सदी के सूर्य सिद्धांत और पांचवीं सदी के आर्यभट दोनों ने (नाक्षत्र) वर्ष की कहीं अधिक सटीक अवधि दी है।राजसत्ता हाथ में होने के कारण रोमन साम्राज्य की किताबों तक पूरी पहुंच थी, लेकिन इसके बावजूद वे अपने कैलेंडर में सुधार नहीं कर पाए।

इन असफलताओं से साबित होता है कि दरअसल उनके पास खगोल विज्ञान की कोई अच्छी किताबें थीं ही नहीं। अरबी अल्माजेस्ट एक संवर्धनशील किताब है, लेकिन पश्चिमी इतिहासकार उसका एकमात्र लेखक क्लॉडियस टॉलेमी को बताते हैं। इस ग्रंथ में ऊष्णकटिबंधीय वर्ष की एक बेहतर अवधि है, लेकिन यह भी रोमन कैलेंडर में कभी शामिल नहीं हुआ।

विज्ञान के लिए गणित के उच्च अनुप्रयोगों के लिए कैलकुलस (कलन) जरूरी है। यह भी यूरोपियों ने भारत से ही सीखा। कलन का आविष्कार पांचवीं सदी में पटना के गणितज्ञ आर्यभट ने किया। आर्यभट ने कलन का इस्तेमाल कर ज्या (साइन) आदि का कला (पांच दशमलव स्थान) तक सही मान निकाला।

अगले हजार वर्षो में इस तकनीक को केरल के आर्यभट स्कूल ने आगे बढ़ाया। उत्तर-दक्षिण और जाति का विभाजन दोनों को मिटाते हुए इसमें उच्चतम जाति के नंबूदरी ब्राह्मण शामिल थे। उन्होंने ज्या आदि का सही मान विकला और तत्परा (9 दशमलव स्थान) तक निकाला। ऐसी अद्भुत परिछिन्नता क्यों? इसने कौन-सी सामाजिक जरूरत पूरी की? सरल जवाब यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था वष्र आधारित थी, इसलिए वर्षा के मौसम को जानना बहुत जरूरी था।

अत: एक ऐसा कैलेंडर जरूरी है, जो वर्षा ऋतु का सही आकलन करे। ऐसा कैलेंडर बनाने के लिए सटीक खगोलीय मॉडल और सटीक त्रिकोणमितीय मान जरूरी थे। भारत में धन का अन्य स्रोत विदेशी व्यापार था, जिसके लिए सटीक नाविक शास्त्र जरूरी था, और इसलिए भी सही त्रिकोणमितीय मान आवश्यक थे।

पश्चिमी इतिहासकारों ने पांचवीं सदी से लगातार अपना महिमागान कर गैर-पश्चिमियों को नीचा ठहराया है, इसलिए उन्होंने भारत से कलन सीखना कभी नहीं स्वीकारा। सदियों तक कलन न्यूटन और लाइबनिट्स का आविष्कार बताया जाता रहा। इस झूठे इतिहास में बड़ी ताकत थी।

इसी के सहारे मैकॉले ने भारत में पश्चिमी शिक्षा प्रणाली चालू की, जो उपनिवेशवाद के लिए बहुत जरूरी थी। परिणाम यह कि अब स्कूल से ही बच्चे बड़े गर्व से टाई पहनना सीख जाते हैं और कभी कोई प्रश्न तक नहीं उठाता कि यह भारतीय मौसम के अनुकूल है या नहीं। आंख मूंदकर पश्चिम की गलतियों की भी नकल करने के कारण कुछ लोग हिंदी को अंग्रेजी लहजे में बोलते हैं तो कुछ के द्वारा ठाकुर को बदलकर टैगोर कर दिया जाता है।

जाहिर है, वे ग्रेगोरियन कैलेंडर और एडीबीसी अंधविश्वास सीखते हैं। ये पश्चिमी ‘शिक्षित’ भारतीय कैलेंडर पर महीने के नाम तक नहीं बता सकते। सभी भारतीय त्योहारों की तिथि भारतीय कैलेंडर द्वारा निर्धारित होती हैं, लेकिन ग्रेगोरियन कैलेंडर पर उनकी तारीख बदलती है। यह सांस्कृतिक अलगाव के लिए आमंत्रण है। कई त्योहार कृषि से जुड़े हैं, तो एक दुखद परिणाम समकालीन कृषि क्षेत्र में है। ग्रेगोरियन कैलेंडर में बरसात के मौसम की कोई अवधारणा ही नहीं है।

पिछले दशक में कई बार ग्रेगोरियन कैलेंडर पर मानसून देरी से आया। सूखे की झूठी प्रत्याशा के बाद हमने 2003, 2004 और 2009 में बाढ़ देखी। लेकिन बारिश भारतीय कैलेंडर के अनुसार समय पर आई थी। मानसून में देर थी या कैलेंडर गलत था? भरपूर वर्षा के बावजूद गरीब किसान बर्बाद हो गए।

अब हम विडंबना को समझ सकते हैं। विडंबना यह है कि ‘मैथमेटिक्स का राष्ट्रीय साल’ पश्चिमी मानकों पर आधारित है। क्या हम गणित में यूरोपीय ऐतिहासिक अज्ञान को प्रणाम करना चाहते हैं? कृषि के लिए भारतीय कैलेंडर की व्यावहारिक उपयोगिता को नकारना, किसानों की आत्महत्या के घाव पर नमक छिड़कना है।

यह कृषि के बहुराष्ट्रीयकरण और किसान के सर्वहाराकरण में मदद करना है। चांद पर मनुष्य को भेजने जैसे उच्च तकनीकी प्रयोजनों के लिए भी आज तक आर्यभट के अंतर समीकरणों को हल करने की सांख्यिकी विधि उपयोगी है तो सवाल उठता है कि सरकार किस गणित का जश्न मनाना चाहती है? करोड़ों छात्रों को गणित कठिन लगता है और वे इसे स्कूल में ही ड्रॉप कर देते हैं। क्या ‘राष्ट्रीय मैथमेटिक्स वर्ष’ में इसके लिए कोई उम्मीद है? मैथमेटिक्स और गणित में मौलिक भेद है।

गणित व्यवहार से जुड़ा है, जबकि मैथमेटिक्स का संबंध आत्मज्ञान से है। अफलातून ने कहा था कि संगीत की ही तरह मैथमेटिक्स को भी आत्मा की भलाई के लिए सीखना चाहिए। पश्चिमी तत्व मीमांसा ने मैथमेटिक्स को और जटिल बना दिया। लेकिन हमारी रुचि अनुप्रयोगों में है या तत्व मीमांसा में?

विज्ञान और इंजीनियरिंग के छात्र व्यावहारिक उपयोग के लिए गणित सीखते हैं तो सरल समाधान तो यही होगा कि हम उन्हें व्यावहारिक गणित ही पढ़ाएं। यह समाज वैज्ञानिकों के लिए भी उपयोगी है और उन प्रबंधकों के लिए भी, जो करोड़ों के निवेश के खतरे खुद समझना चाहते हैं। (Courtesy : Dainik Bhaskar)

(लेखक : प्रो. चंद्रकांत राजू, मलेशिया स्थित विज्ञान विश्वविद्यालय में गणित के प्राध्यापक हैं। उन्होंने विज्ञान और गणित पर कई पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें से एक पुस्तक- “क्या विज्ञान पश्चिम में शुरू हुआ?” बहुत चर्चित है। इसका विमोचन 11 सितम्बर 2009 को नई दिल्ली स्थित हिंदी भवन में हुआ था।)

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