रविवार, मार्च 07, 2010

केवल मनरेगा से बदहाली दूर नहीं होगीः प्रो.महाजन


दिल्ली विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के आचार्य एवं राष्ट्रवादी चिंतक प्रो. अश्वनि महाजन ने कहा है कि वित्तीय संकटों के संदर्भ में यह बजट निराशाजनक है। बजट में नये रोजगार उपलब्ध कराने के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। जबकि रोजगार के साधनों का कम होना मुख्य समस्या है।

प्रो. महाजन ने दूरभाष पर बातचीत में कहा कि “लगता है कि सरकार ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ (मनरेगा) को देश के सम्पूर्ण युवकों के लिए रोजगार देने का माध्यम मान बैठी है। जबकि इस योजना से केवल मजदूर स्तर के रोजगार की ही संभावना रहती है।”

प्रो. महाजन ने कहा कि मनरेगा के माध्यम से सरकार वर्ष के 365 में से 100 दिनों के रोजगार देने के नाम पर शेष 265 दिनों की बेरोजगारी की गारंटी लेती है। यह देश की जनता के साथ धोखा है।

उन्होंने कहा कि बेरोजगारी दूर करने के लिए केवल मनरेगा से काम नहीं चलेगा बल्कि स्थाई उपाय करने होंगे औऱ इसके लिए सरकार तैयार नहीं है। यह बजट के प्रति निराशा का प्रमुख कारण है।

कृषि पर चर्चा करते हुए प्रो. महाजन ने कहा कि उत्पादन लगातार अस्थिर बना हुआ है। गन्ने, तेल, चीनी, दलहन सहित अन्य फसलों का उत्पादन घट रहा है। इसका प्रभाव पूरे देश पर पड़ रहा है। बजट में इन सब समस्याओं की अनदेखी की गई है। यह बजट के निराशाजनक होने का दूसरा बड़ा कारण है।

उन्होंने कहा कि सरकार खेती में आधुनिक भंडारण सुविधाओं के लिए विदेश से पैसा लाने का दरवाजा जरूर खोलती है लेकिन खेती में उपज बढ़ाने की चर्चा करना भी मुनासिब नहीं समझती।

उन्होंने कहा कि सरकार यह अच्छी तरह जानती है कि खेती की बदहाली औऱ कालाबाजारी ही महंगाई का प्रमुख कारण है। इसके बावजूद भी महंगाई घटाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है।

उन्होंने कृषि ऋण को पांच प्रतिशत किए जाने पर कहा, ‘यह फैसला काबिले तारीफ है, लेकिन ब्याज दर यदि शूऩ्य प्रतिशत कर दी जाए तो भारत का किसान खुशहाल हो जाएगा और कर्ज के बोझ के कारण आत्महत्याएं करने पर मजबूर नहीं होगा।’

उन्होंने कहा कि किसानों की समस्याएं तभी दूर होंगी जव कृषि को मौलिक स्वरूप देने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाए। केवल बजट में बढ़ोत्तरी कर देना समस्याओं के समाधान के लिए नाकाफी है।

उन्होंने कहा कि सरकार राष्ट्रमण्डल खेलों के लिए हजारों करोड़ रुपए खर्च करने की घोषणा करती है जबकि देश के पूर्वी क्षेत्रों में हरित क्रांति के लिए सिर्फ 400 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार का यह कदम एक छलावा भर है।

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