गुरुवार, मार्च 11, 2010

महिला आरक्षण: दिल्ली अभी बहुत दूर है

महिला आरक्षण विधेयक ने अपने 14 वर्ष के लम्बे सफर में तमाम बाधाओं की वजह से लटकने के बाद पहली विधायी चरण तो पार कर लिया लेकिन लोकसभा और देश की आधी राज्य विधानसभाओं से मंजूरी मिलने और इसे अमल में आने में काफी समय लग सकता है।

यह विधेयक राज्यसभा में पास हुआ है। इसे अभी लोकसभा और कम से कम 15 राज्यों की विधानसभाओं की मंजूरी लेनी होगी। इसलिए अभी इस विधेयक को कई बाधाओं को पार करना है। इसके बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद भी तब तक लागू नहीं किया जा सकता जब तक इसकी प्रक्रियाओं को तय नहीं किया जाता।

उल्लेखनीय है कि अभी विधेयक में 15 साल के लिए महिलाओं को संसद और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण और हर पांच साल के बाद सीटों में क्रमवार बदलाव का विवरण है।

इसे लागू करने की प्रक्रिया तय करनी होगी। यह निर्धारित करना होगा कि पहले पांच वर्षो के लिए किन-किन सीटों को एक तिहाई आरक्षण के तहत आरक्षित किया जाएगा। इसे लागू करने के लिए कोई निश्चित समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है।

दरअसल, महिला आरक्षण विधेयक वास्तव में संविधान संशोधन है जिसका प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत किया गया है, लेकिन इस बात को ध्यान में रखने पर जोर दिया गया है कि इससे संसद के अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़े।

यह ध्यातव्य है कि संविधान संशोधन की प्रक्रिया काफी जटिल है और महिला आरक्षण विधेयक के संबंध में जो प्रक्रिया अपनाई गई है वह संसद के विशेष बहुमत की पद्धति पर आधारित है।

इससे पहले, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की जद्दोजहद इस विधेयक पर आमराय नहीं बन पाने की वजह से बेकार साबित हुई। ज्ञातव्य हो कि 1996 से अलग-अलग सरकारें महिला आरक्षण विधेयक को सदन में पारित कराने की भरपूर कोशिश करती रहीं लेकिन हर बार नाकामी हाथ लगी।
कई बाधाओं के बाद राज्यसभा में ऐतिहासिक रूप से हरी झंडी पाए इस विधेयक को पहली बार 12 सितम्बर 1996 को एच. डी. देवेगौड़ा सरकार ने लोकसभा में पेश किया था।

महिला आरक्षण विधेयक को कानून का रूप लेने के बाद लोकसभा की 543 सीटों में से लगभग आधी (48 प्रतिशत) यानी 263 सीटें आरक्षित हो जाएंगी और केवल 280 सीटें ही सामान्य रह जाएंगी, जिन पर पुरूष या महिला कोई भी चुनाव लड़ सकेगा।

आरक्षण लागू नहीं होने से पहले लोकसभा की 545 सीटों में से 122 अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं। आरक्षण लागू हो जाने पर इनमें से 40 सीटें महिलाओं के हिस्से जाएंगी और केवल 82 आरक्षित सीटों पर पुरूष या महिला कोई भी चुनाव लड़ सकेगा।

महिलाओं के लिए आरक्षित होने वाली लोकसभा की 181 सीटों में से वे 141 बिना आरक्षण वाली और 40 आरक्षित सीटों पर चुनाव लड सकेंगी।

इसी तरह आरक्षण लागू होने पर राज्यों की विधानसभाओं की कुल 4109 सीटों में से 1167 अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए और 1370 महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी और 2942 सीटें सामान्य वर्ग के लिए होंगी।

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