मंगलवार, जुलाई 27, 2010

रामजन्मभूमि के स्वामित्व पर न्यायालय का फैसला सुरक्षित


अगस्त-सितंबर का महीना भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के हिंदुओं के लिए खुशी का महीना साबित हो सकता है। क्योंकि उनके आराध्य देव मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या के मालिकाना हक से संबंधित मुकदमे की सुनवाई न्यायालय ने पूरी कर ली है और इस मामले पर बहुप्रतिक्षित फैसला अगस्त या सितंबर महीने में कभी भी आने की संभावना है।

संभावना इसलिए भी है क्योंकि मामले की सुनवाई कर रही इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ की त्रि-सदस्यीय पूर्ण पीठ के न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी.वी. शर्मा सितंबर के अंत में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। न्यायमूर्ति शर्मा के अतिरिक्त न्यायमूर्ति एस.यू. खान और न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल भी इस पीठ के सदस्य हैं।

न्यायालय ने संबंधित पक्ष के वकीलों को पहले ही निर्देशित कर दिया था कि वह हर हालत में आज ही अपनी बात पूरी कर लें। इसलिए न्यायालय ने लीक से हटकर सोमवार को सायं 7 बजे तक अपनी सुनवाई जारी ऱखी।

इसी के साथ न्यायालय ने सभी पक्षों को अपनी मौखिक जिरह लिखित रूप में प्रस्तुत करने के लिए अंतिम तारीख 30 जुलाई निर्धारित की है।

उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ के तीन न्यायाधीशों की एक पूर्ण पीठ वर्ष 1996 से इस मामले की मौलिक सुनवाई कर रही थी।

मुकदमे में चार पक्षकार हैं। हिंदुओं की ओर से तीन पक्षकार हैं जिसमें एक प्रमुख पक्षकार विवादित परिसर में विराजमान रामलला स्वयं हैं। शेष श्री गोपाल सिंह विशारद और निर्मोही अखाड़ा हैं, जबकि मुस्लिम पक्ष की ओर से सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड पक्षकार है।

उल्लेखनीय है कि गोपाल सिंह विशारद ने रामलला के एक भक्त के रूप में निर्बाध दर्शन-पूजन की अनुमति के लिए जनवरी 1950 में अपना मुकदमा फैजाबाद जिला अदालत में दायर किया था।

वर्ष 1959 में निर्मोही अखाड़े ने अपना मुकदमा जिला अदालत में दायर कर अदालत से मांग की थी कि सरकारी रिसीवर हटाकर जन्मभूमि मंदिर की संपूर्ण व्यवस्था का अधिकार अखाड़े को सौंपा जाय।

दिसंबर 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड अदालत में गया। बोर्ड ने अदालत से मांग की कि विवादित ढांचे को मस्जिद घोषित किया जाए, वहां से रामलला की मूर्ति और अन्य पूजा सामग्री हटाई जाएं तथा परिसर का कब्जा सुन्नी वक्फ बोर्ड को सौंपा जाए।

जुलाई 1989 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवा निवृत्त न्यायाधीश श्री देवकीनंदन अग्रवाल ने एक भक्त के रूप में खुद को रामलला का अभिन्न मित्र घोषित करते हुए न्यायालय के समक्ष रामलला की ओर से वाद दाखिल किया।

इस प्रकार रामजन्मभूमि के मुकदमे में रामलला स्वयं ही वादी बन गए। श्री अग्रवाल ने अपने वाद में कहा कि मेरे लिए तो जन्मभूमि स्थान ही देवता स्वरूप हैं और रामलला के विग्रह पर किसी का कब्जा नहीं हो सकता।

40 साल तक मुकदमा फैजाबाद जिला अदालत में लंबित पड़ा रहा। शीघ्र सुनवाई के लिए उच्चतम न्यायालय के आदेश से सभी मुकदमे सामूहिक सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ को सौंपे गए।

इसी बीच 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा कारसेवकों की उग्र भीड़ ने जमींदोज कर दिया। अक्तूबर 1994 में उच्चतम न्यायालय ने विवाद के मामले में अंतिम निर्णय की सारी जिम्मेदारी उच्च न्यायालय के हवाले कर दी। तब से उच्च न्यायालय इस मामले की निरंतर सुनवाई कर रहा है।

उच्च न्यायालय ने मामले की अबाध सुनवाई के लिए विशेष अदालत का गठन कर संपूर्ण मामला दो हिंदू और एक मुस्लिम जज की पूर्ण पीठ के हवाले कर दिया। उच्च न्यायालय ने मुकदमे से जुड़े सभी पक्षों के गवाहों के बयान सुने।

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय से वर्ष 1993 में एक प्रश्न पूछा गया था कि क्या विवादित स्थल पर 1528 ईस्वी के पहले कभी कोई हिंदू मंदिर था अथवा नहीं? इसी प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए उच्च न्यायालय ने विवादित परिसर की राडार तरंगों से फोटोग्राफी और पुरातात्विक खुदाई भी करवाई।

न्यायाधीशों के सेवानिवृत्त होते रहने के कारण उच्च न्यायालय की विशेष पीठ का लगभग 13 बार पुनर्गठन हुआ। अंतिम पुनर्गठन 11 जनवरी 2010 को हुआ था।

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